जेएनयू- आश्चर्य तो तब होता जब छात्र 'हिन्दुस्तान जिंदाबाद' कहते

सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने के नाम पर दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में अचानक पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगने लगे। ऊंचे स्वर में छात्र कह रहे थे, "कितने अफज़ल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा।" कश्मीर की आजादी के नारे भी लगाये गये। ऐसा नारा लगाने वाले कोई और नहीं बल्कि वामपंथी छात्र संगठन आईसा एवं एसएफआई से जुड़े छात्र थे। पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे नये नहीं थे, ताज्जुब तो तब होता, अगर ये छात्र"हिंदुस्तान जिंदाबाद" कहते। जी हां असलम में यही है जेएनयू में कामरेड क्रांति का बेनकाब चेहरा।

JNU

इस बेनकाब चेहरे को पढ़ने से पहले चलते हैं उस कार्यक्रम में जहां छात्रों ने आतंकी अफजल को शहीद बताकर सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता पर अभद्र सवाल उठाये। हालांकि इसमें आश्चर्य करने जैसा कुछ भी नहीं है! हो भी क्यों, ऐसा तो वामपंथी दशकों से करते आ रहे हैं! ये वो हैं जो कभी 'भारत माता की जय' नहीं बोलते। कुछ ही महीनों पहले हीछात्र संघ के गठन के बाद पहली बैठक के दौरान भी वामपंथी छात्र का संगठनों का राष्ट्र विरोधी चेहरा बेनकाब हुआ था।

कश्मीर को अपना नहीं मानते हैं वामपंथी

बैठक में जम्मू-काश्मीर के संबंध में जब यह प्रस्ताव लाया गया कि 'जम्मू-काश्मीर भारत का अभिन्न अंग है', तो छात्र संघ के वामपंथी पदाधिकारियों ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट करके इसे पारित नहीं होने दिया था। जेएनयू छात्र संघ की प्रथम बैठक में एबीवीपी से निर्वाचित संस्कृत विभाग के काउंसलर ने जम्मू-काश्मीर से जुड़ा यह प्रस्ताव रखा था, जिसके पक्ष में कुल 12 वोट(सभी एबीवीपी) पड़े, जबकि विरोध में कुल 19 वोट (सभी वामपंथी) पड़े थे। लिहाजा यह प्रस्ताव पारित न हो सका।

जेएनयू में जब छात्र संघ की बैठक हो रही थी और वैचारिकता के धरातल पर जम्मू-काश्मीर को भारत का अंग मानने से वामपंथी छात्र नेता इनकार कर रहे थे, उसी दौरान जेएनयू को लेकर बाहर की मीडिया में एक और बहस चल रही थी। मीडिया ने अपने सूत्रों के हवाले से यह खबर खूब चलाई कि सुब्रमन्यम स्वामी को जेएनयू का अगला कुलपति बनाये जाने का प्रस्ताव मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा दिया गया है। मीडिया में यह खबर पुष्ट और अपुष्ट ढंग से खूब चली।

एंटी-नारकोटिक्स इकाई खुलनी चाहिये

जेएनयू के वामपंथी छात्र संगठन भी स्वामी के विरोध की कवायदों को लेकर बयानबाजी करने लगे। मामला इसलिए बड़ा हो गया क्योंकि खुद सुब्रमन्यम स्वामी ने इस मसले पर ट्वीट कर दिया। स्वामी ने यह तो स्पष्ट नहीं किया कि उनको ऐसा को प्रस्ताव मिला है या नहीं अथवा वो इसके लिए तैयार हैं कि नही, लेकिन उन्होंने यह जरुर कह दिया कि जेएनयू में एंटी-नारकोटिक्स ब्यूरो का कार्यालय खुलना चाहिए और राष्ट्र विरोधियों को कैम्पस से बाहर निकालने के लिए सीमा सुरक्षा बल तैनात किया जाना चाहिए।

स्वामी ने ट्वीट में लिखा, "मुझे लगता है कि जेएनयू के परिसर में नारकोटिक्स रोधी ब्यूरो का शाखा कार्यालय खोलने की जरूरत है, जो छात्रावासों में छापे मारे और नक्सलियों, जिहादियों और राष्ट्रविरोधियों को गिरफ्तार करे। बीएसएफ का शिविर भी हो।"

आज जब एक बार फिर वामपंथ का राष्ट्रविरोधी चेहरा बेनकाब हुआ है, तो कहीं न कहीं स्वामी के उस बयान की प्रासंगिकता बढ़ गयी है। अब यह मानना गलत नहीं होगा कि जेएनयू के सन्दर्भ में स्वामी की चिंता बेजा नहीं है, बल्कि उसके पुख्ता कारण हैं।

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