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सेशेल्‍स में भारतीय मिलिट्री बेस के लिए ना की वजह कहीं चीन तो नहीं!

नई दिल्‍ली। सेशेल्‍स के राष्‍ट्रपति डैनी फॉरे 25 जून को भारत आ रहे हैं। इससे पहले उन्‍होंने इस बात का फैसला कर लिया है कि सेशेल्‍स, भारत के साथ मिलिट्री बेस के लिए अपनी जमीन नहीं देगा। साथ ही उसने 500 मिलियन डॉलर की इस डील को मंजूरी देने से भी इनकार कर दिया है। राष्‍ट्रपति फॉरे के भारत दौरे से पहले उनके इस ऐलान के कई मायने हैं और इसमें सबसे अहम भारत के आसपास मौजूद देशों का चीन के प्रभाव में आना। मालदीव के बाद अब सेशेल्‍स भी चीन के प्रभाव में आकर भारत दूर होता जा रहा है। राष्‍ट्रपति डैनी फॉरे ने साफ कर दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान इस मुद्दे पर कोई बातचीत नहीं होगी। साथ ही सेशेल्‍स अब इस प्रोजेक्‍ट को खुद पूरा करेगा।

सरकार की सारे कोशिशें नाकाम

सरकार की सारे कोशिशें नाकाम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साल 2015 में सेशेल्‍स की यात्रा पर गए थे और यहां पर उन्‍होंने सेशेल्स के साथ एक डील साइन की थी। डील के मुताबिक भारत, सेशेल्‍स के साथ मिलकर एजम्‍शन द्वीप पर अपना मिलिट्री बेस तैयार करने वाला था। इस मिलिट्री बेस का पहला मकसद इंडियन ओशिन रीजन यानी आईओआर में चीन की महत्‍वाकांक्षाओं को जवाब देना था। इस डील के शुरुआत में ही कई तरह की बाधांए आई थीं और पूर्व विदेश सचिव जयशंकर ने इस वजह से पिछले वर्ष सेशेल्‍स का दौरा भी किया था। वह यहां पर इस समस्‍या को सुलझाने पहुंचे थे। फिर इस वर्ष जनवरी में वह एक बार और सेशेल्‍स की यात्रा पर गए।

सेशेल्‍स में मिलिट्री बेस का विरोध

सेशेल्‍स में मिलिट्री बेस का विरोध

भारत की इस डील की वजह से सेशेल्‍स में कई तरह के राजनीतिक समस्‍याएं भी पैदा हुईं। राष्‍ट्रपति डैनी को विपक्ष का तगड़ा विरोध झेलना पड़ रहा है। वहीं कहीं न कहीं इस प्रोजेक्‍ट पर चीन का प्रभाव साफतौर पर देखा जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में सेशेल्‍स आने वाले चीनी नागरिकों की संख्‍या में खासा इजाफा हुआ है। साल 2016 में तो चीन के सेंट्रल मिलिट्री कमीशन जनरल वांग गुआनझोंग भी चीन की यात्रा पर आए थे। उनकी इस ट्रिप पर अक्‍टूबर 2004 में सेशेल्‍स और चीन के बीच साइन हुए एक एमओयू को खास दर्जा दिया गया था। उस समय राष्‍ट्रपति डैनी ने कहा था कि सेशेल्‍स के विकास की बात चीन के योगदान का जिक्र किए बिना अधूरी रहेगी।

 2011 में चीन का अहम ऐलान

2011 में चीन का अहम ऐलान

साल 2011 में चीन ने ऐलान किया था कि वह सेशेल्‍स के साथ विदेश में अपना पहला मिलिट्री बेस स्‍थापित करेगा। उस समय भारत के रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि चीन के इस कदम में कोई बुराई नहीं है क्‍योंकि चीन ऐसे आईओआर में समुद्री डाकू से निबटने की रणनीति के तहत कर रहा है। चीन के मिलिट्री विशेषज्ञों की ओर से उस समय कहा गया कि विदेशी जमीन पर मिलिट्री बेस स्‍थापित करना चीन की नीति नहीं है और चीन इस नीति का ही पालन करेगा। हालांकि अगस्‍त 2017 में चीन के अफ्रीका के जिबूती में अपना पहला मिलिट्री बेस संचालित करना शुरू कर दिया था।

मिलिट्री बेस पर होती भारतीय सैनिकों की तैनाती

मिलिट्री बेस पर होती भारतीय सैनिकों की तैनाती

इस डील के बाद सेशेल्‍स की राजधानी विक्‍टोरिया के दक्षिण पश्चिम में स्थित 1,135 किलोमीटर की दूरी तक भारतीय सैनिक तैनात होते। ये सैनिक यहां पर सेशेल्‍स के सैनिकों को भी ट्रेनिंग देते। इस डील का सेशेल्‍स में विरोध हुआ था। यहां के स्‍थानीय नागरिकों से लेकर विपक्षी पार्टियां तक डील के विरोध में आ गए। भारत सरकार कहना था कि भारत के मिलिट्री बेस से कोस्‍ट गार्ड को 1.3 मिलियन स्‍क्‍वॉयर किलोमीटर वाले इकोनॉमिक जोन में गश्‍त बढ़ाई जा सकेगी। इस जोन में गैर-कानूनी तरीके से मछली पकड़ना, ड्रग ट्रैफिकिंग और पाइरेसी जैसे अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है।

मिलिट्री बेस पर होती भारतीय सैनिकों की तैनाती

मिलिट्री बेस पर होती भारतीय सैनिकों की तैनाती

इस डील के बाद सेशेल्‍स की राजधानी विक्‍टोरिया के दक्षिण पश्चिम में स्थित 1,135 किलोमीटर की दूरी तक भारतीय सैनिक तैनात होते। ये सैनिक यहां पर सेशेल्‍स के सैनिकों को भी ट्रेनिंग देते। इस डील का सेशेल्‍स में विरोध हुआ था। यहां के स्‍थानीय नागरिकों से लेकर विपक्षी पार्टियां तक डील के विरोध में आ गए। भारत सरकार कहना था कि भारत के मिलिट्री बेस से कोस्‍ट गार्ड को 1.3 मिलियन स्‍क्‍वॉयर किलोमीटर वाले इकोनॉमिक जोन में गश्‍त बढ़ाई जा सकेगी। इस जोन में गैर-कानूनी तरीके से मछली पकड़ना, ड्रग ट्रैफिकिंग और पाइरेसी जैसे अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है।

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