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Gandhi and Bhagat Singh: गांधी नहीं चाहते थे कि भगत सिंह को फांसी हो!

महात्मा गांधी पर यह आरोप लगता रहा है कि अगर गांधी चाहते तो भगत सिंह की फांसी टल सकती थी। क्या सचमुच गांधी ने भगत सिंह को बचाने का "कोई" प्रयास नहीं किया था?

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Gandhi and Bhagat Singh: भगत सिंह और उनके साथी राजगुरू और सुखदेव ने 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी। गांधी उस समय कलकत्ता में थे। अप्रैल 1929 मे गांधी विजयवाड़ा में थे जब उन्हें यह खबर मिली कि केन्द्रीय विधानसभा में 8 अप्रैल को एक बम फेंका गया है। धमाकों के बाद गिरफ्तार हुए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने कहा कि 'उन्होंने अपने कृत्यों द्वारा दुनिया का ध्यान भारत की समस्याओं की ओर खींचने का प्रयास किया।' उन्होंने कहा कि 'बम धमाके इंग्लैंड को उसके सपनों से जगाने के लिए जरूरी थे, वे इसलिए फेंके गए ताकि बहरों के कान में आवाज जा सके और बेपरवाहों को समय पर चेतावनी दी जा सके'।

लाहौर, जहां 1929 का कांग्रेस अधिवेशन हुआ था, वहां से वापस लौटते समय ट्रेन मे गांधी ने अंहिसा के तर्क को दुहराते हुए एक अहम लेख लिखा। गांधी ने लिखा कि 'पूरे भारत की अपनी यात्राओं के दौरान उन्होंने अनुभव किया है कि आम जनमानस जो अपनी स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना को लेकर जागरूक हो गया है, वह इस हिंसा की भावना से अछूता है।'

गांधी ने स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा हिंसा के इस्तेमाल के खिलाफ दो व्यवहारिक तर्क सामने रखे। पहला, हिंसा शासकों को और ज्यादा दमन के लिए प्रेरित करती है। दूसरा, हिंसा की संस्कृति या उसका महिमामंडन आखिरकार उसी समाज पर भारी पड़ जाता है जो उसका पोषण करता है। गांधी ने कहा कि "किसी देश की स्वतंत्रता सिर्फ वीरता के एकमात्र कृत्य से हासिल नहीं की जा सकती, बल्कि उसके लिए हजारों स्त्री, पुरूषों, युवाओं और बुजुर्गो के धैर्य, मेधा और रचनात्मक प्रयासों की आवश्यकता होती है।"

हालांकि 'लाहौर षड़यंत्र केस' में भगत सिंह पर मुकदमा चला और 23 मार्च 1931 को फांसी की सजा सुना दी गई। देश की जनता नहीं चाहती थी कि भगत सिंह को फांसी हो। अंहिसा के पुजारी गांधी भी नहीं चाहते थे कि भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी हो। गांधी ने वॉयसराय इरविन को पत्र लिखकर मिलने का समय मांगा। गांधी बेहद अहम मौकों पर ही वॉयसराय से मिलने का समय मांगते थे। ज्यादातर वॉयसराय खुद गांधी से मिलने की इच्छा व्यक्त करते थे, तब गांधी मिलने जाते थे।

अक्सर गांधी कांग्रेस के नेताओं को वॉयसराय से मिलने भेजते थे। लेकिन इस बार गांधी के समय मांगने पर वॉयसराय इरविन ने तत्काल मिलने का समय दे दिया। इरविन से मुलाकात में गांधी ने भगत सिंह की फांसी की सजा टालने का अनुरोध किया। गांधी ने वॉयसराय से कहा कि 'अगर वह फांसी को टाल या रोक सकते है तो इसका शांति प्रक्रिया में काफी प्रभाव पड़ेगा और वॉयसराय के प्रति कांग्रेस का नजरिया भी बदलेगा'।

वॉयसराय इरविन इस बात से आश्चर्यचकित थे कि 'अहिंसा का मसीहा इतना व्याकुल होकर उस मत के लिए आग्रह से आगे बढ़कर जिद कर रहा है जो बुनियादी तौर पर उसके मत के बिल्कुल उलट हैं'। गांधी से बातचीत में गांधी के बार बार भगत सिंह की फांसी को रोकने के आग्रह से परेशान इरविन ने गांधी को कुछ दिन दिल्ली रूककर वॉयसराय के कार्यकारी परिषद के सदस्यों और प्रांतीय गवर्नरों से मुलाकात कर भगत सिंह की फांसी को स्थगित करने की चर्चा करने की सलाह दी। गांधी ने दिल्ली में रूकने की अपनी अवधि बढ़ा दी।

गांधी दिल्ली में रूककर वॉयसराय के कार्यकारी परिषद के सदस्यों और प्रांतीय गवर्नरों से भगत सिंह की फांसी को किसी भी तरह टालने का आग्रह करते रहे। गांधी इस हद तक चले गए थे कि उन्होंने भगत सिंह की फांसी टालने पर कुछ मुद्दों पर अपना रूख नरम करने का भी जिक्र कर दिया था। गांधी ने भगत सिंह की फांसी को रोकने के लिए इरविन से यहां तक कहा कि 'अगर वे भगत सिंह पर सहानुभूति के साथ विचार कर फांसी को टालने पर सहमत हो जाते हैं तो वे कई जटिल मुद्दों पर भी अपना अड़ियल रूख ढीला कर सकते हैं'।

मार्च की शुरूआत में गांधी ने गुजरात जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया और दिल्ली में रूककर भगत सिंह को फांसी की सजा से बचाने की कोशिश करते रहे। गुजरात में सरदार पटेल गांधी की राह देख रहे थे, क्योंकि कराची में कांग्रेस अधिवेशन को लेकर गांधी से सरदार पटेल को महत्वपूर्ण चर्चा करनी थी। दिल्ली में रूककर भगत सिंह की फांसी को टालने के तमाम प्रयास और वॉयसराय की ओर से इस पर विचार करने का आश्वासन मिलने के बाद गांधी गुजरात लौट आए। गुजरात पहुंचे गांधी ने सरदार पटेल से भगत सिंह को लेकर इरविन से हुई चर्चा का जिक्र किया और कहा कि 'भगत सिंह जैसे देशभक्त को बचाने की उनकी कोशिश जारी रहेगी।' गांधी ने उम्मीद जताई कि हो सकता है भगत सिंह की सजा टल जाए।

गुजरात पहुंचे गांधी ने कराची कांग्रेस में भाग लेने के लिए कराची जाने से पहले वॉयसराय को भगत सिंह की फांसी की सजा को स्थगित करने के लिए पत्र लिखा। गांधी ने लिखा 'यह सही हो या गलत लेकिन आम जनमानस उस सजा को बदल दिए जाने के पक्ष में है। गांधी ने कहा कि 'जब कोई सिद्धांत दांव पर नहीं लगा होता है तो अक्सर उसका सम्मान करना ही कर्तव्य होता है।' गांधी ने आगे लिखा कि 'फांसी एक ऐसा कृत्य साबित होगी जिसे फिर बदला नहीं जा सकेगा। इसलिए अगर वह सोचते हैं कि 'निर्णय मेे त्रुटि की तनिक भी संभावना हो तो उन्हे उस कृत्य को रोक देना चाहिए, जिसे बाद में नहीं रोका जा सकता है।'

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी की तिथि 24 मार्च तय की गई थी। यह वही दिन था जब कराची में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला था। 23 मार्च की रात को गांधी कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में भाग लेने कराची जाने वाले थे। लेकिन जिस समय गांधी ट्रेन में थे, लाहौर में भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी गई। गांधी के साथ उस समय ट्रेन में कांग्रेस के नामांकित अध्यक्ष वल्लभभाई पटेल भी थे। 25 मार्च की सुबह गांधी कराची स्टेशन उतरे। भगत सिंह के फांसी के कारण कांग्रेस ने सभी स्वागत समारोह निरस्त कर दिए थे।

कराची कांग्रेस का यह अधिवेशन ऐसा पहला अधिवेशन था जो दिसंबर के बजाय मार्च में हो रहा था। कांग्रेस ने भगत सिंह और उनके साथियों सुखदेव और राजगुरू के बलिदान और उनकी बहादुरी की प्रशंसा की और शहीदों के लिए शोक संतप्त परिवार के साथ शोक प्रकट किया। कांग्रेस ने उनकी फांसी को एक निर्दयी प्रतिरोध करार दिया जो 'एक पूरे राष्ट्र की आम सहमति से की गई माफी की मांग के प्रति जानबूझकर किया गया ताकत और घमंड का प्रदर्शन था।'

गांधी ने भगत सिंह की प्रशंसा करते हुए लिखा कि 'वह जीवित रहने का आकांक्षी नहीं था। उसने माफी मांगने से इंकार कर दिया और प्राणरक्षा की अपील नहीं की।' गांधी ने कहा कि 'भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी पर चढ़ाकर सरकार ने अपने बर्बर स्वभाव का परिचय दिया है। मेरे निवेदनों और जनमानस की उपेक्षा कर उसने अपने अहंकार का ताजा सबूत दिया है।'

भगत सिंह और उसके साथियों की फांसी वायसराय के रूप में इरविन का आखिरी बड़ा फैसला था। अप्रैल में वह भारत से चला गया और उसकी जगह लॉर्ड विलिंगटन को भारत का वॉयसराय नियुक्त किया गया। गांधी ने इरविन के विदाई पत्र में कहा कि 'भगत सिंह को फांसी की सजा आपके कार्यकाल का ऐसा काला अध्याय है जो हमेशा आपके साथ जुड़ा रहेगा। मेरे मन मेे आपके प्रति सम्मान रहता यदि आप मेरे अनेक निवेदनों और तमाम कोशिशों के बाद भगत सिंह की फांसी की सजा को टाल देते। आपने ऐसा नहीं करके मेरे मन से सम्मान खोया है।'

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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