कोरोना: क्वारंटीन में रहना सज़ा या मज़ा?
स्पेन और इटली में दो सप्ताह की छुट्टी बिताने के बाद मैं इस महीने के पहले सप्ताह में जब दिल्ली लौटा तो काम पर जाने का बिल्कुल मन नहीं कर रहा था. मैं और मेरी पत्नी अब भी 'रोमन हॉलिडे' के मूड से बाहर नहीं निकल पा रहे थे.
तब अचानक दफ़्तर से फ़ोन आया कि मुझे 14 दिनों तक के लिए दफ़्तर नहीं आना है क्योंकि हम ने स्पेन और इटली में दो सप्ताह गुज़ारे थे जहाँ कोरोना वायरस तेज़ी से फैल रहा था.
मेरे या मेरी पत्नी के केस में कोरोना वायरस के कोई लक्षण नहीं सामने आए थे लेकिन दफ़्तर का ये फैसला एहतियात के तौर पर लिया गया था.
मेरे मैनेजर के शब्द मेरे कानों मे संगीत की तरह गूँज रहे थे, "दो सप्ताह के लिए दफ़्तर नहीं आना है, कोई काम नहीं करना है और किसी से नहीं मिलना है, आप घर पर ही रहें."
मैं ख़ुशी से झूम उठा. ये मेरे लिए एक "एक्सटेंडेड हॉलिडे" (विस्तारित छुट्टी) की तरह से था. मैं ने अपनी पत्नी से कहा, "इन 14 दिनों में मैं किताबें पढूंगा, ख़ूब सोऊंगा, ढेर सारी फ़िल्में देखूँगा, गाने सुनूंगा और सोशल मीडिया और सियासी ख़बरों से कोसों दूर रहूंगा"
कुछ दिन मज़ा लेकिन फिर सज़ा...
अगले चार-पांच दिनों तक बड़े मज़े किए. नेटफ़्लिक्स पर सेक्रेड गेम्ज़ की पूरी सिरीज़ देख डाली. हॉट स्टार पर पुराने क्रिकेट मैच देखे. फ़िल्में देखीं, क्लासिक फ़ुटबॉल मैच देखे, गाने सुने, इन गानों पर ख़ूब डांस किया और विलियम डेलरिम्पल की नई पुस्तक द अनार्की (अराजकता) आधी से ज़्यादा पढ़ डाली.
हम दोनों बाहर की दुनिया को लगभग भूल गए. हाँ कोरोना वायरस की ख़बरों पर हमारी निगाहें टिकी ज़रूर थीं. मेरी पत्नी ने बार-बार कहा भी कि हम क़िस्मत वाले थे कि यूरोप में महामारी के अधिक फैलने से पहले हम घर लौट गए
थोड़ा बहुत समय निकाल कर हम ने घर की सफ़ाई की. किताबों को दोबारा से सजाया और छोटे- छोटे दूसरे काम निपटाए. लेकिन धीरे-धीरे कुछ ख़ालीपन का एहसास होने लगा जो समय के साथ बढ़ता गया.
धीरे-धीरे हमारे मूड में बदलाव आने लगा. मिज़ाज में चिड़चिड़ापन सा महसूस होने लगा. नेटफ़्लिक, हॉटस्टार और यूट्यूब पर मनोरंजन के प्रोग्राम, टीवी सीरियल, फ़िल्में, क्रिकेट और फ़ुटबॉल से मन ऊबने लगा.
एक ज़माने में मैं ख़ाली समय में अंग्रेज़ी में कविताएं लिखा करता था. मैंने एक कविता लिखने की कोशिश की लेकिन मुझे लगा कि मेरी रचनात्मकता मर गई है.
दोस्तों और रिश्तेदारों से न मिलना खलने लगा, दफ़्तर और दफ़्तर के साथियों को मिस करने लगा और अपने ही घर की दीवारें जेल की दीवारों की तरह लगने लगीं. धीरे-धीरे बाहर की दुनिया से व्हाट्सएप द्वारा संपर्क दोबारा स्थापित किया, रिश्तेदारों को फ़ोन किया. साथियों से बातें कीं लेकिन आमने-सामने होने वाले कांटेक्ट और ह्यूमन टच का आभाव अब भी खल रहा था. फ़्रस्ट्रेशन कम नहीं हो रहा था. मेरे अंदर कुछ परिवर्तन सा होने लगा था.
ह्यूमन टच की कमी और काम की याद
मेरी पत्नी का हाल मुझ से कहीं बेहतर था लेकिन उसे मेरे बर्ताव पर आश्चर्य हो रहा था. हम दोनों एक ही छत के नीचे रह रहे थे लेकिन अकेलापन सा लग रहा था. हमारी हताशा का स्तर बढ़ने लगा. छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होने लगे.
अभी हम 15 दिन साथ यूरोप में थे तब तो सब कुछ ठीक था लेकिन अब ऐसा नहीं लग रहा था.
मैंने महसूस किया कि मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ता जा रहा था. मैंने एकांत में, कमरे के अँधेरे में, सोचना शुरू किया. मैं सोचने लगा कि मेरा मूड क्यों बदल गया है, मैं बुरा बर्ताव क्यों कर रहा हूं. मुझे एहसास होने लगा कि दुनिया से कट जाना हमारे दिमाग़ी हालात के लिए सही नहीं था.
हमें ये भी महसूस हुआ कि काम के बग़ैर ज़िंदगी अधूरी है. मेरे जीवन में और ख़ास तौर से 30 साल पहले पत्रकार बनने के बाद से मेरी ज़िन्दगी में कोई ऐसा समय नहीं आया था कि जब मैं 15 दिनों तक घर में बैठा रहा और वो भी समाज और परिवार से अलग-थलग रहकर.
मैं दिन गिन रहा था. मैं 14 दिन ख़त्म होने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था. इत्तेफ़ाक़ से जब 14 दिन ख़त्म होने में कुछ दिन रह गए थे तो ऑफ़िस से फ़ोन आया ये पूछने कि क्या मैं घर से काम कर सकता हूँ. प्यासे को पानी नहीं तो और क्या चाहिए? मैं तुरंत तैयार हो गया.
काम शुरू होते ही मिज़ाज और बर्ताव में सुधार आने लगा, बीवी के साथ झगड़े कम होने लगे और ख़ालीपन का एहसास जाने लगा.
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