लोकसभा चुनाव: पशुपति पारस के NDA छोड़ने से बिहार में 'INDIA' को कितना फायदा?
Bihar Lok Sabha Election 2024: बिहार में एनडीए के सहयोगी दलों के बीच सीटें फाइनल होने के बाद जो आशंका थी, वह सच साबित हुई। राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) के नेता पशुपति पारस ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर एनडीए छोड़ने का ऐलान कर दिया है।
पारस की पार्टी के 5 सांसद 2021 से केंद्र में बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार का हिस्सा थी। जबकि, उनके भतीजे चिराग पासवान एलजेपी (रामविलास) के अकेले सांसद थे।

'अन्याय' की वजह से एनडीए से अलग हुए पशुपति पारस
एनडीए ने बिहार में चिराग की पार्टी के लिए 5 सीटें छोड़ी हैं और पारस को एक भी सीट नहीं दी है, इसलिए उन्होंने पार्टी के साथ 'अन्याय' का आरोप लगाते हुए मोदी सरकार से निकलने का फैसला किया है।
बीजेपी ने 5.5% पासवान वोट की वजह से चिराग पर किया भरोसा
यह स्पष्ट है की बीजेपी ने चाचा की जगह भतीजे पर भरोसा दिखाया है तो इसके पीछे करीब 5.5% पासवान वोट है, जो पूर्व केंद्रीय मंत्री और चिराग के पिता रामविलास पासवान की वजह से लोक जनशक्ति पार्टी के साथ जुड़ा रहा है।
उनके निधन के बाद उनके भाई पारस और बेटे चिराग के बीच पार्टी का बंटवारा जरूर हुआ, लेकिन माना जाता है कि सिर्फ 5 सांसद ही पारस के साथ रह गए, समर्थक आज भी चिराग के साथ जुड़ा हुआ है।
अन्य जातियों में भी चिराग की पैठ होने का दावा
लंबे समय से लोक जनशक्ति पार्टी के साथ बहुत करीब से जुड़े रहे एक व्यक्ति ने वनइंडिया को बताया है कि आज 99% पासवान वोट चिराग के साथ है। इसके अलावा उनकी हर वर्ग के मतदाताओं में पैठ है, जिनमें ब्राह्मण से लेकर यादव जाति के लोग भी शामिल हैं। उनके अनुसार अगर इस हिसाब से देखें तो चिराग के पास 7-8% वोट है।
युवाओं में भी चिराग के लोकप्रिय होने का दावा
उस व्यक्ति के मुताबिक बिहार में अभी दो ही युवा नेतृत्व उभर रहा है, जिसमें लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव के साथ-साथ चिराग पासवान शामिल हैं। बिहार बीजेपी के पास भी कोई ऐसा युवा जनाधार वाला नेता नहीं है।
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पारस का साथ छोड़ने लगे हैं पार्टी के नेता
तथ्य ये है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री पशुपति पारस के साथ जो लोग अभी तक थे, वे भी धीरे-धीरे पाला बदलना शुरू कर चुके हैं। वैशाली से एलजेपी सांसद वीना देवी और खगड़िया से पार्टी सांसद चौधरी मेहबूब अली कैसर भी उसमें शामिल हैं। ये लोग पहले ही चिराग के साथ जुड़ चुके हैं।
जानकारों की मानें तो तथ्य ये है कि पारस के साथ 5-5 सांसद चले गए थे और चिराग अकेले थे। इस वजह से पार्टी कार्यकर्ता भी पारस गुट के साथ जुड़े हुए थे, क्योंकि उनमें से अधिकांश की नजर एमपीलैड (MPLAD Fund) फंड पर थी। यह फंड सांसदों को अपने इलाके के विकास के लिए आवंटित किया जाता है।
पारस की तुलना चिराह की छवि हमेशा मुखर नेता की रही है
ऐसे में माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में संगठन का जो कैडर अबतक जो पारस गुट के साथ नजर आ रहा था, वह भी चिराग खेमे में वापस लौट सकता है।
एक हकीकत ये भी है कि पारस कभी भी बिहार की राजनीति में उतने मुखर नहीं रहे हैं, जितने चिराग हैं। पारस ने कभी भी अपने भाई से अलग उस तरह की पहचान नहीं बनाई, जो चिराग ने तैयार की है।
पारस ने साफ किया है कि वह अपनी हाजीपुर सीट नहीं छोड़ेंगे। हालांकि, अभी यह तय नहीं है कि उनकी पार्टी लोकसभा चुनावों में अकेले लड़ेगी या फिर वह इंडिया ब्लॉक में शामिल होगी।
बिहार में 'इंडिया' को कितना फायदा?
लेकिन, पारस को लेकर अभी तक जो सियासी इनपुट है, उसके बाद ऐसा लगता नहीं कि वह एनडीए से अलग रहकर उसे कोई खास नुकसान पहुंचाने की स्थिति में होंगे।
अगर ऐसा नहीं होगा तो इंडिया ब्लॉक में उनका शामिल होना भी सिर्फ सत्ताधारी गठबंधन के खिलाफ चुनावी 'धारणा' बनाने का काम कर सकता है, इससे विपक्षी कुनबे को कोई खास फायदा होगा, यह फिलहाल दूर की कौड़ी लग रहा है।
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