हिमाचल की चुनावी बारात में बिना 'दूल्हे' के उतर सकती है कांग्रेस
हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिये मात्र चार महीने बचे हैं। चुनावों की घोषणा किसी भी समय हो सकती है लेकिन सत्तारूढ़ दल कांग्रेस की अंदरूनी हालत खस्ता है।
शिमला। हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिये मात्र चार महीने बचे हैं। चुनावों की घोषणा किसी भी समय हो सकती है लेकिन सत्तारूढ़ दल कांग्रेस की अंदरूनी हालत खस्ता है। पार्टी, संगठन में बदलाव की बात तो कर रही है लेकिन बदलाव के बाद मौजूदा अध्यक्ष सुखविन्दर सिंह सुक्खू की जगह किसे पार्टी की बागडोर थमाई जाएगी यह कोई नहीं जानता। राम भरोसे चल रही पार्टी का खेवनहार कौन होगा इस पर अभी सवाल उठा ही था कि अब पार्टी की प्रदेश प्रभारी अंबिका सोनी को लेकर भी बहस छिड़ गई है।

अंबिका सोनी नहीं जाएंगी हिमाचल
अंबिका सोनी ने अपने स्वास्थय कारणों से डाक्टरों की ओर से सफर न करने की दी गई सलाह के बाद हिमाचल में पार्टी मामलों को देखने के लिये साफ तौर पर मना कर दिया है। यही वजह है कि अंबिका सोनी हिमाचल नहीं जा रहीं और उन्होंने पार्टी आलाकमान से उनकी जगह किसी दूसरे नेता को प्रदेश की बागडोर थमाने को कहा है। हालांकि पिछले दिनों उन्होंने दिल्ली में एक बैठक प्रदेश के नेताओं से की थी लेकिन इसी बैठक के बाद अंबिका सोनी ने दस जनपथ में हिमाचल के नेताओं की मौजूदगी में साफ कर दिया था कि वह हिमाचल नहीं जा पायेंगी। वहीं दूसरी ओर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुखविन्दर सिंह सुक्खू को हटाने को लेकर मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह व उनके सर्मथक विधायक और पार्टी में मौजूद वीरभद्र सर्मथक एकजुट हो गये हैं। यह लोग अगले चुनावों से पहले सुक्खू को हटाने के लिये लामबंद हो गये हैं।

चुनाव जीतने के लिए सुक्खू को हटाना जरूरी
बताया जा रहा है कि वीरभद्र सिंह ने पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मिलकर साफ कह दिया है कि पार्टी को अगर चुनाव जीतना है तो सुक्खू को हटाया जाये व पार्टी की बागडोर किसी ओर नेता को थमाई जाये। वीरभद्र सिंह की ओर से बढ़ते दवाब के चलते सुक्खू बैकफुट पर आ गये हैं। निसंदेह हिमाचल की राजनिति में वीरभद्र सिंह की तरह सुक्खू को कोई करिशमाई नेता नहीं माना जाता। न ही उनके पास अपना कोई वोट बैंक है। लेकिन पार्टी की अंदरूनी लड़ाई का फायदा हमेशा सुक्खू लेते रहे हैं। खासकर वीरभद्र विरोधी लाबी के बल पर उन्होंने अपनी राजनिति चमकाई है। उधर वीरभद्र सिंह अपनी बढ़ती उम्र के बावजूद आज भी प्रदेश में लोकप्रिय नेता हैं। लेकिन उनके खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों की वजह पार्टी आलाकमान में उनकी पूछ घटी है।

वीरभद्र सिंह को कमान सौंपने में आनाकानी क्यों?
यही वजह है कि भारी दवाब के बावजूद पार्टी आलाकमान अभी गुजरात में चुनावों के लिये पार्टी प्रभारी के तौर पर पार्टी महासचिव अशोक गहलोत की तैनाती की तरह हिमाचल के मामले में काई भी ठोस फैसला अब तक नहीं ले पाया है। दोनों ही प्रदेशों में चुनाव होने जा रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस में अनिश्चितता का महौल बना हुआ है। संगठन के नेता व विधायक अपने नेताओं के मुंह ताक रहे हैं कि पार्टी कब इस ओर कोई फैसला लेती है। पार्टी के एक वरिष्ठ विधायक ने कहा कि मौजूदा हालत में हमें लग ही नहीं रहा है कि हम चुनाव लड़ने जा रहे हैं। पार्टी के सभी विधायकों ने बाकायदा एक प्रस्ताव पास कर आलाकमान को कहा है कि पार्टी चुनाव वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में लड़ेगी और वही सर्वमान्य नेता हैं। जब पूरी पार्टी वीरभद्र सिंह को समर्थन दे रही है तो पार्टी आलाकमान में उन्हें आगे लाने के लिये काई हिचकिचाहट क्यों हो रही है। यह समझ से परे है। अब भी वक्त है कि वीरभद्र सिंह को कमान थमा दी जाये। उन्होंने कहा कि आज उन्हें ही नहीं पता कि अंबिका सोनी प्रभारी के तौर पर काम कर रही हैं कि नहीं। पार्टी अध्यक्ष सुक्खू पद पर बने रहेंगे कि हट जायेंगे।

बिना दूल्हे की बारात में कैसे उतरें?
चुनाव की दहलीज पर बैठे प्रदेश के सत्तारूढ़ दल के ऐसे हालात का पूरा फायदा भाजपा ले रही है। भाजपा ने अपना धुआंधार प्रचार अभियान शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अपने दौरे कर रहे हैं। लेकिन संगठन से तनातनी के चलते वह महौल नहीं बन पा रहा जिसकी दरकार है। प्रदेश के बड़े कांग्रेसी नेता भी अब कह रहे हैं कि हालात पार्टी के अनूकूल नहीं हैं और पार्टी को पंजाब से सीख लेनी चाहिये जहां न केवल चुनाव अभियान समय रहते शुरू किया गया, बल्कि सीएम का चेहरा भी पहले ही घोषित किया गया जिससे पार्टी को चुनाव में जीत मिली लेकिन यहां पार्टी हमें बिना दूल्हे की बारात में बाराती बनने को कह रही है।












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