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वोटर्स को ही तय करने दीजिए उम्‍मीदवारों का भविष्‍य

Readers opinion
बैंगलोर। आप पार्टी के संस्‍थापक अरविंद केजरीवाल के अलावा कांग्रेस पार्टी की ओर से बीजेपी के उम्‍मीदवार नरेंद्र मोदी की उम्‍मीदवारी को लेकर यही सवाल पूछा जा रहा है कि वह उत्‍तर प्रदेश के वाराणसी और गुजरात के वडोडरा से क्‍यों चुनाव लड़ रहे हैं? अगर उन्‍हें अपनी जीत का इतना ही भरोसा है तो फिर वह सिर्फ वडोडरा से या फिर वाराणसी से ही चुनाव क्‍यों नहीं लड़ते हैं?

वनइंडिया हिंदी के एक पाठक एनआर सिंह ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजी है और उनका मानना है कि इसका फैसला सिर्फ वोटरों ही कर सकते हैं। पढ़िए इस पूरे मुद्दे और अरविंद केजरीवाल पर एनआर सिंह की राय।

Disclaimer: यह लेख हमारे पाठक द्वारा भेजी गई प्रतिक्रिया पर आधारित है। इसमें व्याकरण संबंध‍ित त्रुटियों के अलावा कोई भी संशोधन नहीं किया गया है।

भारत के संविधन की ओर से किसी भी उम्‍मीदवार को यह अधिकार दिया गया है कि वह एक सीट से चुनाव लड़े या फिर दो सीट से एक साथ चुनावों में अपनी दावेदारी पेश करे।

संविधान में नागरिकों को यह अधिकार नहीं दिया गया है कि वह उम्‍मीदवार से यह सवाल कर सकें कि अगर वह दोनों सीटों पर चुनाव जीत जाते हैं तो फिर किस सीट को अपने पास रखेंगे और किसे छोड़ देंगे। इसका फैसला करने का हक सिर्फ उम्‍मीदवार को ही है कि वह कौन सी सीट छोड़े या फिर कौन सी सीट अपने पास रखे।

वोटर्स के पास सिर्फ इतना हक है कि वह वोट देकर या तो दोनों सीटों से उसे विजयी घोषित करें या फिर दोनों ही सीट पर उसे हारने पर मजबूर करें।

आम आदमी पार्टी पर प्रतिक्रिया
जब कभी भी अरविंद केजरीवाल वाराणसी वापस आते हैं उन्‍हें एक ही नारा सुनने को मजबूर होना पड़ता है और वह है,'दिल्‍ली के भगोड़े वापस जाओ।' जब दिल्‍ली में चुनाव होंगे और अगर लोकसभा चुनावों के बाद वह दिल्‍ली के विधानसभा चुनावों को लड़ने की हिम्‍मत जुटा पाते हैं तो फिर हो सकता है कि उन्‍हें दिल्‍ली की जनता से भी यही बात सुनने को मिले।

हो सकता है कि उस समय इस नारे का शोर अमेठी और वाराणसी की जनता की ओर से आने वाले शोर से कहीं ज्‍यादा हो।

मुझे लगता है कि वाराणसी में वोट हासिल करने के लिए अरविंद हत्‍यारों और गैंगस्‍टरों की चाटुकारिता करने में भी पीछे नहीं हटेंगे। इन लोगों और 'गैंग ऑफ फोर' यानी कांग्रेस, सपा, बसपा और आप पार्टी के समर्थन के बिना वह वाराणसी में अपनी जमानत भी नहीं बचा पाएंगे।

मुलायम के बारे में मुझे लगता है कि या तो मुलायम सिंह यादव पैदाइशी मूर्ख हैं या फिर वह अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं। मुलायम सिंह अगर बचकाने बयान देते रहेंगे तो फिर वह उस मुसलमान वोट बैंक को भी खो देंगे जो अभी तक उनका हिमायती है।

बलात्‍कारियों की वकालत करने वाला उनका बयान हो या फिर अध्‍यापकों को धमकी देने वाला मामला हो, दोनों ही मामले साफ बयां करते हैं कि वह अब अपना मानसिक संतुलन पूरी तरह से खो चुके हैं। 16 मई को चुनावी नतीजे सुनने के बाद वह पूरी तरह से पागल हो जाएंगे। मेरे ख्‍याल से उनके बेटे अखिलेश यादव को अभी से उस स्थिति से निबटने के लिए तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।

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