म्यांमार से तख़्तापलट के बाद भारत आए लोग कैसे गुज़र-बसर कर रहे हैं

म्यांमार, भारत
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"रात को वे हमारे घरों में घुस आते हैं. बलात्कार करते हैं और हत्या कर देते हैं. मेरे पास वहां से भाग जाने का मौका था. हो सकता है फिर यह मौका कभी न आए.'' निराशा में डूबी एक महिला ने यह बताया.

बयालीस साल की मखाई (बदला हुआ नाम) का वर्तमान काफी कठिन और भविष्य अनिश्चित है. वह अपनी बहनों और बेटियों के साथ अपनी जान बचाने की ख़ातिर म्यांमार के तामू जिले से भागकर शरणार्थी बनने के लिए भारत आ गई हैं. अपनी और अपने बच्चों की जान बचाने के लिए इससे इतर वह कुछ और कर भी नहीं सकती थीं.

वह कहती हैं, ''जब से म्यांमार में हिंसा शुरू हुई है तब से हम अपने घरों में रहने में डरने लगे हैं. कई बार हमने जंगल में छिपकर रातें गुजारी हैं.''

फरवरी में सेना के तख़्तापलट करने और उसके बाद हुए विरोध प्रदर्शनों और उसमें भड़की हिंसा के चलते मखाई की तरह कइयों को अपना देश छोड़कर दूसरे देशों में शरणार्थी बनने को मज़बूर होना पड़ा है. ऐसे लोग जो म्यांमार में भारत की सीमा के पास रह रहे हैं यह उनके लिए सबसे बढ़िया ठिकाना है.

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महिलाएं भले ही ख़ुद को सुरक्षित करने के लिए भले भारत आ गई हों लेकिन उनके परिवार के मर्द अभी भी म्यांमार में रह रहे हैं. तमू से अपनी बेटी के साथ भागकर मणिपुर के मोरेह आने वाली एक अन्य महिला विन्यी (बदला हुआ नाम) ने इस बारे में कहा, ''मर्द ज़रूरत पड़ने पर लड़ सकते हैं. लेकिन सेना की अचानक कार्रवाई होने पर हम महिलाओं के लिए बचकर भाग पाना बहुत कठिन है.''

मखाई के लिए भारत में शरण लेने की यह तीसरी कोशिश है. इससे पहले के दोनों प्रयासों में भारतीय सुरक्षा बलों ने उन्हें वापस म्यांमार भेज दिया था. मखाई ने बताया, ''मैं जानती हूं कि मेरे लिए यहां ठहरना बहुत कठिन है. मैं बहुत डरी हुई हूं कि कब कोई भारत सरकार का अधिकारी हमें खोजकर वापस हमारे घर भेज दे. लेकिन हमें बहादुर बनना होगा.''

भारत और मणिपुर सरकार की चिंता

भारत की चिंता और भय बेवजह नहीं है. म्यांमार से भारी तादाद में अवैध आप्रवासियों के आने के डर से भारत नाखुश है. यहां अवैध आप्रवासियों का मामला हमेशा गंभीर रहा है. उस पर भी इनके आने से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए दो राज्यों असम और पश्चिम बंगाल में इस समय चुनाव हो रहे हैं. ऐसे वक़्त पर म्यांमार के नागरिकों को यहां पर शरणार्थी के रूप में अनुमति देना भारत सरकार कभी नहीं चाहेगी.

इस चलते भारत ने साफ़ कर दिया है कि म्यांमार के नागरिकों को भले ही राशन या दवाई दे दी जाए लेकिन उन्हें यहां रहने का ठिकाना न मिल सके. मणिपुर सरकार तो इससे भी एक कदम आगे चली गई. उसने स्थानीय प्रशासन को आप्रवासियों के लिए राहत कैंप न खोलने का निर्देश दिया था. सरकार ने कहा था कि उनके लिए खाना और और रहने का इंतज़ाम नहीं किया जाएगा. इस आदेश में प्रशासन से कहा गया था कि जो भी यहां आ गए हों उन्हें विनम्रता से मना कर दिया जाए. इस आदेश को लेकर खूब हो-हल्ला होने के बाद सरकार ने वह आदेश वापस ले लिया. बहरहाल भारत ने अपना रुख साफ़ कर दिया है कि म्यांमार से आने वालों का हम स्वागत नहीं कर सकते.

मखाई के साथ रह रही दो अन्य महिलाओं ने कहा कि वे म्यांमार तभी जाएंगी जब वहां के हालात सुधर जाएंगे. तब तक वे भारत और यहां के लोगों पर ही निर्भर रहेंगे. वैसे भी म्यांमार के कई लोगों के मणिपुर में पारिवारिक संबंध हैं.

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घायलों की तीमारदारी कर रहे मणिपुर के लोग

मोरेह से क़रीब सौ किलोमीटर दूर इंफाल में म्यांमार के दो युवा एक सरकारी अस्पताल में अपना इलाज करा रहे हैं. इन दोनों को 25 मार्च की रात सेना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान गोली लगी थी. उनमें से एक ने बताया, ''म्यांमार की सेना तामू में एक जूलरी शॉप को लूटना चाह रही थी. लेकिन जब स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया तो उन्होंने फायर कर दिया. उसी दौरान मुझे गोली लगी थी.''

वहीं इसी घटना में घायल हुए एक दूसरे युवक ने कहा, ''पहले भी पुलिस ने विरोध प्रदर्शनों को दबाने की कोशिश की थी. लेकिन ऐसी हिंसा कभी नहीं हुई. मामला तब ख़राब हुआ जब सेना ने लोगों पर गोलीबारी शुरू कर दी.'' इन दोनों युवकों ने बताया कि एक और शख़्स के साथ वे उसी रात तमू से भागकर मोरेह आ गए.

कुकी स्टूडेंट्स आर्गनाइजेशन (इंफाल) के उपाध्यक्ष जे खोंगसाई ने बताया, ''मोरेह में स्वास्थ्य केंद्र बेहतर नहीं हैं इसलिए इन दोनों को इंफाल लाना पड़ा.'' उनके मुताबिक़, जब इन दोनों को इंफाल लाया गया तब ये चल भी नहीं सकते थे क्योंकि गोली उनके शरीर में फंसी थी. भूखे-प्यासे होने के बावजूद ये दोनों पानी पीने से भी लाचार थे.

इस संगठन से जुड़े लोग दिन रात इन दोनों की तीमारदारी कर रहे हैं. यहां तक कि इन्हें घर का खाना खिला रहे हैं. हालांकि म्यांमार से भागकर भारत आने वाली महिलाओं के उलट ये दोनों मरीज जल्द से जल्द अपने देश लौटना चाहते हैं.

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आधिकारिक रास्ते ​पिछले साल से बंद

म्यांमार की हलचल के बाद उसकी सीमा के ठीक पास भारत में स्थित मोरेह में सभी आधिकारिक रास्ते सील कर दिए गए हैं. सालों से भारत और म्यांमार के बीच एक मुक्त आवागमन प्रणाली (एफएमआर) की व्यवस्था है. इसके तहत दोनों देश के स्थानीय लोग एक-दूसरे की सीमा में 16 किलोमीटर तक जा सकते हैं और वहां 14 दिनों तक रह सकते हैं.

हालांकि कोरोना महामारी फैलने के बाद पिछले साल मार्च में एफएमआर सुविधा को बंद कर दिया गया था. दोनों ओर के लोगों को उम्मीद थी कि इस साल यह सुविधा फिर से शुरू कर दी जाएगी. लेकिन फरवरी में म्यांमार में तख्तापलट के बाद उनकी उम्मीदें टूट गई हैं. इसके बावज़ूद म्यांमार के नागरिक रोज़ का ख़तरा मोल लेकर चोरी-छिपे सीमा पार करके भारत आना नहीं छोड़ रहे.

म्यांमार से रोज़ भारत आकर क़रीब 20 घरों में दूध बेचने वाले एक व्यापारी ने बताया, ''हमें भारत आने में बहुत दिक्कत हो रही है. बर्मा का होने के चलते हमें अक्सर भारतीय सुरक्षा बल रोक देते हैं. इसके बाद भी हम यहां किसी तरह आ जाते हैं. बर्मा में इस समय गोलीबारी और बम धमाके हो रहे हैं. सब कुछ वहां बंद है.''

बहुत लंबी और कंटी-छंटी सीमा होने के चलते हर जगह भारत की सेना का पहरा नहीं होता

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सीमा पर म्यांमार का पहरा ढीला हुआ

म्यांमार में तख़्तापलट विरोधी प्रदर्शनों के बाद वहां की सेना पूरे देश में फैल गई है. इससे भारत से लगती सीमा पर उसके जवानों की संख्या बहुत कम रह गई है. इस चलते म्यांमार से भारत जाने वालों को राहत मिली है. अब उन्हें केवल भारतीय फौज से बचना होता है. वैसे भी बहुत लंबी और कंटी-छंटी सीमा होने के चलते हर जगह भारत की सेना का पहरा नहीं होता.

भारत में अपना सामान बेचने के बाद झाड़ियों और गंदगी वाले रास्तों से म्यांमार के ये नागरिक अपने देश लौट जाते हैं. अक्सर सुरक्षा बल भी इनके आने जाने को नजरअंदाज़ कर देते हैं. वहीं म्यांमार के कई दूसरे लोग भारतीय सीमा में दाख़िल होने के लिए अपारंपरिक रास्तों को चुनते हैं. दोनों देशों की सीमा पर मौज़ूद 'नो मेन्स आइलैंड' से एक बरसाती नाला गुजरता है. यह मोरेह और तमू को जोड़ता है. इसलिए कई लोग इस नाले से होकर भारत आ जाते हैं.

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मणिपुर की हमदर्दी शरणार्थियों के साथ

सीमा भले ही आधिकारिक तौर पर सील कर दी गई हो. वहीं भारत सरकार नहीं चाहती कि म्यांमार के लोग यहां आ जाएं. ऐसी हालत में मोरेह के लोगों के पास मदद को भले कुछ न हो लेकिन उनके मन में म्यांमार के लोगों के प्रति संवेदनाएं जरूर हैं.

मोरेह यूथ क्लब के फिलिप खोंगसाई ने बताया, "हम मानवीय आधार पर उनका स्वागत और उनकी सेवा करेंगे. सरकार भले कहे कि हमें उनकी मदद नहीं करनी चाहिए. लेकिन हम अपना काम करेंगे और सरकार अपना.'' इस क्लब के कई सदस्य सीमा पर फंसे म्यांमार के लोगों को खाने-पीने का सामान मुहैया करा रहे हैं.

आने वाले वक़्त में म्यांमार से आने वाले शरणार्थियों की संख्या में वृद्धि होने का अनुमान है. क्योंकि वहां की हालत तेजी से खराब हो रही है. मोरेह के कई लोगों को लगता है कि इस मुश्किल वक़्त में भारत को म्यांमार के नागरिकों के साथ खड़ा होना चाहिए. म्यांमार से भागकर भारत आने वालों के लिए विकल्प बहुत आसान है. वह यह कि एक और दिन भारत में रह लिया जाए. भले अगले दिन जबरदस्ती म्यांमार भेज देने के भय का ही सामना क्यों न करना पड़े.

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