दिल्ली चुनावः क्या आम आदमी पार्टी ने स्वास्थ्य सेवाएं सुधारने का अपना वादा पूरा किया?
अरविंद केजरीवाल ने जब 2015 में दिल्ली की सत्ता संभाली थी तो उनकी सरकार ने शहर में 900 नए प्राइमरी हेल्थ सेंटर खोलने का वादा किया था.
दिल्ली में नई सरकार चुनने के लिए 8 फ़रवरी को मतदान होना है. बीबीसी रियलटी चैक की टीम ने पता किया कि क्या केजरीवाल अपना ये वादा निभाने में कामयाब हुए हैं.
अधिक स्वास्थ्य केंद्रों की ज़रूरत क्यों है?
दिल्ली में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की भारी कमी है और इस कारण बड़े अस्पतालों में क्षमता से अधिक मरीज़ पहुंचते हैं.
सरकार के अधिकारिक डाटा के मुताबिक़, साल 2015 में दिल्ली में सिर्फ़ पांच प्राइमरी स्वास्थ्य सेवा केंद्र थे.
नई सरकार ने वादा किया कि दिल्ली में मोहल्ला क्लिनिक नाम के नए स्वास्थ्य केद्र खोले जाएंगे जहां हर समय डॉक्टर और नर्स मुहैया कराने की बात की गई.
इन मोहल्ला क्लिनिकों में सामान्य टेस्ट, मेडिकल चैक-अप और मुफ़्त दवा मिलती है. ये कम आय वर्ग के लोगों, ख़ासकर महिलाऔं और गृहणियों को ध्यान में रखकर खोले गए थे.
अब तक कितने मोहल्ला क्लिनिक खोले गए?
राज्य सरकार का वादा था 900 मोहल्ला क्लीनिक बनाने का. अभी तक 900 में से आधे मोहल्ला क्लिनिक ही बनाए जा सके हैं. इनमें से भी लगभग ढाई सौ क्लीनिक बीते चार महीनों में खोले गए हैं. ये बात आम आदमी पार्टी ने भी स्वीकार की है.
भारतीय जनता पार्टी ने ये दावा भी किया है कि इन नए मोहल्ला क्लिनिक में कई मूलभूत सुविधाएं भी मुहैय्या नहीं कराई गई हैं.
इन मोहल्ला क्लिनिकों के बारे में कोई स्वतंत्र समीक्षा रिपोर्ट हमें नहीं मिल सकी, हालांकि द टाइम्स आफ़ इंडिया ने उन मोहल्ला क्लिनिकों का दौरा किया जिन्हें ख़राब स्थिति में बताया गया था. उसकी रिपोर्ट के मुताबिक़ बीजेपी के दावे अतिशयोक्तिपूर्ण थे.
इस साल के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आवंटित किए गए फंड बताते हैं कि सरकार ने स्वास्थ्य पर कुल ख़र्च किए 74.85 अरब रुपए में से सिर्फ़ 7 प्रतिशित ही इन मोहल्ला क्लिनिकों के लिए आवंटित किए. ये बीते साल के मुक़ाबले कम है.
ये पता नहीं चल सका कि मोहल्ला क्लिनिकों का बजट क्यों घटाया गया है. हमने जब आम आदमी पार्टी के सामने ये सवाल रखे तो उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिल सका.
दिल्ली के लोगों से और क्या वादे किए गए थे?
मोहल्ला क्लिनिक बनाने के अलावा आम आदमी पार्टी ने 125 पॉली क्लिनिक बनाने का भी वादा किया था जिनमें महिला रोग विशेषज्ञ और बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों की ख़ास सुविधा देने का वादा किया था.
राज्य सरकार के अनुसार ऐसा बड़े सरकारी अस्पतालों का बोझ कम करने के लिए किया गया है, ताकि बड़े अस्पताल सिर्फ़ रेफ़ेरल अस्पताल बनें जहां गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीज़ ही जाएं.
लेकिन बीते पांच सालों में, आम आदमी पार्टी की सरकार सिर्फ़ 25 पॉली क्लिनिक ही बना सकी है. आम आदमी पार्टी के अपने आंकड़ों के मुताबिक़ 125 पॉली क्लिनिकों का उद्देश्य अभी बहुत दूर है.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में आम आदमी पार्टी की तीसरी बड़ी योजना सरकारी अस्पतालों में तीस हज़ार नए बेड लगाने की थी. लेकिन ये वादा भी पूरा नहीं किया गया.
सरकार के अपने डाटा के मुताबिक़ मई 2019 तक सिर्फ़ तीन हज़ार नए बेड ही सरकारी अस्पतालों में लगाए जा सके हैं.
सरकार ने सरकारी अस्पतालों में एक महीना तक इलाज न मिल पाने की स्थिति में निजी अस्पतालों में फ्री इलाज देने की योजना भी शुरू की है.
कम आय वर्ग के मरीज़ों को पचास हज़ार रुपए तक की आर्थिक सहायता देने की योजना भी शुरू की गई है.
क्या स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हुई हैं?
दिल्ली सरकार का कहना है कि जब सभी मोहल्ला क्लिनिक और पॉली क्लिनिक खुल जाएंगे तब सरकारी अस्पतालों पर पड़ने वाले बोझ बहुत कम हो जाएगा.
आम आदमी पार्टी ये क्लिनिक खोलने के अपने लक्ष्य का कुछ हिस्सा ही हासिल किया है, लेकिन सरकारी अस्पतालों का बोझ कम होने के कोई संकेत अब तक दिखाई नहीं दिए हैं. असल में ये बढ़ा ही है.
पिछले साल ही मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने स्वीकार किया था कि बीते पांच सालों में अस्पतालों की ओपीडी में मरीज़ों की संख्या दोगुनी हुई है. हालांकि उनका कहना था कि अस्पतालों की हालत में सुधार होने की वजह से हुआ है. उन्होंने कहा कि सरकारी अस्पतालों में मिल रही सुविधाएं उन मरीजों को आकर्षित कर रही हैं जो निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं.
जहां तक स्वास्थ्य क्षेत्र में ख़र्चों का सवाल है, अधिकारिक डाटा बताता है कि स्वास्थ्य का बजट 2015 के बाद से बढ़ा ही है.
आम आदमी पार्टी का ये भी कहना है कि दिल्ली देश का एकमात्र राज्य है जहां कुल बजट का 12 से 13 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च किया जाता है. आरबीआई के डाटा के मुताबिक़ सरकार का ये दावा सही है.
ये बताता है कि दिल्ली देश का एकमात्र राज्य है जो अपने बजट का इतना बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च करता है.
वास्तव में, साल 2002 के बाद से, दिल्ली ने स्वास्थ्य सेवाओं पर पूरे देश में सबसे ज़्यादा ख़र्च किया है.
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