झारखंड में नहीं टूटा ये मिथक, हमेशा की तरह इस बार भी हार का मुंह देखना पड़ा
नई दिल्ली। जनता और माता-पिता के आशीर्वाद से हेमंत सोरेन कामयाबी के शिखर पर हैं। वैसे तो लोकतंत्र जनादेश से चलता है लेकिन कभी-कभी टोटकों से भी किस्मत के बंद दरवाजे खुल जाते हैं। हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन ने इस जीत के बाद कहा, बेटा को दही-चूड़ा खिला कर नामांकन के लिए भेजा था। आज वह पूर्ण बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बनने वाला है। हेमंत सोरेन बरहेट से तो जीते ही, दुमका की हारी हुई सीट भी जीत ली। एक तरफ झामुमो को नम्बर एक बनाया तो दूसरी तरफ कांग्रेस को भी रिकॉर्ड जीत (16) के आंकड़े पर पहुंचा दिया। 2019 के विधानसभा चुनाव में झामुमो ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। अकेले 30 सीटों पर कब्जा जमा कर हेमंत ने चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी जीत दर्ज की।

आदिवासियों ने भाजपा को नकारा
2019 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी समुदाय ने झारखंड मुक्ति मोर्चा को खुल कर समर्थन दिया। आदिवासी बहुल कोल्हान की 14 में से 11 सीटों पर झामुमो को जीत मिली। झामुमो के सहयोग से कांग्रेस ने भी इस आदिवासी आबादी में दो सीटें जीत कर भाजपा को चौंका दिया। एक सीट निर्दलीय को मिली है। भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली। 2014 के चुनाव में भाजपा को इस इलाके में पांच सीटें मिली थीं। लेकिन इस बार आदिवासियों ने भाजपा को जीरो पर बोल्ड कर दिया। कोल्हान में झामुमो ने 11 सीटों पर चुनाव लड़ा था और सभी पर जीत हासिल की। यह चुनाव परिणाम भाजपा की स्थानीय नीति की हार है। हेमंत सोरेन ने कहा था कि भाजपा की स्थानीय नीति आदिवासी हितों के अनुरूप नहीं है। आदिवासी समाज ने हेमंत की बातों पर भरोसा किया। संथाल परगना काश्तकारी कानून और छोटानागपुर काश्तकारी कानून में रघुवर सरकार ने संशोधन की कोशिश की थी। इससे भी आदिवासियों में नाराजगी थी। हेमंत इस बात का भरोसा दिलाने में कामयाब रहे कि वही उनके हितों की रक्षा कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने झामुमो को तो समर्थन दिया ही, कांग्रेस की भी झोली भर दी।

नये इलाकों में भी झामुमो का जलवा
पलामू प्रमंडल में झामुमो को कमजोर माना जा रहा था। पिछले चुनाव में इस क्षेत्र की 9 सीटों में झामुमो को एक पर भी जीत नहीं मिली थी। लेकिन 2019 में हेमंत की अगुवायी में झामुमो ने कमाल कर दिया। 9 से में 2 सीटें जीत कर उसने नयी पारी शुरू की। गढ़वा और लातेहार सीट पर झामुमो को जीत मिली। गढ़वा में झामुमो के मिथिलेश ठाकुर ने भाजपा के सीटिंग विधायक सत्येन्द्रनाथ तिवारी को हरा दिया। लातेहार में झामुमो के वैद्यनाथ राम ने भाजपा के प्रकाश राम राम के हरा दिया। प्रकाश राम 2014 में झाविमो के टिकट पर जीते थे लेकिन बाद में भाजपा में आ गये थे। वैद्यानाथ राम पहले भाजपा में ही थे। इस तरह झामुमो ने भाजपा से दो सीटें छीन लीं। संथाल परगना में भी उसने इस बार पहले से बेहतर प्रदरेशन किया। इस क्षेत्र की 18 में 9 सीटें जीत कर उसने भाजपा को बैकफुट पर धकेल दिया।

झामुमो सबसे बड़ी पार्टी
झामुमो ने 30 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी का रुतबा हासिल किया। हेमंत सोरेन ने ये करिश्मा शिबू सोरेन और मां के आशीर्वाद से मुमकिन कर दिखाया। हेमंत ने भाजपा को पछाड़ कर ये मुकाम बनाया है। भाजपा 37 से 25 सीटों पर लुढ़क गयी। इसके पहले झामुमो कभी इतनी सीटें नहीं जीत पाया था। जब दिशोम गुरु शिबू सोरेन का झारखंड की राजनीति में जलवा था तब झामुमो 2000 के चुनाव में केवल 12 सीटें ही जीत पाया था। उस समय बिहार झारखंड एक था। 2005 के चुनाव में झामुमो 17 सीटें मिली थीं। इसके बाद उसके प्रदर्शन में मामूली सुधार ही होता रहा था। 2009 में झामुमो को 18 तो 2019 में 19 सीटें मिलीं थीं। लेकिन इस बार 11 सीटों का इजाफा कर झामुमो ने भाजपा की मिट्टीपलीद कर दी।

स्पीकर के हारने का मिथक कायम रहा
भाजपा के दिनेश उरांव झारखंड विधानसभा के स्पीकर थे। वे सिसई सीट पर झामुमो के जिग्गा मुंडा से हार गये। 2014 में जिग्गा बहुत कम मार्जिन से हारे थे। लेकिन इस बार उन्होंने भाजपा के दिग्गज उम्मीदवार दिनेश उरांव को करीब 38 हजार वोटों से हरा दिया। दिनेश उरांव की हार से एक बार फिर ये स्थापित हुआ कि स्पीकर के पद पर रहते कोई प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत पाता है। 2005 में डॉ. सबा अहमद, 2009 में आलमगीर आलम और 2014 में शशांक शेखर भोक्ता स्पीकर रहते चुनाव हार गये थे। झामुमो के रिकॉर्डतोड़ प्रदर्शन के कारण 2019 में भी ये सिलसिला जारी रहा।
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