Savitribai Phule: सावित्री बाई फुले ने लड़कियों को मुफ्त में पढ़ाया और अपने खर्च के लिए बनाए गद्दे
सावित्री बाई फुले, अध्यापिका, समाजसेवी, क्रांतिकारी होने के साथ-साथ स्त्री मुक्ति आंदोलन की प्रणेता भी थी। उनका निधन 66 वर्ष की आयु में 10 मार्च 1897 के दिन हुआ था।

Savitribai Phule: सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को एक गरीब परिवार में हुआ था। मात्र 9 साल की उम्र में उनका विवाह 13 साल के ज्योति फुले से हो गया था। अपने पति ज्योति फुले के साथ मिलकर सावित्रीबाई ने स्त्रियों की बेहतरी के लिए कई कदम उठाये। उन्होंने लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले, जिसमें से पहला स्कूल पुणे में खोला गया था। सावित्रीबाई फुले अपने समाज की पहली महिला शिक्षक होने के साथ भारत के नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता, समाज सुधारक और मराठी कवयित्री भी थी।
महिला शिक्षा को लेकर सावित्रीबाई फुले और उनके पति महात्मा ज्योतिबा फुले का योगदान ऐतिहासिक रहा है। 19वीं सदी में महिलाओं की स्थिति काफी चिंताजनक थी। उनकी सामाजिक स्थिति ठीक नहीं थी। महिलाओं को केवल घरों के कामों तक ही सीमित रखा जाता था। ऐसे में सावित्रीबाई फुले और उनके पति द्वारा शिक्षा के माध्यम से स्त्रियों को जो अधिकार दिलाए गए वे अतुलनीय हैं।
पहला स्कूल
ज्योतिबा फुले ने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर कन्याओं की शिक्षा हेतु विभिन्न प्रयास किए। उनके द्वारा खोले गए पहले स्कूल में 6 बच्चों ने प्रवेश लिया था। जिनमें अन्नपूर्णा जोशी, सुमति मोकाशी, दुर्गा देशमुख, माधवी थत्ते, सोर पवार और जानी कारडिले आदि नाम थे।
1848 में खोला पहला बालिका विद्यालय
सन 1848 में सावित्रीबाई फुले द्वारा स्थापित किए गए बालिका विद्यालय से समाज और तत्कालीन अंग्रेज सरकार की आंखें खुल गई। उस समय फुले दंपत्ति ने स्थानीय भाषा में ही शिक्षा की व्यवस्था की और मराठी में पाठ्यक्रम रखा। उनकी नजर में उसी भाषा के माध्यम से शिक्षा की प्राप्ति होनी चाहिए जो रोजमर्रा की भाषा हो। क्योंकि मनुष्य उसी के माध्यम से अच्छी तरह सीख पाता है। इसके बाद अंग्रेजों द्वारा 1854 की शिक्षा नीति 'चार्ल्स वूड डिस्पैच' में प्राथमिक स्तर पर स्थानीय भाषा में ही शिक्षा देने का माध्यम बनाया गया। इसके साथ ही ज्योतिबा फुले और सावित्री फुले ने बालिकाओं के विकास के लिए जगह-जगह विद्यालय खोले। शिक्षा का प्रसार किया। उनके द्वारा संचालित 18 विद्यालय जिनका जिक्र मुंबई प्रेसिडेंसी के शिक्षा अभिलेखों में मिलता है। सावित्रि बाई ने प्रौढ़ शिक्षा, स्त्री-पुरुष के लिए अलग-अलग रात्रि पाठशालाएं खोली थी।
आजीविका के लिए गद्दे बनाकर बेचे
नारी शिक्षा आंदोलन हेतु सावित्रीबाई फुले ने स्वयं को समर्पित कर दिया था। वह नारी शिक्षा हेतु निशुल्क सेवाएं देती थी। तो वहीं खुद की आजीविका के लिए खाली समय में गद्दे बनाकर बेचने का कार्य करती थी। वहीं ज्योतिबा एक सिलाई की दुकान चलाते थे। सावित्रीबाई के महान योगदान के संबंध में उनके पति ज्योतिबा ने कहा था कि अपने जीवन में मैं जो कुछ भी कर पाया हूं वह मेरी पत्नी सावित्रीबाई के सहयोग से ही हो सका है। वह कांटों भरे रास्ते में भी मेरे साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रही।
घरवालों ने मना किया था स्कूल खोलने से
सावित्रीबाई एक बुद्धिमान लेखिका तथा प्रतिभा संपन्न कवियित्री भी थीं। उनका कविता संग्रह 'काव्य फुले' 1854 में प्रकाशित हुआ था। पर क्या आप जानते हैं कि जब सावित्रीबाई फुले नारी शिक्षा को लेकर कार्य कर रही थी तो उनको उस समय के वातावरण के विरुद्ध कार्य करते देख उनके भाई और कई अन्य लोगों ने उन्हें मना किया था। परंतु सावित्रीबाई ने किसी की नहीं सुनी और अपने पति ज्योतिबा के साथ निरंतर कार्य करती रही। सावित्री बाई हमेशा अपने पति से कहती थी कि हम सत्य के मार्ग पर चल रहे हैं हमारी विजय निश्चित ही होगी।
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