Sonia Gandhi: आज ही के दिन बनी थीं सोनिया गांधी पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष, जानें क्या हुआ था तब
आज ही के दिन 14 मार्च, 1998 में सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान पहली बार संभाली थी। तब से लेकर अब तक पार्टी पर सोनिया गांधी का ही दबदबा बना हुआ है। वह सबसे लंबी अवधि तक कांग्रेस की अध्यक्ष रही हैं।

Sonia Gandhi: 25 फरवरी 2023 को रायपुर में कांग्रेस पार्टी के 85वें अधिवेशन में सोनिया गांधी ने कहा कि यह मेरे लिए सम्मान की बात थी कि मैंने साल 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष पद संभाला और 25 वर्षों में पार्टी ने कई बड़ी उपलब्धियां हासिल की। मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि मेरी पारी 'भारत जोड़ो यात्रा' के साथ समाप्त हुई। हालांकि, सोनिया गांधी ने राजनीति से संन्यास की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की लेकिन खबरें यही चलीं कि उन्होंने रिटायरमेंट की घोषणा कर दी।
1998 में सोनिया गांधी को तब अध्यक्ष बनाने के लिए कांग्रेस के बड़े नेताओं ने मिलकर दो साल पहले पार्टी के अध्यक्ष बने सीताराम केसरी को बेइज्जत किया था। इस बात की पुष्टि वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई अपनी किताब में भी करते है। उनके अनुसार दिल्ली के 24, अकबर रोड मुख्यालय से सीताराम केसरी को बेइज्जत करके बाहर निकाला गया था।
राजीव गांधी की हत्या
इस कहानी की शुरुआत जून 1991 से होती है। जब तमिल आतंकी संगठन लिट्टे के एक आत्मघाती हमले में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गयी। इसके बाद कुछ सालों तक गांधी परिवार देश की सक्रिय राजनीति से अलग रहा। हालांकि, कांग्रेसी नेताओं का तकरीबन रोज ही सोनिया गांधी के आवास पर आना-जाना लगा रहता था। साथ ही उनसे कांग्रेस के मामलों में दखलंदाजी करने की गुहार भी लगाते थे।
राजीव गांधी के निधन के बाद चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और अन्य छोटी पार्टियों के कुछ सांसदों के समर्थन से सरकार बनी और पी.वी. नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने। साथ ही वे कांग्रेस अध्यक्ष भी चुने गए। इसी दौरान पार्टी में फूट पड़ने लगी और कांग्रेस में अंतकर्लह के कारण दो गुट बन गए। एक नरसिंहराव के समर्थकों का और दूसरा उनका विरोधी, जो गांधी परिवार के साथ होने का दावा करता था। तभी 1995 तक आते-आते पार्टी में बिखराव चरम पर पहुंच गया। तब पार्टी को एक ऐसे नेता की जरूरत थी, जिसे राजनीति का लंबा अनुभव व ज्ञान हो, बुजुर्ग हो ताकि सब उसकी बात मान सके और वह जमीनी नेता हो।
केसरी को कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाने की रणनीति
फिर पार्टी में अध्यक्ष का चुनाव हुआ और सितंबर 1996 को केसरी अध्यक्ष चुने गये। उस चुनाव में सीताराम केसरी, शरद पवार और राजेश पायलट के बीच मुकाबला था। 1996 के बाद केसरी को विरासत में एक बिखरी और कमजोर कांग्रेस मिली थी। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक अध्यक्ष बनने के बाद सीताराम केसरी की महत्वाकांक्षा खुद प्रधानमंत्री बनने की थी। तो केसरी ने अन्य प्रमुख नेताओं को महत्त्व नहीं दिया। इसी के साथ पार्टी में केसरी के खिलाफ अंसतोष की भावना भी पैदा होने लगी।
पूर्व राष्ट्रपति व कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे प्रणब मुखर्जी की किताब 'द कोयलिशन इयर्स 1996-2012' में इस बात जिक्र है कि कैसे सीतारम केसरी के समर्थन देने और लेने के कारण ही पहले एच.डी. देवगौड़ा और फिर इंद्र कुमार गुजराल की सरकार बनी और गिरी।
दरअसल साल 1996 में लोकसभा के चुनाव हुए। जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी 13 दिन तक प्रधानमंत्री रहे और बहुमत साबित नहीं कर पाने की वजह से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद, कांग्रेस के समर्थन से देवेगौड़ा के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा गठबंधन सरकार का गठन हुआ लेकिन, कुछ 18 महीनों बाद कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया। फिर कांग्रेस के समर्थन से ही इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे। लेकिन कुछ महीने बाद कांग्रेस ने फिर समर्थन वापस ले लिया। 1998 में देश मध्यावधि चुनाव के मुहाने पर आ खड़ा हुआ। 16 फरवरी से 28 फरवरी 1998 के बीच तीन चरणों में चुनाव संपन्न हुए।
1998 के चुनाव में कांग्रेस की हार
केसरी से नाराज कांग्रेसी नेता सोनिया गांधी के घर 10 जनपथ जाने लगे थे। इस बीच 1997 में सोनिया गांधी पहली बार कांग्रेस पार्टी की सदस्या बनी और खुलकर राजनीति में सक्रिय होने लगी थी। 1998 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 142 सीटें मिली थी। इस चुनाव में सोनिया गांधी तमाम कोशिशों के बावजूद नेहरू परिवार की पारंपरिक सीट अमेठी भी नहीं बचा सकी। सोनिया के सबसे भरोसेमंद सहयोगी अर्जुन सिंह और नारायण दत्त तिवारी भी चुनाव हार चुके थे। लेकिन, इन सबका ठीकरा सीताराम केसरी पर फोड़ा गया।
रोते हुए पार्टी की बैठक से निकले केसरी
अब इसके बाद सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी। जिसमें सबसे अहम भूमिका अर्जुन सिंह, जितेंद्र प्रसाद, माधव राव सिंधिया, गुलाम नबी आजाद और एके एंटनी जैसे नेताओं का बताया जाता है।
ये सभी नेता चाहते थे केसरी की जगह अब सोनिया गांधी अध्यक्ष पद की कमान संभालें। लेकिन, सोनिया की शर्त यह थी कि केसरी खुद से अपना पद छोड़ दें और सोनिया को आमंत्रित करें। इसी दौरान आम चुनावों में खराब प्रदर्शन की समीक्षा के लिए 5 मार्च को बैठक बुलाई गयी। इस पर प्रणब मुखर्जी अपनी किताब में लिखते हैं कि 5 मार्च 1998 को सीताराम केसरी ने कमेटी की मीटिंग बुलाई थी। जिसमें जितेंद्र प्रसाद, शरद पवार और गुलाम नबी आजाद ने सोनिया गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने की पेशकश की।
हालांकि, केसरी ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया और प्रणब मुखर्जी समेत दूसरे नेताओं पर साजिश का आरोप लगाया और बैठक से उठकर चल दिये। उस दौरान कांग्रेस मुख्यालय, 24 अकबर रोड से केसरी के रोते हुए बाहर निकलने की बात मीडिया में सुर्खियां बनीं।
इस पर पत्रकार राशिद किदवई अपनी किताब 'ए शार्ट स्टोरी ऑफ द पीपल बहाइंड द फॉल एंड राइज ऑफ द कांग्रेस' में लिखते हैं कि दिल्ली के 24, अकबर रोड मुख्यालय से सीताराम केसरी को बेइज्जत करके बाहर निकाला गया। उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाने में सोनिया गांधी को प्रणब मुखर्जी, शरद पवार, जितेंद्र प्रसाद और एके एंटनी का पूरा साथ मिला।
केसरी को बेइज्जत कर अध्यक्ष पद से हटाया
आखिरकार 9 मार्च 1998 को केसरी ने अपने इस्तीफे की घोषणा की, लेकिन कुछ ही घंटों बाद उन्होंने अपना मन बदलते हुए कहा कि उन्होंने सिर्फ इस्तीफे की मंशा जाहिर की थी। तब केसरी का तख्तापलट करने के लिए 13 मार्च को जितेंद्र प्रसाद ने कमेटी के सदस्यों के लिए एक लंच का आयोजन किया। मगर 14 मार्च की सुबह कमेटी के 13 सदस्य प्रणब मुखर्जी के घर पर जुटे और यहां केसरी को पद से हटाने के लिए एक प्रस्ताव तैयार हुआ।
14 मार्च को 11 बजे कमेटी की बैठक हुई, तब प्रणब मुखर्जी ने पार्टी प्रमुख के रूप में केसरी की सेवाओं के लिए उन्हें धन्यवाद दिया और सोनिया गांधी को पद संभालने का प्रस्ताव पेश किया। तब केसरी गुस्सा हो गये और हॉल से उठकर वाशरूम चले गये। कहते हैं कि जब सीताराम केसरी वाशरूम में थे तो कांग्रेस नेताओं ने बाहर से दरवाजा बंद कर दिया। केसरी अंदर दरवाजा पीटते रह गए। उसी दिन दोपहर के वक्त कमेटी ने औपचारिक रूप से अध्यक्ष की कुर्सी सोनिया को दे दी। आनन-फानन में केसरी की नेमप्लेट हटा दी गई और उसे कूड़ेदान में फेंक दिया गया। वहीं अध्यक्ष पद से हटाए गये, सीताराम केसरी जब 24, अकबर रोड को छोड़कर जा रहे थे। तभी यूथ कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने उनकी धोती खींचने तक की गुस्ताखी की थी।
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