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Varkari Sect: क्या है वारकरी संप्रदाय और कब से शुरुआत हुई पंढरपुर तीर्थयात्रा की

पुणे के पास आलंदी में रविवार को वारकरी भक्तों और पुलिस के बीच हाथापाई की घटना सामने आई है। महाराष्ट्र के विपक्षी दलों का आरोप है कि महाराष्ट्र पुलिस ने वारकरी भक्तों पर लाठीचार्ज किया है। जबकि पुलिस का कहना है कि तय कार्यक्रम के अनुसार संत ज्ञानेश्वर महाराज समाधि मंदिर में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गयी थी और एकबार में 75 लोगों को ही मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति थी।

लेकिन 400 भक्त एकसाथ मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश करने लगे। इस दौरान उन्होंने बैरिकेट्स भी तोड़ दिये। ज्सिके बाद पुलिस और वारकरी भक्तों के बीच कुछ झड़पें हो गयी। हालांकि, पुलिस ने कहा है कि किसी भी भक्त पर लाठी-चार्ज नहीं किया गया।

What is the varkari sect and when did the Pandharpur pilgrimage start

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी इस बात को स्पष्ट रूप से कहा है कि वारकरी भक्तों और पुलिस के बीच मामूली हाथापाई हुई है और उन पर कोई लाठीचार्ज नहीं किया गया है। गौरतलब है कि वारकरी भक्त हर साल आषाढ़ महीने की एकादशी के दिन पुणे के आलंदी से पंढरपुर के श्री विट्ठल-रुक्मिनी मंदिर तक शोभायात्रा निकालते हैं।

कौन हैं वारकरी?
वारकरी भगवान विठोबा (भगवान कृष्ण के एक रूप) के भक्तों को कहा जाता है। जिसका अर्थ परिक्रमा और यात्रा करने वाले। वारकरी संप्रदाय का संबंध हिंदू धर्म की वैष्णव परंपरा से है। इसके अनुयायी मुख्यतः महाराष्ट्र और उत्तरी कर्नाटक में अधिक है। वारकरी आमतौर पर धोती, अंगरखा, उपरना, टोपी और गले में तुलसी की माला पहनते हैं। वे माथे, गले, छाती और कान पर चंदन भी लगाते हैं। साथ ही, अपने कंधे पर एक भगवा झंडा लेकर भी चलते है। ये लोग हाथ में वीणा लेकर हरि का नाम जपते हुए यात्रा करते है। यह संप्रदाय शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन में विश्वास रखता है।

वारकरी सामाजिक जीवन में व्यक्तिगत बलिदान, क्षमा, सादगी, सह अस्तित्व, करुणा, अहिंसा, प्रेम और विनम्रता पर खास जोर देते हैं। वे तंबाकू और शराब से परहेज करते हैं। साथ ही सात्विक आहार पर जोर देते हैं और एकादशी के दिन उपवास करने सहित आत्मसंयम में विश्वास रखते हैं। इस समुदाय के प्रवर्तकों में प्रमुख रूप से संत ज्ञानेश्वर को जाना जाता है। संत ज्ञानेश्वर महाराष्ट्र के आलंदी गांव के रहने वाले थे। 'ज्ञानेश्वरी' व 'अमृतानुभव' उनकी प्रमुख रचनाएं हैं।

वारकरी परंपरा का इतिहास
पंढरपुर तीर्थयात्रा वारकरी परंपरा के सबसे सम्मानित संत ज्ञानेश्वर से भी पहले से अस्तित्व में है। 13वीं शताब्दी के संत ज्ञानेश्वर की रचनाओं में इस वार्षिक तीर्थयात्रा का उल्लेख मिलता है। संत ज्ञानेश्वर ने अपनी लेखनी में इस बात का उल्लेख किया है कि उनके पिता उन्हें पंढरपुर की यात्रा पर ले गए थे और उन्होंने भगवान विठोबा के दर्शन किये थे। ऐसा माना जाता है कि पंढरपुर तीर्थ परंपरा का पालन कम-से-कम पिछले आठ सौ वर्षों से किया जा रहा है।

इस संबंध में एक कहानी बहुत प्रचलित है कि ग्वालियर के सिंधिया वंश के एक दरबारी हैबतबाबा आरफळकर, संत ज्ञानेश्वर के भक्त थे। 1820 के दशक में सरदार हैबतबाबा महाराष्ट्र के सतारा की ओर यात्रा कर रहे थे। तभी कुछ डकैतों ने उनका अपहरण कर लिया। जब हैबतबाबा इन डकैतों की कैद में थे, तो उन्होंने अपने आप को बचाने के लिए संत ज्ञानेश्वर को याद किया और उनकी प्रार्थना की।

कहा जाता है कि उनकी प्रार्थना के कारण डकैतों के सरदार की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। इससे खुश होकर डकैतों के सरदार ने यह आदेश दिया कि हैबतबाबा को रिहा कर दिया जाए। इसके बाद, हैबतबाबा ने अपना बचा हुआ जीवन संत ज्ञानेश्वर की सेवा में समर्पित कर दिया।

संत ज्ञानेश्वर (1275-1296) के अतिरिक्त, संत नामदेव (1270-1350), संत एकनाथ (1533-1599) और संत तुकाराम (1608-1650) जैसे संतों ने भी वारकरी के संदेशों का प्रचार प्रसार किया है।

कैसे निकलती है शोभायात्रा?
हैबतबाबा ने ज्ञानेश्वर महाराज के लिए एक अलग से शोभायात्रा की शुरुआत की। उस समय ज्ञानेश्वर महाराज की शोभायात्रा संत तुकाराम की शोभायात्रा के साथ ही निकलती थी। हैबतबाबा ने इस शोभायात्रा को एक भव्य आयोजन में बदल दिया, जिसमें पालकी, हाथी, घोड़े, वाद्य यंत्र और हजारों भक्त शामिल होने लगे। यह परंपरा आजतक जारी है।
संत तुकाराम की शोभायात्रा देहू से शुरू होती है और अकुर्दी, पुणे, लोनी कालभोर, यवत, बारामती, इंदापुर, अकलूज और वाखरी होते हुए पंढरपुर पहुंचती है। वहीं, संत ज्ञानेश्वर की शोभायात्रा दूसरे रास्ते से निकलती है। यह आलंदी से निकलकर सासवड़, जेजुरी, लोनंद, फलटन, मालशिरस, शेगांव और वाखरी होते हुए पंढरपुर पहुंचती है।

इसके अतिरिक्त संत एकनाथ, संत निवृत्तिनाथ, संत सोपान काका, संत मुक्ताबाई और बाबाजी चैतन्य जैसे अन्य संतों की पादुकाओं को लेकर 68 पालकियां शोभायात्रा में शामिल होती हैं। इन शोभायात्राओं में कई लाख लोग शामिल होते हैं।

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