गद्दार के रूप में नहीं मरना चाहता था, अपनी कहानी सुनाने के लिए ही जीवित हूं: नंबी नारायणन

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व वैज्ञानिक नांबी नारायणन को एक झूठे केस में फंसाए जाने के 24 साल बाद न्याय मिला था। अब केरल सरकार ने मंगलवार को उन्हें राज्य पुलिस द्वारा झूठे जासूसी मामले में फंसाए जाने को लेकर 1.30 करोड़ रुपये का अतिरिक्त मुआवजा दिया है। इस पर इसरो के पूर्व वैज्ञानिक ने कहा है कि निर्दोष साबित होने पर खुशी है और वह 26 वर्षीय कानूनी लड़ाई के परिणाम से संतुष्ट हैं। उन्होंने कहा कि मैं एक गद्दार के रूप में नहीं मरना चाहता था शायद इसिलए अपनी कहानी सुनाने के लिए आज जिंदा हूं।

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    ISRO Spy Case: Nambi Narayanan को मिला इंसाफ, बिना कसूर बना दिए गए थे गद्दार | वनइंडिया हिंदी
    साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पाया निर्दोष

    साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पाया निर्दोष

    दरअसल, 79 वर्षीय पूर्व वैज्ञानिक नांबी नारायणन को साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने 26 साल पुराने इसरो की जासूसी मामले में निर्दोष पाया था। न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा था कि उनकी गिरफ्तारी 'अनावश्यक' थी और उन्हें फंसाया गया था। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नांबी नारायणन को 50 लाख रुपये की अंतरिम राहत देने का भी आदेश दिया था। न्यायालय ने यह भी कहा था कि अगर नांबी नारायणन चाहें तो वह निचली अदालत में उचित मुआवजे के लिए अपील कर सकते हैं। बता दें कि इससे पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी उन्हें 10 लाख रुपये की राहत देने का आदेश दिया था।

    मैं गद्दार के रूप में नहीं मरूंगा: नांबी

    मैं गद्दार के रूप में नहीं मरूंगा: नांबी

    केरल सरकार द्वारा 1.30 करोड़ रुपये का अतिरिक्त मुआवजा मिलने के बाद उन्होंने कहा, मैं खुश हूं। यह केवल मेरे द्वारा लड़ी गई लड़ाई धन के लिए नहीं है। मेरी लड़ाई अन्याय के खिलाफ थी। उन्होंने आगे कहा, 'निर्दोष साबित होने के बाद, इस बात की ज्यादा खुशी है कि अब मैं गद्दार के रूप में नहीं मरूंगा। मैं कभी गद्दार के आरोप के साथ नहीं मरना चाहता था इसलिए अपनी कहानी सुनाने के लिए ही जीवित हूं।' नांबी नारायणन ने आगे कहा कि वह अपनी 26 वर्षीय कानूनी लड़ाई के परिणाम से संतुष्ट हैं। लेकिन वह पूरी तरह तभी संतुष्ट होंगे जब उन्हें फंसाने वाले अधिकारियों को सजा मिलेगी।

    क्या था मामला?

    क्या था मामला?

    अक्‍टूबर 1994 में इस केस की शुरुआत उस समय हुई जब मालदीव की मरियम नाशिदा को तिरुवंतपुरम से गिरफ्तार किया गया। मरियम पर आरोप लगे कि उनके पास इसरो के रॉकेट इंजन के कुछ चित्र है जिसे वह पाकिस्‍तान को बेचने जा रही थी। इस पूरे के स में जब इसरो के क्रायोजेनिक इंजन प्रोजेक्‍ट पर काम कर रहे वैज्ञानिक नांबी नारायणन को नवंबर में गिरफ्तार किया गया तो खलबली मच गई। नारायणन के साथ इसरो के डिप्‍टी डायरेक्‍टर डी शशिकुमारन को भी गिरफ्तार किया गया था। इन दोनों के अलावा रूस की स्‍पेस एजेंसी में भारतीय प्रतिनिधि के चंद्रशेखर, लेबर कॉन्‍ट्रैक्‍टर एसके शर्मा और नाशिदा की दोस्‍त फौसिया हसन को भी गिरफ्तार किया गया था। जनवरी 1995 में इसरो वैज्ञानिकों और सभी बिजनेसमेन को जमानत मिल गई। लेकिन मालदीव की दोनों नागरिकों को जेल में ही रखा गया। साल 1996 में सीबीआई ने केरल की कोर्ट में रिपोर्ट फाइल करके इस जासूसी केस का झूठा करार दिया और फिर सभी आरोपी रिहा हो गए। लेकिन इसी वर्ष जून में केरल की सरकार ने फैसला किया कि वह केस की जांच दोबारा करेगी।

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