OI Explained: अपना संविधान, अपनी पुलिस, अपनी सरकार, फिर भी इस्लामाबाद के इशारों पर क्यों चलता है PoK?
OI Explained: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में हाल के दिनों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं। JAAC ने 9 जून को मुजफ्फराबाद और रावलकोट में प्रदर्शन शुरू किया था, जिसके बाद पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया। इन घटनाओं ने एक बार फिर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की राजनीतिक और संवैधानिक स्थिति को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। दिलचस्प बात यह है कि PoK का अपना प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, विधानसभा, संविधान और यहां तक कि अलग झंडा भी है। लेकिन इसके बावजूद क्षेत्र पर वास्तविक नियंत्रण इस्लामाबाद और पाकिस्तान की सत्ता संरचना के हाथों में माना जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यह व्यवस्था बनी कैसे और पाकिस्तान इसे क्यों बनाए रखना चाहता है?
PoK की शुरुआत कैसे हुई?
आज जिस क्षेत्र को भारत, पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (PoK) कहता है, उसका इतिहास 1947 के भारत-विभाजन से जुड़ा हुआ है। यह लगभग 13,297 वर्ग किलोमीटर का इलाका है, जिस पर पाकिस्तान का कंट्रोल है। पाकिस्तान इसे "आज़ाद जम्मू-कश्मीर" कहता है, जबकि भारत इसे अपने जम्मू-कश्मीर का अवैध रूप से कब्जाया गया हिस्सा मानता है। अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित पश्तून कबायली लड़ाकों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला किया था। उस समय जम्मू-कश्मीर एक रियासत थी, जिसके शासक महाराजा हरि सिंह थे। विभाजन के बाद उन्होंने तत्काल भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला नहीं किया था।

लेकिन जैसे-जैसे कबायली हमलावर श्रीनगर की ओर बढ़ने लगे, महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय-पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए। अगले ही दिन भारतीय सेना श्रीनगर पहुंची और पाकिस्तान तथा भारत के बीच पहला युद्ध शुरू हो गया। करीब 14 महीने तक चले इस युद्ध के बाद 31 दिसंबर 1948 की रात युद्धविराम लागू किया गया। 1 जनवरी 1949 से युद्धविराम रेखा प्रभावी हुई, जिसके बाद जम्मू-कश्मीर का लगभग 13,297 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पाकिस्तान के कंट्रोल में रह गया।
दो हिस्सों में बंटा हुआ है पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर
आज पाकिस्तान के नियंत्रण वाले इस क्षेत्र को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा जाता है। पहला हिस्सा तथाकथित "आज़ाद जम्मू-कश्मीर" (AJK) है और दूसरा गिलगित-बाल्टिस्तान (GB)। गिलगित-बाल्टिस्तान अकेले PoK के कुल क्षेत्रफल का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा बनाता है। भारत का आधिकारिक रुख यह है कि PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान दोनों ही 1947 में हुए विलय के आधार पर भारत का अभिन्न हिस्सा हैं।
PoK की अपनी सरकार और संविधान क्यों है?
PoK का प्रशासन 1974 के "आज़ाद जम्मू-कश्मीर अंतरिम संविधान अधिनियम" के तहत संचालित होता है। इसी व्यवस्था के आधार पर वहां अलग राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विधानसभा, न्यायिक प्रणाली और पुलिस बल मौजूद हैं। 1974 के इस अंतरिम संविधान और पाकिस्तान के संविधान के कुछ प्रावधान मिलकर यह तय करते हैं कि PoK और इस्लामाबाद के बीच शक्तियों का बंटवारा किस प्रकार होगा। कागजों पर देखने पर ऐसा लगता है कि PoK को काफी हद तक स्वायत्तता या स्वतंत्रता प्राप्त है। लेकिन कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वास्तविक फैसले लेने की शक्ति अभी भी पाकिस्तान के केंद्रीय नेतृत्व के पास ही रहती है।
पाकिस्तान के पक्ष में विचार रखना क्यों जरूरी है?
PoK के अंतरिम संविधान का एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह कहता है कि कोई भी व्यक्ति या राजनीतिक दल ऐसे विचारों का प्रचार नहीं कर सकता जो जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान में विलय की विचारधारा के खिलाफ हों। दूसरे शब्दों में कहें तो वहां की राजनीति में केवल वही विचारधारा स्वीकार्य मानी जाती है जो पाकिस्तान के पक्ष में हो। इससे वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टिकोणों के लिए जगह बेहद सीमित हो जाती है। इसी कारण कई मानवाधिकार संगठनों और पॉलिटिकल सुपरवाइजर ने समय-समय पर इस व्यवस्था को गलत भी बताया है।
1949 का कराची समझौता क्या कहता है?
1949 में हुए कराची समझौते के तहत रक्षा, विदेश नीति, विदेशों में प्रतिनिधित्व और प्रचार-प्रसार जैसे महत्वपूर्ण विषयों का कंट्रोल पाकिस्तान के पास चला गया था। यानी PoK की अपनी सरकार होने के बावजूद सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक और अंतरराष्ट्रीय मामलों में अंतिम अधिकार इस्लामाबाद के पास ही बना रहा। कई दशकों तक पाकिस्तान का "कश्मीर काउंसिल" नामक एक संस्थान PoK के प्रशासन पर गहरा प्रभाव रखता था। इस परिषद की अध्यक्षता पाकिस्तान के प्रधानमंत्री करते थे। हालांकि 2018 में इसके कई अधिकार कम कर दिए गए थे। फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे PoK की वास्तविक स्वायत्तता या स्वतंत्रता में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया।
पाकिस्तान PoK को अपना प्रांत क्यों नहीं बनाता?
यह सबसे बड़ा सवाल है। पाकिस्तान के पास पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे चार आधिकारिक प्रांत हैं। लेकिन PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान को आज तक पूर्ण प्रांत का दर्जा नहीं दिया गया। विशेषज्ञों के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह दावा है कि पूरा जम्मू-कश्मीर एक "विवादित क्षेत्र" है। अगर पाकिस्तान PoK या गिलगित-बाल्टिस्तान को औपचारिक रूप से अपने प्रांतों में शामिल कर लेता है, तो उसका यह दावा कमजोर पड़ सकता है कि जम्मू-कश्मीर का अंतिम दर्जा अभी तय होना बाकी है।
पूर्व सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने 2020 में लिखा था कि यदि पाकिस्तान इन क्षेत्रों को आधिकारिक प्रांत घोषित कर देता, तो पूरे जम्मू-कश्मीर पर उसके दावे को कानूनी और कूटनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता था। आसान भाषा में कहें तो पाकिस्तान PoK को लेकर इंटरनेशनल लेवल पर अपनी स्थिति कमजोर कर सकता है।
राजनीतिक नेताओं के लिए जरूरी शपथ
PoK में चुनाव लड़ने वाले नेताओं, जनप्रतिनिधियों और यहां तक कि न्यायपालिका से जुड़े लोगों को भी एक विशेष शपथ लेनी होती है। इस शपथ में जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान के साथ विलय के समर्थन को स्वीकार करना पड़ता है। यही कारण है कि पाकिस्तान समर्थक विचारधारा वहां की मुख्यधारा राजनीति का अनिवार्य हिस्सा बन जाती है। 2016 में PoK की कई राजनीतिक पार्टियों ने उन कानूनों को खत्म करने की मांग की थी, जिनके तहत चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को पाकिस्तान समर्थक शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य था।
हालिया विरोध प्रदर्शन क्यों शुरू हुए?
हाल में हुए विरोध प्रदर्शनों की अगुवाई जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने की थी। संगठन ने PoK विधानसभा चुनावों में शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों का विरोध किया। इन सीटों पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार PoK में नहीं बल्कि पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में रहते हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इससे स्थानीय लोगों के राजनीतिक अधिकार प्रभावित होते हैं। यही मुद्दा धीरे-धीरे बड़े आंदोलन में बदल गया और अब पूरे क्षेत्र में राजनीतिक असंतोष, प्रशासनिक कंट्रोल और आजादी की बहस एक बार फिर तेज हो गई है।
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