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Sambhaji Maharaj : जब अपने पिता शिवाजी से नाराज होकर मुगलों के पास चले गए थे संभाजी

संभाजी महाराज का जीवन वीरता के साथ ही भावुकता से भरा था। अपने जीवन में उन्होंने कई युद्ध लड़े लेकिन कभी पराजित नहीं हुए। आखिर में मुगल सेना ने धोखे से उन्हें पकड़ लिया।

Remembering Sambhaji Maharaj story of A warrior king

Sambhaji Maharaj : छत्रपति संभाजी महाराज का जन्म 1657 में 14 मई को पुरंदर किले में हुआ था। संभाजी के बचपन में ही उनकी मां सईबाई का देहांत हो गया था। वह छत्रपति शिवाजी की दूसरी पत्नी थी। इसके बाद संभाजी का पालन-पोषण छत्रपति शिवाजी की मां जीजाबाई ने किया। संभाजी का विवाह येसूबाई से हुआ था और इनके पुत्र का नाम छत्रपति साहू था। संभाजी ने मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना को कई बार युद्ध में हराया था। संभाजी महाराज अपनी वीरता और युद्ध कौशल के लिए प्रसिद्ध थे। संभाजी ने अपने शासन काल में 210 युद्ध किए और एक भी युद्ध नहीं हारा।

मुगलों के पास चले गए थे संभाजी

एक बार छत्रपति शिवाजी से नाराज होकर संभाजी मुगलों के पास चले गए थे। इस बात का जिक्र विश्वास पाटिल ने अपनी किताब 'संभाजी' में किया है। इस किताब का अनुवाद डॉ. रामजी तिवारी ने किया है। विश्वास पाटिल ने लिखा कि मुगलों के पास चले जाने पर औरंगजेब का सेनापति दिलेरखान उनसे मीठी-मीठी बातें करता था ताकि वे संभाजी का इस्तेमाल मराठाओं को हराने में कर सके। वहीं संभाजी को मराठी युवराज होने के नाते बहादुरगढ़ किले में घूमने की आजादी थी लेकिन हर समय उन पर निगरानी रखी जाती थी। धीरे-धीरे हर बात संभाजी को समझ में आने लगी थी। एक दिन संभाजी ने इन स्थितियों से ऊबकर दिलेरखान से क्रोध के आवेश में प्रश्न किया कि खान साहब हम आपके मेहमान हैं या कैदी?

दिल्ली दरबार में औरंगजेब को विश्वास नहीं था कि जो युवक शिवाजी का बेटा बनकर मुगल खेमे में आया है वह सचमुच शिवाजी का पुत्र था या कोई बनावटी युवराज है। ऐसे में दिलेरखान कभी भी संभाजी को कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाता था। उधर संभाजी की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उन्हें न दिन को चैन था न रात को नींद।

फिर वापस पहुंचे और संभाली मराठा कमान

एक बार मुगल सरदारों ने 700 मराठी सैनिकों के हाथ-पैर काट दिए थे। इस बात का पता चलते ही संभाजी आग बबूला हो गए। उन्हें समझाने की कोशिश की गई लेकिन सब विफल रहे। उस समय वे जहां मौजूद थे वहां शामियाने के बीच का खम्भा था। संभाजी ने उसी को बाहों में भर लिया और जिस प्रकार एक हाथी अपने मस्तक के ज्वर को शान्त करने के लिए पत्थर पर अपना माथा पटकता है, उसी तरह संभाजी भी खम्भे पर अपना सिर पटकने लगे। आंखों से लगातार गिरते आंसुओं को पोंछते हुए वे बोल रहे थे कि पिताजी बहुत बड़ी भूल की है मैंने, बहुत बड़ी गलती हो गई।

इसके बाद योजना बनाकर संभाजी दिलेरखान को चकमा देकर वहां से भागने में कामयाब रहे। पन्हाला किले पर छत्रपति शिवाजी से मुलाकात के बाद पहले दिन जब संभाजी दरबार में जाने लगे तो छत्रपति ने स्वयं उन्हें तैयार किया। अन्त में उन्होंने उनके मस्तक पर केसर चन्दन का टीका लगाया। संभाजी के मन में जो ग्लानि का भाव था उसे छत्रपति शिवाजी ने अपने व्यवहार से दूर कर दिया था।

औरंगजेब और संभाजी

संभाजी महाराज का औरंगजेब की छल-कपट की नीति से बचपन में जो वास्ता पड़ा था, वह जीवन के अंत तक बना रहा। छत्रपति शिवाजी की रक्षा नीति के अनुसार उनके एक किले को जीतने के लिए मुगलों को कम से कम एक वर्ष तक जूझना पड़ता। ऐसे में औरंगजेब जानता था कि इस हिसाब से तो सभी किले जीतने में 360 वर्ष लग जाएंगे। छत्रपति शिवाजी के बाद संभाजी महाराज की वीरता भी औरंगजेब के लिए मुसीबत बनी हुई थी। उनका रामसेज का किला औरंगजेब को लगातार पांच वर्षों तक टक्कर देता रहा। उसने संभाजी महाराज से मुकाबला करने के लिए अपने पुत्र शाहजादे आजम को भेजा। आजम ने कोल्हापुर संभाग में संभाजी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। संभाजी ने आजम की सेना को हरा दिया। ऐसे में औरंगजेब पहले से ज्यादा हताश हो गया। संभाजी को हराने के लिए उसने एक बड़ी फौज तैनात कर दी। मराठों के हौसलों और गुरिल्ला युद्ध के कारण मुगल सेना हर बार विफल होती गई। औरंगजेब ने बार-बार पराजय के बाद भी संभाजी महाराज से युद्ध जारी रखा।

जिंदगी भर पराजित नहीं कर पाया औरंगजेब

15 फरवरी 1689 को औरंगजेब की सेना ने संभाजी को धोखे से घेर कर पकड़ लिया। इसके बाद कवि कलश, जोकि संभाजी के सलाहकार थे, और संभाजी को जब दिवान-ए-खास में औरंगजेब के सामने पेश किया गया। जिस औरंगजेब के सामने कोई नजर मिला कर देखने की हिम्मत नहीं करता था उसके साथ संभाजी नजर से नजर मिला रहे थे। औरंगजेब का आज तक किसी ने ऐसा अपमान नहीं किया था।

वो दरबार से जाने लगा पर जाते-जाते कह गया कि आंखे निकालने से पहले इसकी जुबान काट डालो और ये सजा पहले इस कवी कलश पर आजमाओ। उसको लगा कि कवि कलश को ऐसी यातनाएं देने से संभाजी डर जाएंगे और इस्लाम कबूल कर लेंगे। पर ऐसा नहीं हुआ। कविराज की पहले जबान काटी गई फिर उनकी आंखें निकाली गई। यही सजा बाद में संभाजी को दी गई। फिर भी इस्लाम कबूल नहीं करने पर संभाजी का वध करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए 11 मार्च 1689 का दिन तय किया गया क्योंकि उसके ठीक दूसरे दिन हिन्दू वर्ष प्रतिपदा थी। औरंगजेब चाहता था कि संभाजी की मृत्यु के कारण हिन्दू जनता इस अवसर पर शोक मनाए। औरंगजेब ने छल से संभाजी महाराज को पकड़ कर उनका वध तो करवा दिया, लेकिन वह चाहकर भी उन्हें जिंदगी भर पराजित नहीं कर सका।

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