'सैनिटरी नैपकिन और अलग टॉयलेट अब ‘सुविधा’ नहीं, लड़कियों का अधिकार, सुप्रीम कोर्ट स्‍कूलों को लेकर हुई सख्‍त

देश की बेटियों की पढ़ाई अब सिर्फ किताबों और स्कूल तक सीमित मुद्दा नहीं रही, बल्कि उनकी बुनियादी जरूरतों से भी जुड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि सिर्फ सैनिटरी नैपकिन और लड़कियों के लिए सेपरेट वॉशरूम ना होने की वजह से कोई भी छात्रा पढ़ाई छोड़ने को मजबूर नहीं होनी चाहिए। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि स्कूलों में इन सुविधाओं को हर हाल में सुनिश्चित किया जाए, ताकि लड़कियों की शिक्षा बीच में न रुके।

बेटियां घर बैठने के लिए नहीं

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह पहल देश की महिलाओं और लड़कियों के भविष्य से जुड़ी है। अदालत ने कहा कि लड़कियां केवल सुविधाओं के अभाव में स्कूल छोड़कर घर के कामों तक सीमित न रह जाएं। अदालत ने इसे सामाजिक बदलाव की दिशा में अहम कदम बताया।

Supreme Court

केंद्र सरकार को दिए सख्त निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा कि वह सिर्फ आदेश जारी करने तक सीमित न रहे, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि राज्यों में इनका सही तरीके से पालन हो। अदालत ने पूछा कि क्या सभी राज्यों से लगातार डेटा लिया जा रहा है और जमीनी स्थिति की निगरानी की जा रही है।

केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने बताया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से लगभग ढाई महीने का डेटा जुटाया गया है। इस पर अदालत ने कहा कि निर्देशों का "अक्षरशः और भावना" दोनों के साथ पालन होना चाहिए।

हर तीन महीने में होगी निगरानी

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह इस मामले की निगरानी हर तीन महीने में करेगा। केंद्र सरकार को नियमित प्रगति रिपोर्ट दाखिल करनी होगी, जबकि सभी राज्यों को 15 अगस्त तक अपनी स्थिति रिपोर्ट केंद्र को सौंपनी होगी। अदालत ने चेतावनी देते हुए कहा कि किसी भी राज्य की ओर से रिपोर्ट देने में लापरवाही नहीं होनी चाहिए।

स्कूलों में क्या-क्या जरूरी होगा?

ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था

  • सभी स्कूलों में छात्राओं को मुफ्त ऑक्सी-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराए जाएं।
  • स्कूलों में कार्यात्मक और लिंग-पृथक शौचालय हों।
  • शौचालयों में पानी और साफ-सफाई की समुचित व्यवस्था हो।
  • जहां संभव हो, वहां सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनें लगाई जाएं।

यह आदेश सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी-सभी तरह के स्कूलों पर लागू होगा।

मासिक धर्म स्वास्थ्य भी मौलिक अधिकार

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में "मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार" भी शामिल है। अदालत के मुताबिक, सुरक्षित और सस्ती मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाएं लड़कियों के स्वास्थ्य, आत्मसम्मान और शिक्षा-तीनों के लिए जरूरी हैं।

पर्यावरण को लेकर भी उठा सवाल

सुनवाई के दौरान एक वकील ने "ऑक्सी-बायोडिग्रेडेबल" सैनिटरी नैपकिन को पर्यावरण के लिए नुकसानदायक बताते हुए चिंता जताई। इस पर अदालत ने केंद्र सरकार से कहा कि वह इस मुद्दे की भी समीक्षा करे और जरूरी कदम उठाए।

शिक्षा मंत्रालय होगा नोडल एजेंसी

सुप्रीम कोर्ट ने तय किया है कि इस पूरे मामले में आगे की अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने की जिम्मेदारी शिक्षा मंत्रालय की होगी। यानी अब स्कूलों में बेटियों की बुनियादी सुविधाओं की निगरानी सीधे केंद्र स्तर पर होगी।

क्यों अहम है यह फैसला?

देश के कई हिस्सों में आज भी मासिक धर्म के दौरान सुविधाओं की कमी के कारण लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं या कई दिनों तक अनुपस्थित रहती हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि बेटियों की शिक्षा और सम्मान से जुड़ा बड़ा सामाजिक संदेश माना जा रहा है।

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