बाबरी विध्वंस में सबसे आगे रहा कारसेवक अब बन गया है मुसलमान, ओवैसी को दिया जवाब

नई दिल्‍ली। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्‍या में बाबरी मस्जिद को गिराने के लिए उसके गुंबद पर कुदाल लेकर चढ़ने वाले कभी आरएसएस से प्रभावित शिवसेना नेता बलबीर सिंह इस्‍लाम कबूल कर चुके हैं। अब उनका नाम मोहम्मद आमिर है। बलबीर उर्फ आमिर ने अयोध्‍या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी के उस बयान का जवाब दिया है जिसमें उन्होंने अयोध्या फैसले में मस्जिद निर्माण के लिए मिली 5 एकड़ जमीन को खैरात बताया था। आमिर ने कहा है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को जो जमीन मस्जिद बनाने के लिए मिली है, वह कोई खैरात नहीं बल्कि मुआवजा है। आपको बता दें कि ओवैसी ने अपने बयान में कहा था ' मुस्लिम समाज अपने कानूनी हक की लड़ाई लड़ रहा है और उसे कतई किसी खैरात की जरूरत नहीं है। ओवैसी ने एक बयान में कहा मेरे खयाल से हमें 5 एकड़ जमीन का प्रस्ताव ठुकरा देना चाहिए। हमें किसी सरपरस्ती की जरूरत नहीं है।'

बाबरी मस्जिद पर चढ़ने वाले सबसे पहले शख्‍स थे बलबीर

बाबरी मस्जिद पर चढ़ने वाले सबसे पहले शख्‍स थे बलबीर

1 दिसंबर 1992 को आमिर उन कारसेवकों में शामिल थे जो पूरे देश से अयोध्या पहुंचे थे। उसी साल 6 दिसंबर को, जैसा कि आमिर बताते हैं, वे बाबरी मस्जिद के गुंबद पर चढ़ने वाले पहले शख्स थे। बाद में जव वे अपने गांव पहुंचे थे, तो उनका किसी नायक की तरह स्वागत किया गया था।

मुस्‍लिम महिला से की शादी और अब चलाते हैं स्‍कूल, देते हैं इस्‍लाम का संदेश

मुस्‍लिम महिला से की शादी और अब चलाते हैं स्‍कूल, देते हैं इस्‍लाम का संदेश

आमिर की शादी एक मुस्लिम महिला से हुई है। आमिर स्कूल चलाते हैं और इस्लाम के संदेश लोगों तक पहुंचाते हैं। मोहम्मद आमिर और मोहम्मद उमर (एक अन्य कारसेवक जिन्होंने बाबरी विध्वंस में हिस्सा लिया था और उनका नाम योगेंद्र पाल था। उन्‍होंने भी बाद में इस्‍लाम कबूल कर लिया और नाम मोहम्‍मद उमर रख लिया) दोनों मिलकर अब तक 100 से ज्यादा मस्जिदों का निर्माण करा चुके हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में ऐसे आए थे बलबीर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में ऐसे आए थे बलबीर

2017 में मुंबई मिरर को दिए इंटरव्‍यू में बलबीर उर्फ मोहम्‍मद आमिर ने बताया कि वो दस साल के थे तो पूरी फैमिली गांव छोड़कर पानीपत शहर आ गई। गांव वालों के लिए पानीपत में अलग ही माहौल था। एकदम दुश्मनी वाला। बच्चे साथ खेलते नहीं थे और मारपीट रोज होती थी। इसी बीच एक दिन RSS की एक शाखा में जाना हुआ। वहां बलबीर को ‘आप' कहकर पुकारा गया। इतना सम्मान इस शहर में बलबीर को कभी मिला नहीं था। वहीं से अटैचमेंट हो गया। तकरीबन दस साल बाद बलबीर ने शिवसेना जॉइन की और साथ में भाइयों के साथ घर का बिजनेस संभालने लगे। पढ़ाई लिखाई चालू रही, रोहतक महर्षि यूनिवर्सिटी से ट्रिपल एमए किया। लाइफ नॉर्मल चल रही थी।

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