क्या ‘फ़्लॉप शो’ रहा राम राज्य रथ यात्रा का रवानगी कार्यक्रम?
अयोध्या में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की एक ओर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है तो दूसरी ओर हिन्दू और मुस्लिम पक्षों के बीच अदालत से बाहर सुलह की कोशिशें.
लेकिन इन सबके बीच 13 फ़रवरी को अयोध्या से 'रामराज्य रथ यात्रा' रवाना की गई जो 41 दिन तक चलकर राम नवमी के दिन रामेश्वरम पहुंचेगी.
मुख्य रथ को अयोध्या में हिन्दू संगठनों की ओर से अयोध्या में रामजन्मभूमि पर प्रस्तावित राम मंदिर के मॉडल का स्वरूप दिया गया है और यात्रा का आयोजन एक स्वयंसेवी संस्था कर रही है, लेकिन माना जा रहा है कि इसके पीछे राजनीतिक कारण भी छिपे हैं.
भाषणों की भाषा और जोश
ज़ाहिर है, अयोध्या से रामेश्वरम तक की यात्रा भले ही एक विशुद्ध धार्मिक कार्यक्रम हो, लेकिन जब रथ का आकार अयोध्या में प्रस्तावित राम मंदिर के ढांचे की तरह हो, आयोजकों में हिन्दू संगठनों और भारतीय जनता पार्टी के लोग भी हों तो इसके राजनीतिक निहितार्थ न निकलें, ये समझ से परे है.
यही नहीं, यात्रा रवाना होने से पहले भाषणों का जोश और भाषा भी बता रही थी कि वहां मौजूद लोग चाहते क्या हैं.
बजरंग दल के अध्यक्ष प्रकाश शर्मा ऐलान कर रहे थे, "बाबर यहां पैदा नहीं हुआ. बाबर को मानने वालों के लिए इस देश में कोई स्थान नहीं है."
पूरे भाषण में प्रकाश शर्मा ये बता रहे थे कि मोदी युग में पूरी दुनिया में भारत का डंका बज रहा है. मध्य पूर्व के देशों में वंदे मातरम और भारत माता की जयकार हो रही है. मोदी और योगी के युग में हालात ऐसे हैं कि अब राम मंदिर बन ही जाना चाहिए, इत्यादि.
विश्व हिन्दू परिषद का कहना है कि वो रथ यात्रा को अपना समर्थन दे रही है, आयोजक नहीं है.
रथयात्रा का आयोजक कौन?
रथयात्रा का आयोजन दक्षिण भारत के एक स्वयंसेवी संगठन रामदास मिशन यूनिवर्सल सोसायटी ने किया है लेकिन यात्रा को झंडी दिखाने का काम वीएचपी के महामंत्री चंपत राय ने किया.
कार्यक्रम का संचालन विश्व हिन्दू परिषद के प्रदेश प्रवक्ता शरद शर्मा कर रहे थे और मंच पर साधु संतों, हिन्दू संगठनों के नेताओं के अलावा अयोध्या से बीजेपी के सांसद लल्लू सिंह भी मौजूद थे.
इस यात्रा को बीजेपी का समर्थन है या नहीं, हमारे इस सवाल का जवाब लल्लू सिंह ने हां या ना में नहीं दिया.
उनका कहना था, "राष्ट्रवाद के समर्थन और उसके विकास का जो भी कार्यक्रम होगा, उसमें बीजेपी शामिल रहेगी. समाज में राष्ट्रीय विचारधारा कैसे प्रभावी हो, वह भारतीय जनता पार्टी का काम है और वो कर रही है."
ज़्यादातर दक्षिण भारतीय
दरअसल, पहले चर्चा थी कि यात्रा को मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी हरी झंडी दिखाएंगे, लेकिन योगी त्रिपुरा में थे और अयोध्या से रामराज्य रथ यात्रा संतों के भगवा झंडे देखकर ही आगे बढ़ गई.
लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यात्रा में स्थानीय लोग न के बराबर थे और हज़ारों लोगों की क्षमता वाले कारसेवकपुरम परिसर में महज़ कुछ सौ लोग ही मौजूद थे.
उनमें भी ज़्यादातर दक्षिण भारत के थे. यात्रा के आयोजकों में से एक केरल के रहने वाले सुरेश ने बताया कि केरल और कर्नाटक से क़रीब पचास लोग आए हैं जो कि यात्रा के साथ ही चलेंगे.
उनके मुताबिक़ रथ यात्रा यूपी, एमपी, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के विभिन्न रास्तों में क़रीब सात हज़ार किलोमीटर की दूरी तय करेगी.
25 लाख रुपये का रथ
फ़ैज़ाबाद के युवा पत्रकार अभिषेक सावंत का कहना था, "पिछले कई दिनों से इतने प्रचार-प्रसार के बावजूद लोगों का यहां न पहुंचना बड़े आश्चर्य की बात है. क़रीब 25 लाख रुपये की क़ीमत से बने रथ को देखने में भी लोगों की कोई दिलचस्पी नहीं दिख रही है जबकि रथ दो दिन से यहां आया हुआ है."
स्थानीय लोगों से इस बारे में बात करने पर पता चला कि उन्हें जानकारी थी लेकिन वहां जाने और रथ को देखने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी.
यही नहीं, रथयात्रा रवाना होने के बाद अयोध्या की सड़कों पर शोभायात्रा के तौर पर गुज़र रही थी लेकिन उस यात्रा में भी बहुत लोग नहीं दिखे.
लेकिन लोगों को सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात पर थी कि बीजेपी के 'ऑफ़ द रिकॉर्ड' हिन्दू संगठनों के ज़ोरदार समर्थन के बावजूद न तो बीजेपी के जन प्रतिनिधि और पदाधिकारी वहां दिखे (अयोध्या के सांसद और मेयर को छोड़कर) और न ही हिन्दू संगठनों से जुड़े लोग.
...मंदिर तो नहीं बना
लखनऊ से गए एक पत्रकार तो मज़ाक में बोले, "लोगों से ज़्यादा तो यहां मीडिया वाले दिख रहे हैं."
जहां तक लोगों के न पहुंचने का सवाल है तो अयोध्या के स्थानीय लोग इस सवाल को भी बहुत ज़्यादा तवज्जो नहीं देते.
हनुमानगढ़ी के पास कुछ लोगों से जब इस बारे में पूछा गया तो एक दुकानदार ने बेहद दिलचस्प जवाब दिया. वो बोले, "अयोध्या में पिछले 20-25 साल से हम लोग यही सब देख रहे हैं. मंदिर तो अब तक न बन पाया. कहीं इलेक्शन होने वाला होता है तो अयोध्या में मंदिर बनाने की क़सम खाने और क़सम दिलाने के लिए लोग पहुंचने लगते हैं, उसके बाद फिर ग़ायब."
28 साल पहले बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के उद्देश्य से रथ यात्रा निकाली थी. मंदिर तो नहीं बना. हां, बाबरी मस्जिद का ढांचा ज़रूर ढह गया.
अब ये मामला कोर्ट में है. ऐसे में ये रथयात्रा मंदिर निर्माण का मार्ग किस तरह से प्रशस्त करेगी, ये कहना मुश्किल है.
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