Iqbal: कौन थे मुहम्मद इकबाल, जिन पर अध्याय को दिल्ली विश्वविद्यालय ने पाठ्यक्रम से हटाया

इकबाल का मानना था कि इस्लामिक धार्मिक कानून "शरिया" के पालन के लिए अलग मुस्लिम राज्य का होना बेहद जरूरी है।

Iqbal

बीते 26 मई को दिल्ली विश्वविद्यालय की एकेडमिक काउंसिल की बैठक हुई। इस बैठक में एक प्रस्ताव पारित करके उर्दू के मशहूर शायर और कट्टर इस्लामिक धार्मिक विद्वान मोहम्मद इकबाल पर सामग्री को राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम से हटाने का फैसला किया गया।

गौरतलब है कि मोहम्मद इकबाल को बीए में राजनीति विज्ञान के अध्याय 'मॉडर्न इंडियन पॉलिटिकल थॉट' में पढ़ाया जाता था। यह अध्याय बीए के छठे सेमेस्टर के पाठ्यक्रम का हिस्सा है। अब इस प्रस्ताव पर अंतिम मुहर विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद (Executive Council) को लगानी है, जिसकी बैठक 9 जून को होनी है।

इस अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि इकबाल ने मुस्लिम लीग और पाकिस्तान आंदोलन के समर्थन में कविताएं लिखी थीं। भारत के विभाजन और पाकिस्तान की स्थापना का विचार सबसे पहले इकबाल ने ही दिया था। हमें ऐसे व्यक्तियों को पढ़ाने की बजाय अपने राष्ट्र नायकों के बारे में जानना चाहिए।

कौन थे मोहम्मद इकबाल?
मोहम्मद इकबाल को अल्लामा इकबाल भी कहा जाता है। 'अल्लामा' का मतलब विद्वान होता है। इकबाल का जन्म 9 नवंबर 1877 को अविभाजित पंजाब के सियालकोट में हुआ था। साल 1899 में उन्होंने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से स्नातक किया और फिर वहीं पढ़ाने लगे। साल 1905 में इकबाल आगे की पढ़ाई के लिए लंदन चले गए और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज में अपना नामांकन कराया। साल 1907 में वह जर्मनी के म्यूनिख चले गए और वहां के लुडविंग मैक्सिमिलियन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री ली। इसके बाद, उन्होंने कानून की भी पढ़ाई की।

साल 1908 में इकबाल भारत लौटे और लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में फिर से पढ़ाने लगे। लेकिन दो वर्षों में ही उन्होंने यहां की नौकरी छोड़ दी। साल 1910 में उन्होंने वकालत शुरू की। फिर 1919 में इकबाल ने वकालत भी छोड़ दी और अंजुमन-ए-हिमायत-ए-इस्लाम के महासचिव बने। साल 1922 में ब्रिटिश सरकार ने इकबाल को नाइटहुड की उपाधि प्रदान की, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

साल 1927 में इकबाल पंजाब विधानसभा के सदस्य चुने गए। 1928-29 में इकबाल ने अलीगढ़ विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय और मद्रास विश्वविद्यालय में छह भाषण दिए। इन्हीं भाषणों को बाद में किताब का स्वरूप प्रदान किया गया, जिसका शीर्षक था, 'द रिकंस्ट्रक्शन ऑफ रिलीजियस थॉट इन इस्लाम'।

इकबाल के पूर्वज हिंदू थे
वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह ने अपने एक लेख में लिखा है कि इकबाल के दादा कश्मीरी हिंदू ब्राह्मण थे। इकबाल के पिता का नाम नूर मोहम्मद था। दरअसल, इकबाल के दादा पंडित कन्हैयालाल सप्रू के पिता का नाम बीरबल सप्रू था। वह शोपियां-कुलगाम रोड के पास के एक गांव सपरैन के रहने वाले थे। इसलिए उनका सरनेम सप्रू हो गया। बाद में उनका परिवार श्रीनगर में बस गया और फिर सियालकोट चले गए।

बीरबल सप्रू के पांच बेटे और एक बेटी थी। उनके तीसरे बेटे का नाम था कन्हैयालाल सप्रू। कन्हैयालाल की शादी इंद्राणी सप्रू से हुई थी। कन्हैयालाल और इंद्राणी सप्रू के बेटे का नाम था रतनलाल सप्रू। रतनलाल ने इस्लाम कबूल किया था और उनका नाम नूर मोहम्मद हो गया था। नूर मोहम्मद की शादी एक मुस्लिम महिला इमाम बीबी से हुई थी। इन्हीं के बेटे का नाम इकबाल रखा गया।

इकबाल ने की तराना-ए-मिल्ली की रचना
इकबाल की कविता 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा' के बारे में अधिकतर लोग परिचित हैं। इसे 'तराना-ए-हिन्द' कहा जाता है। इकबाल की यह कविता 16 अगस्त 1904 में 'इत्तेहाद' नामक एक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद, उन्होंने इसी कविता को लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में छात्रों के बीच गाया था।

हालांकि, उसी इकबाल में कुछ ही वर्षों में ऐसा परिवर्तन आया कि साल 1910 में उन्होंने 'तराना-ए-मिल्ली' की रचना कर डाली। इस कविता का शीर्षक है, 'मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहां हमारा'। इस कविता की पंक्तियां इस प्रकार हैं, "चीन-ओ-अरब हमारा, हिन्दोस्तां हमारा। मुस्लिम हैं हम सारा जहां हमारा।"

यानि जो इकबाल 1904 में हिंदुओं और मुसलमानों के लिए पूरी दुनिया से अच्छा हिंदुस्तान को बता रहे थे। वही इकबाल 1910 में चीन, अरब, हिंदुस्तान और यहां तक की पूरी दुनिया को मुसलमानों का बताने लगे और अल्लाह के अलावा किसी दूसरे ईश्वर के अस्तित्व पर ही सवाल उठाने लगे।

मुस्लिम लीग के मंच से विभाजन की नींव
हालांकि, द्विराष्ट्र के सिद्धांत का जनक सर सैयद अहमद खान को कहा जाता है। सर सैयद अहमद खान ने साल 1876 में ही कह दिया था कि "मुझे पूर्ण विश्वास है कि हिंदू और मुसलमान मिलकर कभी एक राष्ट्र बना ही नहीं सकते। क्योंकि, उनका धर्म और जीवन जीने का तरीका एक दूसरे से बिल्कुल अलग है।"

वहीं, इकबाल ने मुस्लिम लीग के अधिवेशन में भारत विभाजन की नींव ही रख दी। दरअसल, 29 दिसंबर 1930 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में मुस्लिम लीग के 25वें अधिवेशन में मोहम्मद इकबाल को मुस्लिम लीग का अध्यक्ष चुना गया था। अपने अध्यक्षीय भाषण में इकबाल ने कहा कि मैं पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस), सिंध और बलूचिस्तान को एक संयुक्त राज्य के रूप में देखना चाहता हूं। वह चाहे ब्रिटिश राज का हिस्सा रहे या उसके बिना। मुझे एक एकीकृत उत्तर-पश्चिम मुस्लिम राज्य का गठन ही उत्तर-पश्चिम भारत के मुसलमानों की अंतिम नियति प्रतीत होती है। इकबाल ने कहा कि यह प्रस्ताव नेहरू कमेटी के सामने रखा गया था। लेकिन उन्होंने इसे इस आधार पर खारिज कर दिया कि अगर इस प्रस्ताव को लागू किया जाता है, तो यह बिल्कुल ही एक 'जटिल राज्य' होगा।

अलग मुस्लिम राज्य बनाने के पीछे का तर्क देते हुए इकबाल ने कहा कि हिंदू बहुल देश में मुसलमान हमेशा दोयम दर्जे के नागरिक बनकर रह जाएंगे। उन्होंने आगे कहा कि ईसाईयत की तरह इस्लाम में कानून और धर्म अलग-अलग नहीं हो सकते। इसलिए इस्लामिक 'धार्मिक कानून' के पालन के लिए अलग मुस्लिम राज्य का होना बेहद जरूरी है।

जिन्ना के अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग के पीछे इकबाल
1930 में मुस्लिम लीग के नेताओं में आपसी खींचतान होने लगी। इससे परेशान होकर मोहम्मद अली जिन्ना लंदन चले गए। इकबाल का यह मानना था कि जिन्ना ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जो भारत में मुसलमानों के रहनुमा बन सकते हैं। इसलिए उन्होंने जिन्ना को लंदन से भारत लाने का प्रयास शुरू किया। इकबाल के अनुरोध पर जिन्ना भारत लौट आए।

जून 1937 में इकबाल ने जिन्ना को एक पत्र लिखते हुए कहा कि मुसलमानों पर गैर-मुसलमानों के वर्चस्व को कम करने के लिए मुस्लिम प्रांतों का एक अलग संघ ही एक मात्र विकल्प बचा है। उन्होंने आगे कहा कि भारत और विश्व के अन्य देशों को खुद के लिए निर्णय लेने का अधिकार है, तो उत्तर-पश्चिम भारत और बंगाल के मुसलमानों को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए?

इकबाल अपने जीवन के अंतिम दिनों तक दुनिया भर में घूम-घूम कर मुस्लिम लीग के लिए समर्थन जुटाते रहे। जब भी भारत की स्वतंत्रता की बात होती तो, इकबाल उसे यह कहकर खारिज कर देते कि जब तक मुसलमानों के लिए अलग राज्य का निर्णय नहीं किया जाता, तब तक स्वतंत्रता की बात ही बेमानी है।

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