Sawan Shivratri: सावन शिवरात्रि को कांवड़ में लाया गंगाजल चढ़ता है शिवलिंग पर
कांवड़ यात्रा पूर्णिमा पंचांग पर आधारित सावन माह के प्रथम दिन अर्थात प्रतिपदा से प्रारंभ होती है। यात्रा की शुरुआत भगवान शिव पर अर्पित करने वाले मंदिर से, गंगाजल भरकर लाने वाले स्थान की दूरी पर निर्भर करती है। कांवडियों को यह दूरी पैदल चलते हुए सावन शिवरात्रि के दिन तक पूरी करनी होती है।
इस बार श्रावण मास 4 जुलाई से प्रारंभ हो चुका है और इसकी समाप्ति 31 अगस्त को होगी। ऐसे में इस बार शिव भक्त तकरीबन दो महीने अपने आराध्य देव की पूजा करेंगे। 15 जुलाई को शिवरात्रि पर भक्त शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाएंगे। जल चढ़ाने के लिए शुभ मुहूर्त रात्रि 15 जुलाई रात 8:32 बजे से प्रारंभ होकर 16 जुलाई को रात 10:08 बजे तक रहेगी।

सावन में इस दिन चढ़ाएं गंगा जल
15 जुलाई, शनिवार शिवरात्रि, प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव शंकर की पूजा का विधान है।
- शिवरात्रि प्रथम प्रहर पूजा समय - शाम 7:21 से रात्रि 9:54 तक
- द्वितीय प्रहर पूजा समय - रात्रि 9:54 से रात्रि 12:27 तक
- तृतीया प्रहर पूजा समय - रात्रि 12:27 से 16 जुलाई प्रातः 3 बजे तक
- चतुर्थ प्रहर पूजा समय - प्रातः 3 बजे से सुबह 5:33 तक
इसके अलावा 30 जुलाई, रविवार को प्रदोष व्रत, 13 अगस्त, रविवार को प्रदोष व्रत, 14 अगस्त, सोमवार को शिवरात्रि व 28 अगस्त, सोमवार को प्रदोष व्रत होने पर विशेष पूजा होगी।
क्या होती है कांवड़?
दो मटकियों में किसी नदी या सरोवर का जल भरा जाता है और फिर उसे आपस में बंधी हुई बांस की तीन स्टिक पर रखकर उसे बांस के एक लंबे डंडे पर बांधा जाता है। इस अवस्था में आकृति किसी तराजू की तरह हो जाती है। आजकल तांबे के लोटे में जल भरकर इसे कंधे पर लटकाकर यात्रा की जाती है। यात्रा करने वालों को कांवड़िया कहते है। कांवड़िये यह जल ले जाकर पास या दूर के किसी शिव मंदिर में शिवलिंग का उस जल से जलाभिषेक करते हैं।
इस तरह निकलता है कांवड़ियों का जत्था
कांधे पर कांवड़ उठाए, गेरुआ वस्त्र पहने, कमर में अंगोछा और सिर पर पटा बांधे, नंगे पैर चलने वाले ये भक्त देवाधिदेव शिव को समर्पित होते है। 'हर-हर महादेव, बम-बम भोले बम, के साथ भोले बाबा की जय-जयकार करता यह जनसमूह स्वतः स्फूर्त सावन का महीना प्रारंभ होते ही चल पड़ता है।
पैदल यात्रा का नियम अनिवार्य
यात्रा प्रारंभ करने से पूर्ण होने तक का सफर पैदल ही तय किया जाता है। इसके पूर्व व पश्चात का सफर वाहन आदि से किया जा सकता है। कांवड़ यात्रा के नियम सख्त हैं, जो व्यक्ति इन नियमों का पालन नहीं करते, उनकी यात्रा अधूरी मानी जाती है। इसके अलावा उन्हें कई तरह की परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है। कांवड़ यात्रा के दौरान किसी भी तरह का नशा करना वर्जित है। इसके अलावा मांसाहारी भोजन करने की भी मनाही है। यात्रा के दौरान कांवड को जमीन पर नहीं रखना चाहिए। अगर कोई मनोकामना पूरी होने पर यात्रा कर रहे हैं तो उसी मनोकामना के हिसाब से यात्रा करने का विधान है।
यात्रा का उद्देश्य
यात्रा से व्यक्ति के जीवन में सरलता आकर उसकी संपूर्ण कामनाओं की पूर्ति होती है। कांवड़ यात्रा एक धार्मिक और भाव प्रधान अनुष्ठान है, जिसमें कर्मकांड के जटिल नियम के स्थान पर भावना की प्रधानता है जिसके फलस्वरूप इस श्रद्धा-कर्म के कारण महादेवजी की कृपा शीघ्र मिलने की स्थिति बनती है। यह प्रवास-कर्म व्यक्ति को स्वयं से, देश व देशवासियों से परिचित करवाता है। यह महादेव के प्रति भक्ति प्रर्दशित करने का एक अनूठा तरीका है।
चार तरह की होती है कांवड़ यात्रा
कांवड़ यात्रा पैदल ही निकाली जाती थी, लेकिन समय और सहूलियत के अनुसार आगे चलकर कांवड़ यात्रा के कई प्रकार और नियम कायदे बन गये। फिलहाल चार तरह की कांवड़ यात्रा निकालने का चलन है।
खड़ी कांवड़ - इस यात्रा में भक्त कंधे पर कांवड़ लेकर पैदल यात्रा करते हुए गंगाजल लेने जाते है। इसके नियम काफी कठिन होते हैं। इस कांवड़ को न तो जमीन पर रखा जाता है और न ही कहीं टांगा जाता है। यदि कांवड़िये को भोजन करना है या आराम करना है तो वो कांवड़ को या तो स्टैंड में रखेगा या फिर किसी अन्य कांवड़िए को पकड़ाएगा।
झांकी वाली कांवड़ यात्रा - समय के अनुसार आजकल श्रद्धालु झांकी वाली कांवड़ यात्रा भी निकालते हैं। इस यात्रा के दौरान कांवड़िए झांकी लेकर चलते हैं। वे किसी ट्रक, जीप या खुली गाड़ी और ट्रेक्टर में शिव प्रतिमा रखकर भजन गाते हुए या डीजे संग कांवड़ लेकर जाते हैं। इस दौरान शिव भक्त भगवान शिव की प्रतिमा का श्रृंगार करते हैं और भजनों और धार्मिक गानों पर थिरकते हुए कांवड़ यात्रा निकालते है।
डाक कांवड़ - यह वैसे तो झांकी वाली कांवड़ जैसी ही होती है। इसमें भी किसी गाड़ी में भोलेनाथ की प्रतिमा को सजाकर रखा जाता है और भक्त भजनों पर झूमते हुए जाते हैं। लेकिन जब मंदिर से दूरी 36 या 24 घंटे की रह जाती है तो कांवड़िए कांवड़ में जल लेकर दौड़ते हैं। ऐसे में दौड़ते हुए कांवड़ लेकर जाना काफी मुश्किल होता है। इसके लिए कांवड़िए पहले से संकल्प करते हैं।
दांडी कांवड़ यात्रा - इस यात्रा को सबसे कठिन यात्रा माना जाता है, क्योंकि जब शिवभक्त एक नदी के तट से यात्रा शुरू करते हैं तो वे दंडवत यानि लेटकर यात्रा पूरी करते है। इसकी वजह से इस यात्रा में कभी-कभी महीनों का समय भी लग जाता है।












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