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Rajasthan Elections: 30 सालों से राजस्थान में बदल जाती है सत्ता, जानें चुनावी इतिहास

पिछले 30 सालों से देखें, तो राजस्थान में एक बार कांग्रेस और एक बार बीजेपी की सरकार बारी-बारी से बनती रही है। ऐसा नहीं है कि सत्ता बदलने की परिपाटी केवल राजस्थान में ही है।

Rajasthan Elections 2023 history rotation of bjp congress party in Rajasthan for 30 years

Rajasthan Elections: पिछले कुछ वर्षों के राजस्थान विधानसभा चुनावों के नतीजों पर नजर डालें तो यह साफतौर पर सामने आता है कि हर पांच साल के बाद सरकार का बदलना जारी है। राज्य में 200 विधानसभा सीटें हैं। साल 2003 में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में पहली बार भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला और 120 सीटें भाजपा ने जीतीं तो कांग्रेस के खाते में 56 सीटें आईं, जबकि बाकी पर अन्य दलों अथवा निर्दलियों ने जीत दर्ज की। 2008 में कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरा और करीब 96 सीटों पर विजय प्राप्त की तो वहीं भाजपा की झोली में करीब 78 सीटें आईं। फिर 2013 में भाजपा ने 162 सीटों के साथ भारी-भरकम जीत दर्ज की। वहीं कांग्रेस के पास 21 सीटें ही रह गयी।

इसके बाद, 2018 में हुए चुनावों में कांग्रेस को 99 सीटों पर जीत मिली, जबकि बीजेपी को 73 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। इस प्रकार एक बार भाजपा का तो दूसरी बार कांग्रेस का मुख्यमंत्री बनता आया है।

पिछले तीस सालाें में बने मुख्‍यमंत्री
साल मुख्यमंत्री दल
1993 भैरो सिंह शेखावत भाजपा
1998 अशोक गहलोत कांग्रेस
2003 वसुंधरा राजे भाजपा
2008 अशोक गहलोत कांग्रेस
2013 वसुंधरा राजे भाजपा
2018 अशोक गहलोत कांग्रेस

1993 - राम मंदिर ने भाजपा को दिलाई कुर्सी

राम मंदिर आंदोलन के चलते अयोध्या बाबरी मस्जिद ढांचे को ध्वस्त कर दिया गया, जिसके बाद केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने राजस्थान की भाजपा सरकार को बर्खास्त कर दिया। उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा के भैरोसिंह शेखावत को राजस्थान के मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली। यह भाजपा की अपने दम पर मिली पहली जीत थी। हालांकि चुनाव में भाजपा को 95 सीटें मिली, जो बहुमत से 6 कम थीं। जबकि कांग्रेस के 76, निर्दलीय 21 व जनता दल के 6 विधायक चुने गये। तब भाजपा ने निर्दलियों के समर्थन से सरकार बनाई थी।

1998 - शेखावत को बुरी तरह पछाड़ कर गहलोत बनें सीएम

इन चुनावों में कांग्रेस किसी चेहरे को आगे करके चुनाव नहीं लड़ी थी। लेकिन जाट समाज ने अपने नेता परसराम मदेरणा को मुख्यमंत्री के प्रमुख दावेदार के रूप में प्रस्तुत किया था। हालांकि अशोक गहलोत ने प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए कड़ी मेहनत करके भैरोसिंह शेखावत की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी को जोरदार मात दी थी।

शेखावत के नेतृत्व में चुनाव लड़ी सत्ताधारी भाजपा को 200 में से मात्र 33 सीटें मिली, जबकि गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस को 153 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। सत्ता में वापसी के बाद जब बारी आई मुख्यमंत्री बनाने की, तो पार्टी आलाकमान ने पर्यवेक्षक भेजकर एक लाइन का प्रस्ताव पास किया और अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बना दिया। हालांकि कुछ जाट विधायकों का समर्थन मदेरणा के पक्ष में था, लेकिन कांग्रेस पार्टी किसी जाट नेता को मुख्यमंत्री बनाने से बचना चाहती थी और इस प्रकार अशोक गहलोत पहली बार मुख्यमंत्री बने।

उस समय गहलोत सांसद थे और विधानसभा का चुनाव नहीं लड़े थे। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल और शानदार जीत से कांग्रेस पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व बहुत खुश था। इस तरह विधायक न होते हुए भी गहलोत को विधायक दल का नेता चुन लिया गया और वे मुख्यमंत्री बन गए। परसराम मदेरणा ने अपनी नाराजगी दिखाई लेकिन पार्टी ने उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाकर संतुष्ट कर दिया।

2003 - वसुंधरा राजे ने दिलाया भाजपा को स्पष्ट बहुमत

21वीं सदी के पहले विधानसभा चुनावों में राजस्थान के मतदाताओं ने सत्ता बदल दी। पिछले चुनावों में भारी बहुमत से जीत पाने वाली कांग्रेस इस बार विधानसभा में बहुमत पाने में असफल रही। भाजपा के वरिष्ठ नेता और तीन बार मुख्यमंत्री रहे भैरोसिंह शेखावत 2002 में उपराष्ट्रपति बन गए थे। उनकी जगह वसुंधरा राजे को भाजपा ने प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उन्होंने ही 2003 के चुनावों में भाजपा की कमान संभाली। यही नहीं, अपनी पार्टी को विजयी बनाकर वह प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री भी बनी।

वसुंधरा राजे ने प्रदेश के सभी जिलों से परिवर्तन यात्रा निकाली, जो उनकी जीत का सबसे बड़ा कारण बना। साथ ही गहलोत सरकार की कार्यशैली को लेकर राज्य कर्मचारियों में भारी नाराजगी थी। इस दौरान कर्मचारियों ने प्रदेश की सबसे लंबी हड़ताल भी की, जिसका खामियाजा अशोक गहलोत सरकार को हार के रूप में देखना पड़ा। भाजपा को 120 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत मिली।

2008 - अपनों ने ही हराया वसुंधरा को

2003 से लेकर 2008 तक मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने राजस्थान को एक नयी दिशा देने का काम किया लेकिन भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं से उनकी पटरी नहीं बैठी। इसके अलावा गुर्जर आंदोलन वसुंधरा राजे के लिये चुनौती बन गया। कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व में गुर्जर आंदोलन शुरू हुआ था। इसके बाद आरक्षण की मांग को लेकर रह-रहकर इस आन्दोलन की चिंगारी सुलगी। इसके अलावा राजपूत और जाट समाज ने भी अलग अलग मुद्दों को लेकर आंदोलन किये। जिसके चलते मतदाताओं का एक वर्ग सरकार से नाराज हो गया‌। फिर भी 2008 के चुनाव एकतरफा नहीं हुए और कांग्रेस को 96, जबकि भाजपा को 78 सीटें मिली। कांग्रेस ने फिर से अशोक गहलोत को ही मुख्यमंत्री चुना और निर्दलीय एवं बसपा विधायकों के समर्थन से उन्होंने पांच साल अपनी सरकार चलाई।

2013 - यूपीए सरकार से नाराजगी के चलते भाजपा की बंपर जीत

केंद्र की कांग्रेस सरकार के खिलाफ लगे कॉमनवेल्थ, टूजी, कोल घोटालों ने देश भर में मतदाताओं को प्रभावित किया था। उसका असर राजस्थान में भी पड़ा। इसके अलावा वसुंधरा राजे ने भी अपनी 'स्वराज संकल्प यात्रा' के दौरान महंगाई के मुद्दे को महिलाओं से जोड़ते हुए बार-बार सरकार को कठघरे में खड़ा किया और वह उसमें सफल रहीं। वसुंधरा को महिलाओं का जबरदस्त समर्थन मिला और उसी का परिणाम रहा कि भाजपा ने 162 सीटों पर जीत हासिल कर इतिहास रच दिया। 200 सीटों वाली विधानसभा में सत्ताधारी कांग्रेस को मात्र 21 सीटें ही मिल पाईं। इसके बाद अशोक गहलोत को प्रदेश की राजनीति से दूर करके कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया।

2018 - भाजपा की आपसी फूट ने कराई कांग्रेस की सत्ता वापसी

राजस्थान में इस बार भाजपा के नेता ही वसुंधरा राजे के विरोध में माहौल बनाने में लगे हुए थे। उस दौरान भाजपा के नेताओं द्वारा चलाया गया एक नारा "मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं" बहुत चर्चा में रहा। 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह को टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा, लेकिन मोदी लहर में हार गए। राजपूत समुदाय ने इसका दोष वसुंधरा पर डाला।

प्रदेश के एक चर्चित अपराधी आनंदपाल के एनकाउंटर पर भी राजपूत समुदाय ने नाराजगी जताई। इस नाराजगी के कारण भाजपा के समर्थक माने जाने वाले राजपूत समाज के 30 से अधिक नेता विभिन्न सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़े हो गए और भाजपा उम्मीदवारों को हराने में निर्णायक भूमिका निभाई।

इसके अलावा जाट नेता हनुमान बेनीवाल द्वारा अपनी अलग पार्टी बनाकर वसुंधरा राजे के विरुद्ध प्रचार करने से भी जाट मतदाताओं पर प्रभाव पड़ा। इन सभी कारणों से भामाशाह योजना जैसे विभिन्न लोक कल्याणकारी प्रोग्रामों के सफल क्रियान्वयन के उपरांत भी वसुंधरा राजे के नेतृत्व में चुनाव लड़ी भाजपा आधे प्रतिशत मतों से पिछड़ गई। निर्दलीय उम्मीदवारों के कारण कई सीटों पर कांग्रेस मामूली अंतर से जीत गई और भाजपा की 73 सीटों के मुकाबले कांग्रेस को 99 सीटें मिल गईं।

दो राजनीतिक दलों का प्रभुत्व

वसुंधरा राजे के उभार से पहले राजस्थान में हुए चुनावों में तीसरे मोर्चे की प्रमुख भूमिका रहती थी। भैरों सिंह शेखावत ने 1977 में जनता पार्टी की सरकार का नेतृत्व किया था, जिसमें कई पार्टियां शामिल हुई थीं। उसके बाद 1990 के चुनावों में भी जनता दल 55 विधायकों के साथ तीसरे सबसे बड़े दल के रूप में उभरा था और भाजपा ने जनता दल के साथ मिलकर ही सरकार बनाई थी।

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    लेकिन 1998 में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की एकतरफा जीत के बाद से राजस्थान में दो प्रमुख राष्ट्रीय राजनैतिक दलों - कांग्रेस और भाजपा का प्रभुत्व है। ऐसे में जनता के पास अन्य कोई विकल्प नहीं होने के कारण वह कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा पर मोहर लगाती है। आजादी के बाद से 1949 से 1990 तक कांग्रेस ने शासन किया है। बीच में एक बार 1977 से 1980 तक जनता पार्टी का शासन रहा। राजस्थान में 4 बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है। 1993 के बाद के चुनावों में कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा विजय प्राप्त करती आई है।

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