कभी हाथ में संविधान,कभी नीली कमीज, जानिए अंबेडकर सम्मान यात्रा से कांग्रेस क्या साधना चाहती है?
Congress Politics: संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ भीमराव आंबेडकर इन दिनों देश की सियासत का अहम बिंदु बने हुए हैं। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल हाल ही संसद में दिए गए भाषण के हवाले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए हैं। इस प्रकार संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर को लेकर सियासी विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। कांग्रेस का विरोध और प्रदर्शन संसद सत्र के खत्म होने के बाद भी जारी है।
कांग्रेस अमित शाह द्वारा की गई टिप्पणी को लेकर भाजपा के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन कर रही है। आज 24 दिसंबर कांग्रेस को देशभर में बाबा साहेब अंबेडकर सम्मान यात्रा निकाली है। इस बीच चर्चा सवाल उठ रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में पीटने के बाद क्या कांग्रेस किस रणनीति पर आगे बढ़ रही है।

अंबेडकर का नाम लेना बन गया है फैशन ?
गृहमंत्री अमित शाह की संसद में कहा था कि डॉ अंबेडकर का नाम लेना अब एक फैशन बन गया है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा, "अगर लोग भगवान का नाम लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग में रहते। इस बयान को लेकर कांग्रेस और विपक्षी दलों ने आंबेडकर का अपमान करार दिया है। कांग्रेस ने तो इस विवाद को और बढ़ाते हुए यह भी कहा कि अमित शाह को उनके मंत्रिमंडल से हटा दिया जाना चाहिए।

राहुल गांधी ने बदला कमीज का रंग, सफ़ेद से हुई नीली
बीते दिनों जब संसद में अंबेडकर पर टिप्पणी को लेकर हंगामे के दौरान राहुल गांधी की नीली टी-शर्ट चर्चा का विषय बन गई थी। हमेशा सफेद टी-शर्ट में पहनने वाले राहुल गांधी नीली शर्ट पहनकर संसद पहुंचे थे। उनकी बहन प्रियंका गांधी भी नीली साड़ी में नजर आ रही थी। दरअसल दोनों ने नीला रंग पहनकर अंबेडकर और दलित समुदाय के साथ अपना जुड़ाव प्रदर्शित करने का प्रयास किया था।

यह भी जानना जरूरी है कि राहुल गांधी ने इससे पहले 54वें जन्मदिन पर 'सफेद टी-शर्ट' कैंपेन शुरू किया था। तब उन्होंने बताया था कि सफेद रंग उनके लिए पारदर्शिता, सादगी और मजबूती का प्रतीक है। जिसकी वह वकालत करते हैं।
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हाथ में संविधान, लोकतंत्र बचाने की मुहीम
इससे पहले 8वीं लोकसभा का प्रथम सत्र में नवनिर्वाचित सांसदों के शपथ ग्रहण के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत कई विपक्षी सांसदों ने हाथ में संविधान की किताब लेकर शपथ ली थी। चाहे संसद की बैठक हो या कोई अन्य राजनीतिक कार्यक्रम राहुल गांधी हाथ संविधान की किताब की प्रति लेकर लगातार नजर आ रहे हैं।
कांग्रेस की अगुवाई में समूचे विपक्ष का कहना था कि भाजपा की वजह से देश में लोकतंत्र खतरे में हैं। मोदी सरकार आरक्षण समाप्त करना चाहती है,इसलिए पिछड़ों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए अंबेडकर निर्मित संविधान को बचाना जरूरी है।

इंडिया गठबंधन की अगुवाई, दलितों को भाजपा से दूर करने का मिशन
2024 के लोकसभा चुनावों में संविधान और आरक्षण का मुद्दा कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन के लिए सफलता का कारण बना। 2024 में संविधान और आरक्षण का नैरेटिव सेट करना कांग्रेस के अगुवाई वाले इंडिया गठबंधन का सफल रहा था, जिसके चलते दलित समाज बीजेपी से छिटक गया था।
लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी संविधान की कापी लेकर वोट मांग रहे थे और बाद संसद में भी हाथ में संविधान लेकर विपक्ष के कई सांसदों ने शपथ ली थी. यही वजह है कि कांग्रेस राज्यसभा में अमित शाह के दिए गए बयान को बाबा साहेब का अपमान बताकर दलित समाज का विश्वास जीतना चाहती है।
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जातीय जनगणना की वकालत, पिछड़ों को साधने की कवायद
देश की सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रही कांग्रेस के लंबे शासन के पीछे सवर्ण-दलित और मुस्लिम वोटों का गणित वजह माना जाता है. बसपा जैसी पार्टियों के उभार के बाद दलित और समाजवादी पार्टियों के उभार के बाद मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस से छिटक गया था। सवर्ण मतदाता भी भाजपा की ओर शिफ्ट हो गए. बसपा के कमजोर होने के बाद दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को कांग्रेस साधने में जुटी है। राहुल गांधी लगातार जातीय जनगणना का मुद्दा उठाकर पिछड़ों को न्याय दिलाने की बात कर रहे हैं।

अंबेडकर के अपमान का मुद्दा उठाकर कांग्रेस दलित वोट के बीच अपनी पैठ जमाने की कवायद में है, जिसके लिए आक्रमक रुख अख्तियार कर रखा है. इसकी वजह यह है कि बीजेपी की कोशिश कांग्रेस को अंबेडकर और दलित विरोधी कठघरे में खड़े करने की है। इस तरह बीजेपी और कांग्रेस दोनों की नजर दलित वोटबैंक पर है. कांग्रेस ने अपने सबसे बड़े दलित चेहरे मल्लिकार्जुन खड़गे को आगे रखा हुआ है।
बहुजन समाज पार्टी ने भी खुद को किया रिलांच
कांग्रेस खुद को अंबेडकरवादी साबित करने में जुटी है, तो वहीं मायावती की अगुवाई वाली बहुजन समाज पार्टी ने भी खुद को रिलांच किया है। मायावती के भतीजे आकाश आनंद ने अपने ताजा बयान में एक साथ सभी राजनीतिक प्रतिद्वंदियों पर निशाना साधते हुए कहा है कि पहले गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में अंबेडकर जी अपमान किया और फिर राहुल गांधी, प्रियंका गांधी ने हमारी नीली क्रांति को फैशन शो बनाया और उसके बाद अरविंद केजरीवाल ने बाबा साहब की छवि से छेड़छाड़ की। वोट के लिए बाबा साहब के नाम का इस्तेमाल आजकल फैशन हो गया है।

दलित क्यों हैं सियासत का केंद्र?
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आगामी चुनावों के मद्देनज़र, दलित मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। दिल्ली में दलितों की संख्या अच्छी खासी है, और उनकी वोटिंग की ताकत चुनाव परिणामों पर असर डाल सकती है।वहीं देशभर में दलित समुदाय की जनसंख्या 16.63 फीसदी है, जो करीब 20.14 करोड़ लोगों के बराबर है, जैसा कि 2011 की जनगणना से स्पष्ट होता है। देश के सभी 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अनुसूचित जातियां मौजूद हैं, जो कुल मिलाकर 1241 जातीय समूहों में बंटी हुई हैं।
इस आंकड़े से साफ है कि दलित समुदाय की सियासी ताकत और उनकी वोटिंग का महत्व केवल आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य कई सीटों पर भी उनकी भूमिका निर्णायक हो सकती है। लिहाजा कांग्रेस का अंबेडकरवादी हो जाना भविष्य को ध्यान में रखकर उठाया गया कदम प्रतीत होता है।












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