चंद्रयान-3 के बाद चांद के दक्षिणी ध्रुव पर जाने की क्यों लगी होड़? 50 साल बाद इंसानों को भेजने की तैयारी
चंद्रयान-3 की सफलतापूर्वक लैंडिंग के बाद चांद के दक्षिणी ध्रुव पर जाने की होड़ सी मच गई है। भारत की इस कामयाबी के बाद सबसे पहले हरकत में अमेरिका का नासा आया है। वह भी आने वाले समय में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर कई रोबोटिक मिशन भेजने वाला है। 2025 में उस क्षेत्र में वह इंसान को भी उतारना चाहता है। 5 दशक से भी ज्यादा समय बाद नासा इस तरह के मिशन में जुटा है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की कामयाबी को पूरी दुनिया में सराहा जा रहा है। क्योंकि, इसने चंद्रयान-3 के लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतारा है, जो अभी तक दुनिया का कोई देश नहीं कर पाया था। इसलिए अमेरिकी अंतरिक्ष संगठन नासा चंद्रयान-3 मिशन का सूक्ष्म अध्ययन करने में जुटा हुआ है।

नासा ने मानव मिशन के लिए की जियोलॉजी टीम की घोषणा
जिस दिन भारत ने चांद के दक्षिणी ध्रुप पर उतरकर विश्व इतिहास रचा है, उसी दिन नासा ने 2025 में भेजे जाने वाले अपने इंसानी मिशन के लिए जियोलॉजी टीम का ऐलान किया। यह सिर्फ संयोग नहीं है। नासा चंद्रयान-3 मिशन से काफी कुछ सीख रहा है। वह आर्टेमिस III मिशन के माध्यम से चांद के दक्षिणी ध्रुव पर 50 साल बाद इंसानों को भेजने की तैयारी में जुटा है।
चांद पर पहली महिला अंतरिक्ष यात्री को भेजने की तैयारी
बुधवार को नासा ने ऐलान किया है कि इसके लिए उसने एक जियोलॉजी टीम चुना है। 2025 के दिसंबर में आर्टेमिस III में जो अंतरिक्ष यात्री चांद पर जाएंगे, उसमें पहली महिला भी शामिल होगी। यह करीब 30 दिन का मिशन होगा। जियोलॉजी टीम मिशन के लिए सरफेस साइंस प्लान तैयार करेगी, जिससे इंसानों के ज्यादा समय तक चांद की सतह पर ठहरना मुमकिन हो सके।
चंद्रयान-3 के डेटा की मदद से खुद को अपडेट करेगा आर्टेमिस III मिशन
इससे पहले नासा 2024 में आर्टेमिस II मिशन भी भेजेगा, जिसमें चार अंतरिक्ष यात्री होंगे, जो सिर्फ चांद का चक्कर लगाकर लौटेंगे।आर्टेमिस मिशन के तहत अमेरिका इससे पहले कई सारे रोबोटिक लैंडर और रोवर भेजने की तैयारी में है। नासा चंद्रयान-3 से मिले डेटा के आधार पर अपने मिशन के पैरामीटर्स को सुधारता रहेगा।
अमेरिका के बाद रूस और चीन भी कर सकते हैं ऐलान
इसके बाद जल्द ही रूस और चीन की ओर से भी चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अपने लूनर मिशन भेजे जाने की संभावना बढ़ गई है। आने वाले समय में इस तरह की घोषणाएं देखने को मिल सकती हैं। अभी तक अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश चंद्रमा के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में कई लूनर मिशन भेज चुके हैं, लेकिन उनके ऑर्बिटर सिर्फ दक्षिणी ध्रुव की तस्वीरें ही खींच पाए थे।
दक्षिणी ध्रुव पर जाने की क्यों लगी होड़?
इन देशों के ऑर्बिटरों ने इतना जरूर पता लगाया था कि चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव इंसानी आउटपोस्ट स्थापित करने के लिए उपयुक्त है। अमेरिका की सक्रियता इसी वजह से बढ़ी हुई है। 90° वाले दक्षिणी ध्रुव पर छाएदार गड्ढों में स्थायी तौर पर वॉटर आइस की वजह से यह वैज्ञानिकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। चांद का यह क्षेत्र विभिन्न तरह के खनिजों से भी भरपूर है।
इसके अलावा यहां के गड्ढों में हाइड्रोजन के जीवाश्म भी हैं और इसके अध्ययन से वैज्ञानिकों को हमारे सोलर सिस्टम के बारे में और भी ज्यादा जानकारियां हासिल होने का अनुमान है। इस क्षेत्र के पहाड़ी चोटियों पर ज्यादा समय तक सूर्य की रोशनी मौजूद रहने से इंसानी आउटपोस्ट स्थापित होने पर उसे हमेशा सौर ऊर्जा मिलने की संभावना रहेगी।
खगोल वैज्ञानिक इस क्षेत्र को पृथ्वी से रेडियो सिग्नल प्राप्त करने के लिए भी आदर्श मानते हैं। चंद्रमा की सतह पर हाइड्रोजन के अलावा ऑक्सीजन, सिलिकॉन, लोहा, मैग्नीशियम, कैल्शियम, एल्यूमीनियम, मैंगनीज और टाइटेनियम की मौजूदगी की जानकारी है। इसमें ऑक्सीजन, लोहा और सिलिकॉन बड़ी मात्रा में होना अनुमानित हैं। इनमें वजन के हिसाब से 45% ऑक्सीजन की मात्रा अनुमानित है।












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