जेएनयू के 'देशद्रोहियों' से ऐसे निपट रही है सरकार?
दो साल पहले 9 फरवरी 2016 को जेएनयू विश्वविद्यालय परिसर में हुए एक कार्यक्रम में कथित तौर पर देश विरोधी नारे लगे थे.
इस सिलसिले में जेएनयू छात्रसंघ के उस समय के अध्यक्ष कन्हैया और उनके दो साथियों उमर ख़ालिद और अनिर्बन को गिरफ़्तार किया गया था.
हालांकि तीनों बाद में ज़मानत पर छूट गए. लेकिन कन्हैया कुमार इससे पहले 23 दिन जेल में रहे.
इस केस को दो साल हो चुके हैं लेकिन अभी तक दिल्ली पुलिस की तरफ़ से इस मामले में कोई चार्जशीट फ़ाइल नहीं की गई है.
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दिल्ली पुलिस की जांच में क्या निकला?
कन्हैया कुमार के मुताबिक़, "देश के इतिहास में पहली बार एफ़आईआर में बिना किसी व्यक्ति का नाम लिए देशद्रोह जैसा चार्ज लगा दिया गया. ये भी पहली बार हुआ कि किसी को ज़मानत पर छोड़ते वक़्त बेल ऑर्डर पर 'एंटी नेशनल' शब्द का इस्तेमाल किया गया हो."
लेकिन आज ये मामला कहां है?
"ये तो दिल्ली पुलिस को पता होगा. 23 दिन जेल में रखा. उसके बाद आगे की जांच में क्या निकला, मुझे नहीं मालूम" कन्हैया साफ़गोई से जवाब देते हैं.
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'देश से बाहर आने-जाने से पहले कोर्ट को बताना पड़ता है'
कन्हैया का मुकदमा लड़ रहीं वकील रेबेका जॉन का कहना है कि दो साल पहले एफ़आईआर तो बहुत शोर-शराबे से दर्ज कराई थी. लेकिन अब मामला ज़मानत पर ही अटका हुआ है.
कन्हैया को ज़मानत हाईकोर्ट से मिली थी. उसके बाद सेशन कोर्ट ने ज़मानत पक्की कर दी थी.
इसके बाद से इस मामले में कोई कार्यवाही नहीं हुई है.
मामला दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के पास है. जो अब तक कोई चार्जशीट फ़ाइल नहीं कर पाया है.
लेकिन कन्हैया को अब भी देश से बाहर आने-जाने से पहले कोर्ट को बताना पड़ता है.
पब्लिक ओपिनियन बनाम कोर्ट ऑफ़ लॉ?
दूसरे अभियुक्त उमर ख़ालिद की परेशानी तो और भी मासूम है.
उनके मुताबिक़, "मुझे तो आज तक यही नहीं पता कि मेरे ऊपर मामला क्या है. एफ़आईआर तो अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ थी. मुझे नहीं मालूम कि पुलिस की जांच में क्या निकलकर आया."
उमर ख़ालिद को लगता है कि ये मामला 'कोर्ट ऑफ पब्लिक ओपिनियन' का था न कि 'कोर्ट ऑफ लॉ' का.
तो क्या देशद्रोही नहीं है कन्हैया?
जब हमने यही सवाल कन्हैया के वकील से पूछा तो उन्होंने कहा कि "इसका फ़ैसला तो अदालत को करना है. जब पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट ही दायर नहीं की तो फिर देशद्रोही कैसे?"
रेबेका आगे कहती हैं कि, "ये चार्ज केवल एफ़आईआर में लगे थे. जिस पर कुछ भी साबित नहीं हुआ."
लेकिन ऐसा नहीं कि कन्हैया पर लगा पूरा मामला रफ़ा-दफ़ा हो गया है.
रेबेका के मुताबिक़, "पुलिस चाहे तो अब भी इस मामले पर चार्जशीट दाख़िल कर सकती है."
देशद्रोह के आरोप साबित हो जाए तो उम्रक़ैद तक की सज़ा हो सकती है.
लेकिन आम तौर पर जब इस तरह के संगीन आरोप लगते हैं तो उन पर चार्जशीट दायर करने के लिए दो साल तक इंतज़ार नहीं किया जाता.
रेबेका कहतीं हैं कि, "इससे ये अंदाज़ा लगाना आसान है कि दिल्ली पुलिस के पास कन्हैया के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं है."
उमर ख़ालिद विवाद, पत्रकार भी बने निशाना
दिल्ली पुलिस ने नहीं दिया जवाब
इस पूरे मामले में दिल्ली सरकार ने जेएनयू के फ़ुटेज की एक लैब में जांच भी कराई थी.
रेबेका का कहना है कि लैब की रिपोर्ट में ये साबित हो चुका है कि वहां लगे देश विरोधी नारों में आवाज़ कन्हैया की नहीं थी.
रेबेका के आरोपों पर दिल्ली पुलिस की प्रतिक्रिया जानने के लिए हमने पुलिस प्रवक्ता दीपेन्द्र पाठक से सम्पर्क साधने की कोशिश की.
लेकिन उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया.
कन्हैया और अन्य छात्र भूख हड़ताल पर
'यह मामला सिर्फ़ कन्हैया के बारे में नहीं है'
एबीवीपी के छात्र नेता साकेत बहुगुणा कहते हैं कि, "9 फरवरी 2016 के पूरे प्रकरण को सिर्फ़ इस नज़र से नहीं देखना चाहिए कि कन्हैया दोषी है या नहीं."
"मुद्दा ये था कि जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में क्या छात्र देश विरोधी गतिविधियों में शामिल थे? वहां अफ़जल गुरु के पक्ष में कोई कार्यक्रम हुआ था या नहीं?"
साकेत के मुताबिक़, "दो साल में ये तो तय हो गया कि ऐसा कार्यक्रम हुआ था. रहा सवाल कन्हैया देशद्रोही है या नहीं, इसको साबित करने का इंतजार लंबा ज़रूर है. लेकिन फ़ैसला ज़रूर कन्हैया के ख़िलाफ़ आएगा. हमारे यहां न्याय प्रक्रिया में देर ज़रूर है पर अंधेर नहीं. लालू यादव की तरह इन पर भी फ़ैसला आएगा."
साकेत सेन्ट्रल फ़ोरेंसिक साइंस लैब की रिपोर्ट का भी ज़िक्र करते हैं.
उनका कहना है कि, "उस रिपोर्ट में ये साफ़ है कि जेएनयू में देश विरोधी नारे लगे थे. लेकिन वो किसने लगाए थे, हमने कभी किसी का नाम नहीं लिया था."
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