शिक्षिका की नौकरी छोड़ पन्नाबेन ने शुरू किया उद्योग, 30 हजार महिलाओं को मिला काम, बनीं आत्मनिर्भर
सुरेंद्रनगर। गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के एक कॉलेज में अंग्रेजी की प्राध्यापिका पन्नाबेन शुक्ल ने नौकरी छोड़कर महिलाओं के लिए जो किया, उसे जानकर हर कोई पन्नाबेन की प्रशंसा करना चाहेगा। पन्नाबेन ने करीब 37 साल पहले साथी महिलाओं के साथ मिलकर अपने गांव वढवाण में एक गृह उद्योग शुरू किया था। जिसमें 'कर्म ही पूजा है' को ध्येय मानते हुए महिला सशक्तिकरण में जुट गईं। अब तक वह करीब 30 हजार महिलाओं को रोजगार दे चुकी हैं। जिनमें काफी विधवा औरतें भी शामिल हैं और पन्नाबेन उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए तत्पर हैं। अब दूर-दराज की औरतें भी उनसे मदद मांगती हैं और वे न नहीं कहतीं।

शिक्षिका की नौकरी छोड़ शुरू किया उद्योग
पन्नाबेन बताती हैं कि, वह सुरेंद्रनगर के कॉलेज एम.पी. शाह कॉमर्स कॉलेज में अंग्रेजी की प्राध्यापिका थीं। सुबह की शिफ्ट पूरी होने के बाद जब दोपहर को फ्री होती थीं तो वे खाली समय का सदुपयोग करने के लिए साथी महिलाओं के साथ मिलकर घरेलू कार्यों का उद्योग करने लगीं। जिसमें खाद्य प्रसंस्करण के साथ-साथ कंप्यूटर, बेसिक नर्सिंग पाठ्यक्रम, ड्रेस डिजाइनिंग, मोबाइल मरम्मत, आर्ट एंड क्राफ्ट, ब्यूटी पार्लर जैसे काम शामिल हैं। ये गृहउद्योग पन्नाबेन ने अपने गांव वढवाण में करीब 37 वर्ष पहले शुरू किया था। उस दरम्यान 11 महिलाओं ने बचत से 121 रुपए दिए और 1111 रुपए से पन्नाबेन ने सेवा यज्ञ की शुरुआत की। उनके साथ महिलाओं ने खाखरे, पापड़ और अचार आदि बनाना शुरू किया।

आत्मनिर्भर भारत अभियान की मिसाल बनीं
पन्नाबेन को अपने गृह उद्योग के लिए जगह चाहिए थी। जिसके लिए मानद कोषाध्यक्ष ऊषाबेन से बात की। तब ऊषाबेन ने अपने मकान का एक कमरा उपलब्ध करवाया। करीब 6 महीने तक वहां काम करने के बाद महिलाओं की संख्या बढ़ने पर 1990 में उन्होंने अपने गृह उद्योग का रजिस्ट्रेशन करा लिया। फिर तो कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ती चली गई। सुरेंद्रनगर जिले के गांवों के अलावा अहमदाबाद और मुंबई तक उनका सामान बिकने लगा।

'महिलाओं के लिए समय की पाबंदी नहीं'
अब उनके द्वारा तैयार किए जाने वाले खाखरे, पापड़ और अचारों की बड़ी मांग है। पन्नाबेन कहती हैं कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के नारे को वह अपने लिए सटीक मानती हैं। वह कहती हैं कि गृह उद्योग में काम करने वाली महिलाओं के लिए समय की पाबंदी नहीं है। उनके उद्योग से जुड़ी महिलाएं रोजाना करीब 200-250 रुपए का काम करती हैं और हर महिला को हर महीने चिकित्सा खर्च के लिए भी 500 रुपए दिए जाते हैं।

हजारों महिलाओं को मिला काम
पन्ना कहती हैं कि, अब तक हजारों महिलाएं हमारे गृहउद्योग से जुड़ीं। हमारी ओर से उन्हें हर साल ट्रिप भी कराई जाती है। वो कहती हैं कि, सालाना कारोबार 4 करोड़ रुपए के आसपास होता है। लेकिन ज्यादा अहम ये है कि इससे काफी महिलाओं को काम-धंधा मिला है। गांवों में अब महिलाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है। उनके काम अब 625 गांवों में कराए जा रहे हैं।












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