Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

Bhagat Singh: भगत सिंह के दादा, पिता और चाचा, सभी थे देशभक्त और समाज सुधारक

भगत सिंह ने बचपन से ही अपने परिवार में समाज सुधार और देश की आजादी के लिए संघर्ष करने का जज्बा देखा था। परिवार के संस्कारों ने ही उन्हें देश की आजादी के लिए सर्वोच्च बलिदान देने की प्रेरणा दी थी।

shaheed diwas 2023 Bhagat Singh family interesting facts

Bhagat Singh: जीतेन्द्र नाथ सान्याल द्वारा साल 1931 में लिखी पुस्तक 'सरदार भगत सिंह' में जिक्र आता हैं कि भगत सिंह के पूर्वज सिख साम्राज्य का हिस्सा थे। गौरतलब है कि भगत सिंह पर लिखी यह सबसे पहली पुस्तक थी। 20वीं सदी की शुरुआत में भगत सिंह का परिवार जालंधर से लायलपुर (वर्तमान फैसलाबाद, पाकिस्तान) आ गया। दादा अर्जुन सिंह यहां आर्य समाज से जुड़ने वाले पहले सिखों में से एक थे। वह आसपास के गांवों में छुआछुत और अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ प्रचार करते थे।

जैसा अर्जुन सिंह का नजरिया था वैसा ही उनके दोनों बेटे - किशन सिंह और अजित सिंह सोचते थे। उन दिनों लोकमान्य तिलक का 'स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है' का नारा बहुत लोकप्रिय था। बड़े बेटे किशन सिंह उनसे बेहद प्रभावित होकर कांग्रेस में दिलचस्पी लेने लगे। इसी सिलसिले में एक बार उनका नेपाल जाना हुआ, लेकिन वहां से लौटने पर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

जबकि छोटे बेटे अजित सिंह के भाषण ब्रिटिश सरकार के लिए मुसीबत बन चुके थे। दरअसल, अजित सिंह ने सैय्यद हैदर मिर्जा के साथ मिलकर 'इंडियन पेट्रियट एसोसिएशन' की स्थापना की थी। इतिहासकार आर.सी. मजुमदार अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ द फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया' के दूसरे खंड में लिखते है कि लाला लाजपत राय जैसे राष्ट्रवादी नेता इस एसोसिएशन की कई सभाओं को संबोधित कर चुके थे।

अजित सिंह के बढ़ते प्रभाव के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्हें मांडले (वर्तमान म्यांमार का एक शहर) में 6 महीनों के लिए नजरबन्द कर दिया। वहां से 18 नवम्बर 1907 को वह लाहौर लौटे। अगले महीने कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन सूरत में आयोजित होने वाला था। अजित सिंह और किशन सिंह दोनों उस अधिवेशन में हिस्सा लेने सूरत चले गये।

वीरेंदर संधू अपनी पुस्तक 'भारतीय क्रांति के अग्रदूत - अमर शहीद भगत सिंह' में जिक्र करते है कि अजित सिंह से लोकमान्य तिलक इतना प्रभावित हुए कि सभा में उन्होंने अजित को विलक्षण प्रतिभा वाला व्यक्ति बताते हुए कहा था कि वह इस लायक है कि उन्हें स्वतंत्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति बनाया जाए। हमारे पास उनके जैसा दूसरा व्यक्तित्व नहीं है।

कांग्रेस के अलावा, क्रांतिकारियों के एक संगठन 'भारत माता सोसायटी' से अजित सिंह का गहरा नाता था। ब्रिटिश सरकार को जब इसकी भनक लगी तो उन्होंने एक ठोस केस तैयार किया। ऐसा कहा जाता है कि सरकार की मंशा उन्हें फांसी देने की थी। मगर बाद में अजित सिंह को ब्रिटिश सरकार ने भारत से बाहर निर्वासित कर दिया। इस प्रकार अगले 39 सालों तक वह विदेश में रहकर भारत की स्वाधीनता संबंधी गतिविधियों से जुड़े रहे।

वहीं अर्जुन सिंह के तीसरे बेटे स्वर्ण सिंह की भी रूचि अपने दोनों बड़े भाइयों जैसी थी। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें भी गिरफ्तार कर 2 साल की सजा सुनाई थी। मगर कैदियों पर होने वाले भीषण अत्याचारों के कारण वह बीमार रहने लगे और जेल में ही शहीद हो गये।

भगत सिंह का जन्म

भारत की सुरक्षा और अखंडता के लिए अपना योगदान देने वाले इस परिवार में 28 सितम्बर 1907 को भगत सिंह का जन्म हुआ। उस दिन भी उनके पिता किशन सिंह और चाचा स्वर्ण सिंह जेल में थे। फरवरी 1915 में गदर आन्दोलन, 1919 में असहयोग आन्दोलन और 13 अप्रैल 1919 का जलियांवाल बाग हत्याकांड के बीच भगत सिंह ने लाहौर के दयानंद एंग्लों वैदिक कॉलेज और नेशनल कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की।

साल 1923 में भगत सिंह ने अपना घर छोड़ दिया और कानपुर चले गये। उन दिनों कानपुर भी लाहौर की तरह क्रांतिकारियों का एक प्रमुख शहर था। दरअसल, वहां शचीन्द्रनाथ सान्याल, रामप्रसाद बिस्मिल और योगेशचंद्र चटर्जी के प्रयासों से क्रांतिकारियों के एक अखिल भारतीय संगठन - हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन की नींव रखी गयी थी। भगत सिंह भी इस दल के साथ जुड़ गये और उनका छद्म नाम 'बलवंत' रखा गया। मगर काकोरी घटना के बाद यह दल लगभग निष्क्रिय हो गया।

पहली गिरफ्तारी

इसके बाद, भगत सिंह फिर लाहौर वापस आ गये। यहां आकर वह अखंड भारत के लिए देशभक्ति की भावना नौजवानों में संचारित करने लगे। इसी बीच 1926 में दशहरा मेले में एक बम से हमला हो गया। उसी दौरान पुलिस काकोरी में ट्रेन से लूटे गये सरकारी खजाने के सुराग पता लगाने के लिए क्रांतिकारियों को पकड़ रही थी। इन्हीं दोनों घटनाओं के सिलसिले में पुलिस ने भगत सिंह को गिरफ्तार कर लिया।

भगत सिंह को 15 दिनों तक हिरासत में रखने के बाद किशोर सुधार केन्द्र भेज दिया गया। मुकदमा चला तो उच्च न्यायालय ने उन्हें 60 हजार रुपयों की जमानत पर रिहा कर दिया। हालांकि, सरकार के पास भगत सिंह के खिलाफ कोई सबूत ही नहीं था इसलिए यह केस भी यहीं समाप्त हो गया।

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन

हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के निष्क्रिय होने के बाद कानपुर के विजय कुमार सिन्हा और लाहौर के सुखदेव के साथ मिलकर भगत सिंह एक नये क्रन्तिकारी दल को संगठित करने में लग गये। 8-9 सितम्बर 1928 को दिल्ली के कोटला फिरोजशाह में एक बैठक बुलाई गयी। इसमें बिहार से दो, पंजाब से दो, एक राजस्थान और पांच संयुक्त प्रान्त से प्रतिनिधि मौजूद थे।

चन्द्रशेखर आजाद के पीछे अंग्रेज हाथ धोकर पड़े थे, इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें आने के लिए मना कर दिया गया। सुखदेव, फणीन्द्रनाथ बोस और मनमोहन बनर्जी भी इस बैठक में शामिल थे। यहीं से चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के नेतृत्व वाले 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन' की स्थापना की गयी।

बमों का परीक्षण

भगत सिंह दिसंबर 1928 में कोलकाता पहुंचे। उस वक्त वहां कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था। कोलकाता में उनकी मुलाकत त्रेलोक्य प्रतुलचन्द्र गांगुली, फणीन्द्रनाथ बोस और यतीन्द्रनाथ दास से हुई। यहां उन्होंने सेंट्रल असेम्बली (वर्तमान संसद) में एक बड़ा धमाका करने की योजना बनाई। जनवरी 1929 में वह आगरा लौट आये।

चंद्रशेखर आजाद, यतीन्द्रनाथ दास, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त और विजय कुमार सिन्हा के साथ उन्होंने इस योजना पर काम करना शुरू कर दिया। अपने बनाये गये बमों को इन क्रांतिकारियों ने झाँसी में परीक्षण किया और वह सफल रहा।

सेंट्रल असेम्बली में धमाका

केंद्रीय असेम्बली में उन दिनों जन सुरक्षा बिल और औद्योगिक विवाद बिल पर बहस चल रही थी। जन सुरक्षा बिल 6 सितम्बर 1928 को पेश किया गया था। इसका मकसद क्रन्तिकारी गतिविधियों पर रोकथाम लगाना था। हालांकि यह नामंजूर हो गया। फिर जनवरी 1929 में फेरबदलों के साथ फिर से बिल असेम्बली में लाया गया।

जबकि औद्योगिक विवाद बिल मजदूरों को हड़ताल पर जाने से रोकने के लिए 4 सितम्बर 1928 को लाया गया था। सदन ने उसे सिलेक्ट कमेटी को भेज दिया और कुछ बदलावों के साथ 2 अप्रैल 1929 को बहस के लिए पेश किया गया।

सुधारों के बावजूद भी दोनों प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित नहीं हुए। अतः वायसराय ने अपने विशेषाधिकार से उन्हें कानून का रूप दे दिया। इसकी घोषणा 8 अप्रैल 1929 को असेम्बली में की जानी थी। उसी दिन भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त असेम्बली में मौजूद थे। लाला लाजपत राय की हत्या का दोषी सायमन भी इस दिन असेम्बली की कार्यवाही देखने आया था। भगत सिंह ने एकसाथ दो बम पीछे की तरफ फेंक दिए जिससे किसी की जान को हानि न हो। उसके बाद उन्होंने पिस्तौल से दो गोलियां हवा में दागी। इसी के साथ भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने इन्कलाब जिंदाबाद के नारे लगने शुरू कर दिये।

अदालती कार्यवाही

भगत सिंह ने गोलियों से भरी अपनी पिस्तौल नीचे रख दी। वे दोनों चाहते तो भाग सकते थे लेकिन उन्होंने स्वयं को पुलिस के हवाले कर दिया। दिल्ली में 4 जून 1929 को उनके मुकद्दमे की सुनवाई शुरू हुई और सेशन जज मिडल्टन ने 10 जून को उन्हें आजन्म कारावास का फैसला सुनाया। भगत सिंह को मियांवाली जेल और बटुकेश्वर को लाहौर सेंट्रल जेल भेज दिया।

इसी दौरान उनपर 10 जुलाई 1929 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्स की हत्या का मुकद्दमा चला। भगत सिंह ने विरोधस्वरूप न्यायालय में पेशी के लिए आना भी बंद कर दिया। जिसके बाद, गवर्नर जनरल इरविन ने 1 मई 1930 को लाहौर षड़यंत्र केस पर एक अध्यादेश जारी किया। जिसके अंतर्गत तीन जजों का विशेष न्यायाधिकरण बनाया गया। इसे अधिकार दिया गया कि वे अभियुक्त की अनुपस्थिति में मुकद्दमा चला सकते हैं।

शुरू के दिनों में भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारियों ने इन कार्यवाहियों में हिस्सा लिया। वे वहां 12 मई 1930 को गये और देशभक्ति के गीत गाने लगे। ब्रिटिश सरकार को यह नागवार गुजरा और वहां पुलिस द्वारा उन्हें पीटा जाने लगा। इस घटना के बाद वे कभी अदालत में नहीं गये।

वायसराय ने एक नये अध्यादेश से दूसरा विशेष न्यायाधिकरण बना दिया। इस न्यायाधिकरण के आगे भी कोई क्रांतिकारी अदालत में पेश नहीं हुआ। बिना अभियुक्तों के 3 महीनों तक कार्यवाही चली और 26 अगस्त 1930 को समाप्त हो गयी। न्यायाधिकरण का फैसला 7 अक्तूबर, 1930 को सुनाया जिसमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा दी गयी। 23 मार्च 1931 को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर इन्हें फांसी दे दी गई।

पुरषोत्तमदास टंडन ने भगत सिंह का समर्थन करते हुए लिखा है, "हिंसा और अहिंसा हमारे देश का पुराना दार्शनिक प्रश्न है। प्रकृति हमें पैदा करती है और हमारी रक्षा करती है। एक हिलोर में हमारा नाश भी कर देती है। जिसके ऊपर समाज के संचालन का दायित्व रहता है उन्हें रक्षा और संहार दोनों काम करने होते हैं।"

यह भी पढ़ेंः Gandhi and Bhagat Singh: गांधी नहीं चाहते थे कि भगत सिंह को फांसी हो!

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+