शिवसेना चुनाव में अकेले उतरती तो उसे पता चल जाते आटे-दाल के भाव!

बेंगलुरू। 2019 लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में वापसी करने वाली बीजेपी ने सपने भी नहीं सोचा होगा कि छमाही परीक्षा में पास होने के लिए ग्रेस मार्क की जरूरत पड़ जाएगी। 21 अक्टूबर को हरियाणा और महाराष्ट्र मे हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी के लिए सुखद नहीं कहे जा सकते हैं, क्योंकि दोनों ही राज्यों में बीजेपी को उत्तीर्णांक तो मिल गए, लेकिन सर्वाइव करने के लिए उसे बैसाखियों की जरूरत पड़ गई हैं।

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बीजेपी महाराष्ट्र में एनडीए सहयोगी शिवसेना के साथ चुनाव में उतरी थी, लेकिन शिवसेना के 50-50 फार्मूले ने उसकी नाक में दम कर रखा है, जिससे अभी तक महाराष्ट्र में सरकार नहीं बनाई जा सकी है। हरियाणा में बीजेपी अकेल दम पर 40 के आकंड़े को छू गई, लेकिन बहुमत के लिए जरूरी 6 सीटों के लिए जेजेपी से हाथ मिलाना पड़ा है।

माना जा रहा है कि बीजेपी के लिए दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे फजीहत से कम नहीं है, जहां 2014 विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने बेहतरीन प्रदर्शन किए थे। महाराष्ट्र में बीजेपी 2014 विधानसभा में मिली जीत को दोहराने में नाकामयाब रही और उसे पिछले बार की तुलना में 17 सीटें कम मिली, जिसके चलते उसे एनडीए सहयोगी शिवसेना के साथ तालमेल बैठाने में समय लग रहा है।

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      बीजेपी का यही हाल हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी रहा, जहां बीजेपी ने पिछली बार प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। हरियाणा विधानसभा चुनाव 2019 में बीजेपी को महज 40 सीटें हासिल हुईं, जो बहुमत से 6 सीट कम है जबकि पिछली बार बीजेपी के हिस्से 48 सीट आई थीं और बीजेपी ने पहली बार हरियाणा में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी।

      निःसंदेह बीजेपी के लिए दोनों राज्यों में परिणाम उत्साहजनक नहीं रहे, लेकिन महाराष्ट्र में इस बार 162 सीटों उम्मीदवार उतारने वाली बीजेपी की जीत का औसत महज 47 फीसदी से बढ़कर 65 फीसदी हो गया, जो बीजेपी के लिए आत्म विश्लेष्ण के लिए मजबूर कर देगी।

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      पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी और शिवसेना अकेले-अकेले चुनाव में उतरे थे और बीजेपी ने 260 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और उसके 122 उम्मीदवार ही चुनाव जीत सके थे और 260 सीटों पर बीजेपी की जीत औसत महज 47 फीसदी था। अगर इस बार भी बीजेपी अकेले लड़ती तो अकेले ही बहुमत के आंकड़े तक पहुंच जाती।

      गौरतलब है महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2014 में बीजेपी ने कुल 260 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और अगर बीजेपी 2019 विधानसभा चुनाव में भी 260 सीटों पर उम्मीदवार उतारती तो मौजूदा 65 फीसदी जीत के औसत के हिसाब से बीजेपी 2019 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में 169 सीट आराम से जीत सकती थी।

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      2014 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने कुल 283 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और शिवसेना की जीत का औसत करीब 22 फीसदी रहा था और उसके सिर्फ 62 उम्मीदवार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। इस बार एनडीए सहयोगी शिवसेना के 126 उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन उसके 56 उम्मीदवार चुनकर आए। बीजेपी के साथ गठबंधन में उतरी शिवसेना को बीजेपी के साथ का फायदा मिला और पिछले विधानसभा की तुलना में सीटों पर उसकी जीत के औसत में जर्बदस्त इजाफा हुआ।

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      2014 विधानसभा चुनाव में शिवसेना का सीटों पर जीत का औसत महज 22 फीसदी था। 283 सीटों पर खड़े शिवसेना उम्मीदवारों में से महज 62 उम्मीदवार ही चुनाव जीत सके, लेकिन 2019 विधानसभा चुनाव में बीजेपी के साथ लड़ने से शिवसेना उम्मीदवारों की जीत के औसत में दोगुने से अधिक वृद्धि हुई और महज 126 सीटों में 45 फीसदी जीत औसत के साथ शिवसेना 56 सीटों पर विजयी रही। शिवसेना को मिली यह बड़ी जीत बीजेपी के चलते नसीब हुई है, लेकिन शिवसेना इसे अपनी जीत बता रही है।

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      यह बात शिवसेना को तब अधिक समझ में आती जब वह 2019 विधानसभा चुनाव में भी अकेले चुनाव मैदान में उतरती और अगर शिवसेना पिछला प्रदर्शन दोहराती तो उसके सीटों की संख्या 56-62 के आसपास होती। चूंकि इस बार बीजेपी के जीत औसत में 23 फीसदी का इजाफा हुआ है, तो संभव है शिवसेना अकेले लड़ती तो उसके सीटों की संख्या घटकर 40-45 सीट भी हो सकती थी।

      विश्लेषकों का मानना है कि शिवसेना का स्वाभाविक पार्टनर बीजेपी है और बीजेपी से इतर शिवसेना का कोई राजनीतिक पार्टनर हो ही नहीं सकता है। तमाम ताम-झाम, झगड़ा और रस्साकसी के बाद शिवसेना को बीजेपी के साथ ही सरकार बनाना है। शिवसेना महज प्रदेश कैबिनेट के मलाईदार पोर्टफोलियों की बारगेनिंग के लिए 50-50 फार्मूले को हवा दे रही है, क्योंकि चुनावी आंकड़े और हार्डकोर हिंदूत्व की राजनीति करने वाली शिवसेना का किसी भी और दल के साथ गठबंधन संभव ही नहीं है।

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      शिवसेना खुद भी जानती है कि ऐसी कोशिश का भविष्य नहीं हैं। शिवसेना+एनसीपी अकेले बहुमत के करीब नहीं पहुंच सकते हैं, उन्हें कांग्रेस की 44 सीटों की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि दोनों का अंकगणित महज 56+54=110 है। कांग्रेस गठबंधन में शामिल होगी तो यह अंकगणित जादुई गणित यानी 56+54=44=154 तक पहुंच पाएगी।

      दरअसल, बहुमत के लिए 145 सीटों के आंकड़े तक एनसीपी-शिवसेना और निर्दलीय विधायकों के गठजोड़ भी नहीं पहुंच पाएगा, जो 56+54+29=139 तक ही पहुंच पाएगी, जो जादुई अंक से 6 सीट कम है, जिसके लिए शिवसेना को बीजेपी अथवा कांग्रेस के विधायकों को तोड़ना होगा, जो आज की तारीख में शिवसेना और एनसीपी के लिए मुश्किल हैं। हालांकि यह बात करना ही बेमानी है, क्योंकि अंततः महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना ही सरकार का गठन करेंगी।

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      यह बात कांग्रेस और एनसीपी भी अच्छी तरह से जानती हैं। हालांकि शिवसेना को अब लड़ाई को लंबी न खींचकर महाराष्ट्र की जनता के जनादेश का सम्मान करते हुए जल्द ही सरकार गठन की पहल शुरू कर देनी चाहिए। शिवसेना आत्मावलोकन करेगी तो उसके लिए अच्छा है, क्योंकि महाराष्ट्र की जनता ने जनादेश एनडीए गठबंधन को दिया है, जिसमें शिवसेना का नहीं बल्कि बीजेपी का पलड़ा भारी है।

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