मुश्किलों के भंवर से निकल पाएंगे केजरीवाल?
दिल्ली में लाभ के पद से जुड़े मामले में केजरीवाल सरकार के 20 विधायकों की सदस्यता ख़त्म हो गई है. इन विधायकों में अलका लांबा, कैलाश गहलौत, मदनलाल और नरेश यादव के नाम अहम हैं.
आम आदमी पार्टी ने साल 2015 में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर दिल्ली में सरकार बनाई थी. इसके पहले भी अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में सरकार बनाई थी, लेकिन तब महज 49 दिनों में इस्तीफ़ा दे दिया था. उस वक्त दिखी जनता की नाराज़गी के बावजूद फिर से इतनी बड़ी जीत बेशक़ ग़ैर-मामूली थी.
2015 में सरकार बनाने के बाद अरविंद केजरीवाल ने अपने 21 विधायकों को संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त किया जिसे लाभ का पद माना जाता है. आखिरकार चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति को सिफ़ारिश भेजी कि इन विधायकों की सदस्यता रद्द की जाए जिसे मंज़ूर कर लिया गया.
आम आदमी पार्टी के 'अयोग्य' विधायकों ने पहले दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन राष्ट्रपति के चुनाव आयोग की सिफ़ारिश मंज़ूर करने के बाद उन्होंने कोर्ट से अपनी अर्ज़ी वापस ले ली.
मतलब साफ़ है कि अब इन 20 सीटों पर छह महीने के अंदर उपचुनाव होंगे.
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क्या बदलेगी जनता की राय?
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी कहते हैं, "पार्टी तो कोशिश करेगी खुद को 'विक्टिम' दिखाने की और जिनकी उनके साथ हमदर्दी है, वो इसे स्वीकार भी करेंगे. हाल में जो चुनाव हुए हैं दिल्ली में, एक राजौरी गार्डन में और एक बवाना में..तो एक में पार्टी जीती भी है. झुग्गी झोपड़ियों में, गरीब तबकों में, दिल्ली के छोटे इलाके में तो आप की पैठ ठीक है. लेकिन देखना होगा कि मध्यवर्ग में अब उनकी क्या स्थिति है."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार अभय दुबे का कहना है कि चुनाव में जनता इस तरह की बातों पर ध्यान नहीं देती है.
वो कहते हैं, "जनता तो 'आप' की व्यापक छवि पर वोट करेगी. आम आदमी पार्टी शहरी गरीबों की पार्टी है और शहरी गरीबों के पक्ष में उसने काफ़ी काम भी किया है. बिजली के दाम अभी तक आधे हैं. पानी के दाम आधे हैं. दरवाज़े तक सरकारी सुविधाएं पहुंचाने की योजना अपने आप में अनूठी है. दिल्ली की इस सरकार ने ऐसे कई काम किए जो बाकी राज्यों की सरकारों ने नहीं किए."
अभय दुबे कहते हैं कि ये सही है कि ये पार्टी बार-बार विवादों में फंस जाती है लेकिन ये कहना भी मुश्किल हो जाता है कि ये विवाद उनका अपना पैदा किया हुआ है या उन पर बीजेपी और कांग्रेस ने थोपा है. पिछले कुछ वक्त में उन्होंने काफी अच्छा काम किया है जिसका फ़ायदा उन्हें किसी भी चुनाव में होगा.
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क्या 20 विधायक कर पाएंगे वापसी?
प्रमोद जोशी मानते हैं कि 20 विधायकों के वापस जीत कर आने की संभावना कम है. पार्टी उन्हें फिर से टिकट देती है तभी ये समझ आ जाएगा कि पार्टी का उन पर कितना भरोसा है.
वो कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि 20 के 20 विधायकों को वो जिता पाएंगे. 20 में से 10 भी जिता ले गए तो वो उनकी बड़ी सफलता होगी."
अभय दुबे कहते हैं, "ज़्यादा संभावना इसी बात की है कि इन्हीं को दोबारा टिकट दी जाएगी. नए विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार बदले जा सकते हैं लेकिन इन चुनावों में बदले जाएंगे तो एक गलत संदेश तो जाएगा ही. अगर इन 20 में से 15 सीटें पार्टी ने नहीं जीती तो उसकी राजनीतिक साख खतरे में पड़ जाएगी."
कुछ अनोखा करेंगे केजरीवाल?
अरविंद केजरीवाल हमेशा अपने तरीके से सवालों से निपटते आए हैं. 49 दिनों में इस्तीफ़ा देने की बात हो, मुख्यमंत्री होते हुए दिल्ली पुलिस के खिलाफ धरने पर बैठने की बात हो या बॉन्ड भरने की बजाय गिरफ्तारी देने की बात हो.
क्या इस बार भी वो कुछ अनोखा करेंगे?
प्रमोद जोशी कहते हैं कि ये पार्टी पहले भी कभी भीतर से इतनी मज़बूत नहीं रही है कि इन सब दिक्कतों का मुक़ाबला आसानी से कर लेगी. ये भी देखना होगा कि अरविंद केजरीवाल का नेतृत्व पार्टी को एक बना कर रख पाता है या नहीं. पहली बार जब इस्तीफ़ा दिया तो परिस्थितियां अलग थी. वो अल्पमत सरकार थी. लेकिन 2015 के बाद पार्टी में इतनी हिम्मत नहीं है कि सारे विधायकों को इस्तीफ़ा दिलाकर चुनाव में ले जाएं.
"हाल के राज्यसभा चुनावों को देखकर लगा कि ये पार्टी तो बिल्कुल उसी रास्ते पर जा रही है जिस रास्ते पर बीजेपी या कांग्रेस या अन्य पार्टियां जाती हैं. तो क्या वो नैतिक ताकत या आदर्श पार्टी के अंदर जीवित हैं."
केजरीवाल के विकल्प
अभय दुबे कहते हैं कि आम आदमी पार्टी का भविष्य अंधकारमय नहीं है. अरविंद के पास एक ही विकल्प है - चुनाव लड़ना. जहां तक इन 20 सीटों पर चुनावों की बात है तो ये विधानसभा चुनावों से अलग हैं. बाकी जिस तरह से वो शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे हैं या दरवाज़े तक कुछ सरकारी सुविधाएं पहुंचाने की योजना बनाई है.. ये सब करते रहना चाहिए. उनके पास अपने 3 साल के काम का ब्यौरा है जिसे लेकर जनता के सामने पेश होंगे.
प्रमोद जोशी का कहना है कि केजरीवाल के पास विकल्प है कि अपने पक्ष को वो अच्छे से जनता के सामने रखें. वैसे पार्टी की असली परीक्षा तो 2020 में होगी.
प्रमोद जोशी कहते हैं, "केजरीवाल की राजनीति भी यही रही है कि वो जनता के सामने साबित करने की कोशिश करते हैं कि उन्हें काम नहीं करने दिया जाता. मेट्रो में, होर्डिंग पर यही नारा लगाया जा रहा था कि भ्रष्टाचारी लोग काम नहीं करने दे रहे हैं. बाद में वो हटाए भी गए. लेकिन अगर दिल्ली के वोटरों को वो समझाने में कामयाब हुए कि इन्हें काम नहीं करने दिया गया तो दोबारा जीत कर आएंगे."
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