क्या 'मेक इन इंडिया' की धज्जियां उड़ाकर हुआ रफ़ाल समझौता?
क़रीब एक घंटे के भीतर दिल्ली से पाकिस्तान के क्वेटा और क्वेटा से दिल्ली वापसी.
ये उस लड़ाकू विमान रफ़ाल की स्पीड है, जिसकी ख़रीदारी में घपला करने का आरोप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लगाया है.
राहुल गांधी ने मंगलवार को फ़्रांस के साथ हुए रफ़ाल सौदे को घोटाला बताते हुए कहा, ''एक कारोबारी' को लाभ पहुंचाने की मंशा से सौदे को बदलने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ख़ुद पेरिस गए थे.''
राहुल गांधी ने ट्वीट किया, ''रक्षा मंत्री कहती हैं कि प्रत्येक रफ़ाल जेट की कीमत के लिए पीएम मोदी और उनके 'भरोसेमंद' साथी ने जो बातचीत की, वो गोपनीय है.'' राहुल ने तंज कसा, ''रफ़ाल की कीमत के बारे में संसद को बताना राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा है और जो इस बारे में पूछे, उसे एंटी-नेशनल बता दो.''
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद एमवी राजीव गौड़ा ने संसद में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन से रफ़ाल समझौते की कीमत और सौदे को लेकर कई सवाल किए थे.
इसके जवाब में सीतारमन ने कहा, ''आर्टिकल 10 के मुताबिक, सौदे की जानकारी गोपनीय रखी जाएगी. साल 2008 में दोनों देशों के बीच हुए इंटर गवर्मेंट एग्रीमेंट के तहत ऐसा किया जाएगा. इस विमान को बनाने वाली कंपनी डास्सो (Dassault) से मीडियम मल्टी रोल कॉम्बेट एयरक्राफ्ट के लिए कोई समझौता नहीं हुआ है.''
कांग्रेस के मोदी सरकार से सवाल?
निर्मला सीतारमन के इस जवाब और राहुल गांधी के आरोपों के बाद कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कुछ सवाल पूछे.
- ''यूपीए सरकार के वक्त एक रफ़ाल की कीमत 526 करोड़ थी. लेकिन जो सुनने में आया वो ये कि मोदी सरकार ने एक रफ़ाल 1570 करोड़ रुपये में खरीदा. यानी क़रीब तीन गुणा. ये सच है या नहीं, ये कौन बताएगा. इस नुकसान का ज़िम्मेदार कौन है?
- साल 2016 में फ्रांस में जो समझौता हुआ, उससे पहले सुरक्षा पर बनी कैबिनेट कमिटी से मंज़ूरी क्यों नहीं ली गई. प्रक्रिया क्यों नहीं मानी गई. क्या भ्रष्टाचार का केस नहीं बनता?
- देश की ज़रूरत 126 विमानों की थी. मोदी गए और जैसे संतरे खरीदे जाते हैं, वैसे रफ़ाल विमान खरीद लिए गए.
- नवंबर 2017 में रक्षा मंत्री ने कहा कि 36 रफाल इमरजेंसी में खरीदे गए. अगर ऐसा है तो समझौता होने के इतने महीनों बाद भी एक रफ़ाल भारत को अब तक क्यों नहीं मिला?''
कांग्रेस के इन सवालों पर सरकार की तरफ से कोई जवाब अब तक नहीं आया है.
रफ़ाल लड़ाकू विमान की ख़ास बातें
- रफ़ाल विमान परमाणु मिसाइल डिलीवर करने में सक्षम.
- दुनिया के सबसे सुविधाजनक हथियारों को इस्तेमाल करने की क्षमता.
- दो तरह की मिसाइलें. एक की रेंज डेढ़ सौ किलीमीटर, दूसरी की रेंज क़रीब तीन सौ किलोमीटर.
- रफ़ाल जैसा विमान चीन और पाकिस्तान के पास भी नहीं है.
- ये भारतीय वायुसेना के इस्तेमाल किए जाने वाले मिराज 2000 का एडवांस वर्जन है.
- भारतीय एयरफ़ोर्स के पास 51 मिराज 2000 हैं.
- डस्सो एविएशन के मुताबिक, रफ़ाल की स्पीड मैक 1.8 है. यानी क़रीब 2020 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार.
- ऊंचाई 5.30 मीटर, लंबाई 15.30 मीटर. रफ़ाल में हवा में तेल भरा जा सकता है.
रफ़ाल लड़ाकू विमानों का अब तक अफगानिस्तान, लीबिया, माली, इराक़ और सीरिया जैसे देशों में हुई लड़ाइयों में इस्तेमाल हुआ है.
कब हुआ था समझौता?
साल 2010 में यूपीए सरकार ने ख़रीद की प्रक्रिया फ़्रांस से शुरू की.
2012 से 2015 तक दोनों के बीच बातचीत चलती रही. 2014 में यूपीए की जगह मोदी सरकार सत्ता में आई.
सितंबर 2016 में भारत ने फ़्रांस के साथ 36 रफ़ाल विमानों के लिए करीब 59 हज़ार करोड़ रुपये के सौदे पर हस्ताक्षर किए.
मोदी ने सितंबर 2016 में कहा था, ''रक्षा सहयोग के संदर्भ में 36 रफ़ाल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर ये खुशी की बात है कि दोनों पक्षों के बीच कुछ वित्तीय पहलुओं को छोड़कर समझौता हुआ है.''
रक्षा मामलों के जानकार राहुल बेदी के मुताबिक, ''पहले भारत को 126 विमान खरीदने थे. तय ये हुआ था कि भारत 18 विमान खरीदेगा और 108 विमान बेंगलुरु के हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में एसेम्बल होंगे. लेकिन ये सौदा नहीं हो पाया.''
अगर इस समझौते की राशि 59 हज़ार करोड़ से तुलना की जाए तो एक रफ़ाल की कीमत क़रीब लगभग 1600 करोड़ रुपये होती है. ये रकम कांग्रेस के आरोपों में बताई गई रकम के काफी करीब है.
रफाल समझौते का अंबानी कनेक्शन?
मोदी सरकार ने अब तक इस समझौते में पारदर्शिता को लेकर ये दावा किया है कि हमने रफ़ाल बनाने वाली कंपनी डास्सो से नहीं, सीधा फ्रांस सरकार से डील की है.
सितंबर 2016 में अचानक जैसे ये समझौता हुआ, इसको लेकर सरकार की आलोचना हुई.
मोदी सरकार मेक ऑफ़ इंडिया का जमकर प्रचार करती है. लेकिन इस समझौते में भारत की एकमात्र जहाज़ बनाने वाली कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को नज़रअंदाज़ किया गया.
रक्षा मामलों के जानकार अजय शुक्ला ने अप्रैल 2015 में कहा था, ''प्रधानमंत्री मोदी के साथ रिलायंस (एडीएजी) प्रमुख अनिल अंबानी और उनके समूह के अधिकारी भी गए थे. उन्होंने रफ़ाल बनाने वाली कंपनी के साथ बातचीत भी की थी.''
राहुल गांधी के आरोप के बाद साल 2015 में अजय शुक्ला की कही बात को वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण आगे बढ़ाते हैं.
प्रशांत भूषण ने मंगलवार को अपने ट्वीट में लिखा, ''मार्च 2015 में अंबानी ने रिलायंस डिफेंस का रजिस्ट्रेशन करवाया. दो हफ्ते बाद ही मोदी यूपीए सरकार की 600 करोड़ रुपये में खरीदी जाने वाली रफ़ाल डील को 1500 करोड़ की नई डील में बदल देते हैं. पब्लिक सेक्टर की एचएएल की जगह अंबानी की कंपनी ने ली ताकि 58 हज़ार करोड़ के केक को आधा चखा जा सके.''
https://twitter.com/pbhushan1/status/960867640393850881
प्रशांत भूषण ने इस दावे के समर्थन में कॉर्पोरेट मंत्रालय की वेबसाइट का एक स्क्रीनशॉट भी शेयर किया.
भारत को सबसे महंगा मिला रफ़ाल?
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स का मानें तो रफ़ाल के लिए भारत को बाकी मुल्कों के मुकाबले ज़्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है.
डिफेंस वेबसाइट जेन्स के मुताबिक़, साल 2015 में भारत के अलावा क़तर ने भी फ्रांस से राफेल खरीदने को लेकर समझौता हुआ था.
जिसे बीते साल दिसंबर में क़तर ने 24 से बढ़ाकर 36 कर दिया. 24 रफ़ाल के लिए तब दोनों मुल्कों के बीच क़रीब 7.02 बिलियन डॉलर का समझौता हुआ था. इसमें हथियारों की ख़रीद भी शामिल थी.
स्ट्रेटजी पेज की रिपोर्ट के मुताबिक, क़तर को एक रफ़ाल क़रीब 108 मिलियन डॉलर यानी 693 करोड़ रुपये में मिला.
यानी अगर ये रिपोर्ट सही साबित होती है तो ये कीमत भारत की एक रफ़ाल के लिए कथित तौर पर चुकाई कीमत से कहीं ज़्यादा है.
'रफ़ाल जैसा जंगी विमान पाक-चीन के पास नहीं'
रफ़ाल सौदे में ऐसा 'गोपनीय' है क्या?
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