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Railway Land Encroachment: रेलवे की कब्जाई जमीनों का लेखाजोखा, कैसे करता है रेलवे अपनी जमीनों का मैनजमेंट?

रेलवे की जमीन पर कब्जा कोई नयी बात नहीं है। आजादी के बाद से ही यह मुद्दा हर सरकार के लिये परेशानी का कारण बना हुआ है।

Railway Land Encroachment

हल्द्वानी में रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण को खाली करवाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल स्टे लगा दिया है। कोर्ट ने कहा है कि जिन पचास हजार लोगों ने जमीन पर अवैध कब्जा किया हुआ है, उन्हें सरकार रातों-रात उनके घरों से नहीं निकाल सकती। जबकि रेलवे का कहना है कि हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में उसकी कुल 78 एकड़ जमीन है और इसमें से 29 एकड़ पर अवैध कब्जा है। हल्द्वानी के इस प्रकरण से समझने की कोशिश करते हैं कि रेलवे के पास कुल कितनी जमीन है और कितना उस पर अतिक्रमण हो गया है। साथ ही इन कब्जाई जमीनों को खाली करवाने के क्या प्रयास किये जा रहे हैं और आगे कोई अतिक्रमण न हो उसके लिये रेलवे के पास क्या उपाय है?

रेलवे की कितनी जमीन पर हो चुके अतिक्रमण

रेल मंत्रालय की साल 2006-07 लोकसभा स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार 2006 तक रेलवे के पास कुल 4.31 लाख हेक्टेयर जमीन थी। इसमें 2033 हेक्टेयर जमीन को रेलवे ने गैरकानूनी से रूप से कब्जे में बताया था। रेलवे का कहना है कि इसमें सर्वाधिक अतिक्रमण मेट्रो एवं शहरी इलाकों में हैं। इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जमीन कब्जाने के कुल 159,323 मामले लंबित हैं। जिसमें 39,733 मामले पब्लिक प्रीमेसिस एवं एविक्शन एक्ट के अंतर्गत कोर्ट में हैं। जबकि 44,473 मामलों में एस्टेट ऑफिसर ने जमीन खाली करने के आदेश जारी किये हुए हैं। इसमें से भी 3,539 मामले हाइकोर्ट में चले गये हैं। यानि एस्टेट ऑफिसर के आदेश को अतिक्रमणकारियों ने नहीं माना और जमीन पर अपना कब्जा बनाये रखने के लिये सीधे हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कमेटी की एक रिपोर्ट संसद में पेश की गयी

फिर 2018 में रेलवे की खाली जमीनों के रखरखाव के लिए पब्लिक एकाउंट्स कमेटी की एक रिपोर्ट संसद में पेश की गयी। इस रिपोर्ट के मुताबिक अब रेलवे के पास बढ़कर कुल जमीन 4.59 लाख हेक्टेयर हो गयी है। यह आकंडे 31 मार्च 2014 तक के हैं और इसके बाद रेलवे की तरफ से कोई अधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं करवाया गया है। गौरतलब है कि इस कुल जमीन का 0.18 प्रतिशत हिस्सा यानि 861.70 हैक्टेयर अवैध कब्जे में है। इसप्रकार अतिक्रमण में पहले से कमी आई है। इन अतिक्रमणों में बड़े शहरों की बात करे तो दिल्ली का नंबर सबसे ऊपर है। देश की राजधानी दिल्ली में 60 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा हो चुका है। इसके बाद मुंबई में 41.20 हेक्टेयर, और चेन्नई में 40.18 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा हो चुका है।

कैसे विभाजित करती है रेलवे कब्जाई जमीन को

आधिकारिक रूप से रेलवे ने कब्जाई जमीनों को चार तरह की कैटेगरी में बांटा हुआ हैं। इसमें सबसे पहले आती है A कैटेगरी, जिसके अंतर्गत कब्जाई जमीन पर कोई स्थाई निर्माण कर दिया जाता है। रेलवे के अनुसार यह सबसे मुश्किल टाइप होता है जमीन को खाली करवाने का। इसके लिए उसे जरूरी कानूनी कार्यवाहियां भी करनी पड़ती हैं। फिर नंबर आता है B कैटेगरी का, जिसमे कोई स्थाई निर्माण नही होता। यह कब्जा रेलवे के मुताबिक सॉफ्ट कैटेगरी का रहता है जिसमें जमीन खाली करवाने में रेलवे को खास मशक्कत नहीं करनी पड़ती। फिर C और D कैटेगरी आती है जिसमें जमीन कब्जाने वाले अस्थाई रूप से जमीन पर अपने ठिकाना बनाते हैं, फिर खुद ही जमीन खाली कर कही चले जाते हैं।

जमीन कब्जाने का जिम्मेदार किसे मानता है रेलवे

यह एक रोचक विषय है। दरसअल रेल मंत्रालय कहता है कि उसके पास जितनी भी जमीन है, वह उसे राज्य सरकारों से मिली है। इसमें कुछ हिस्सा मुफ्त में मिली जमीनों सहित पैसा देकर अधिग्रहित जमीनों का शामिल है। अगर इन जमीनों पर कब्जा होता है तो उसकी जिम्मेदारी रेलवे की नहीं बल्कि राज्य सरकार की होती है। रेलवे के अनुसार ग्रामीण इलाकों से शहरी इलाकों में माइग्रेशन होता है लेकिन राज्य सरकारें बढ़ते शहरीकरण में हाउसिंग सुविधाएं देने में पिछड़ जाती हैं। इसी के चलते यह आबादी रेलवे की सार्वजनिक जमीनों पर कब्जा कर लेती है।

स्थानीय नेताओं का हस्तक्षेप

रेलवे का यहां तक कहना है कि अधिकतर मामलों में अतिक्रमण इसलिए नही हटता क्योंकि स्थानीय नेताओं का उसमें हस्तक्षेप होता है। यही नहीं, रेलवे का आरोप है कि अधिकतर मामलों में कब्जा इसलिए नहीं खाली होता क्योंकि इससे वहां लॉ एंड आर्डर की समस्या पैदा हो जाती है और राज्य सरकारों से पुलिस सहायता आसानी से नहीं मिलती।

जमीनों का मैनजमेंट कैसा होता है रेलवे में

साल 2008 में कैग की रिपोर्ट के आधार पर रेलवे ने अपनी जमीनों के रखरखाव के लिए कुछ जरुरी कदम उठाये हैं। जैसे कैग ने रेलवे को सुझाव दिया कि वह एक अलग से लैंड मैनजमेंट सेल बनाये। हालांकि रेलवे ने इस दिशा में थोडा काम तो किया है लेकिन अभी भी सक्षम नहीं बन सका है। साथ ही रेलवे ने अपनी जमीनों के रिकार्ड्स को डिजिटल करने का एक कदम उठाया है। मार्च 2022 में रेलवे ने बताया है कि उसने लगभग 95 प्रतिशत अपनी जमीनों के रिकार्ड्स डिजिटल कर लिए हैं, लेकिन उनके वेरिफिकेशन की प्रकिया अभी अधूरी है।

अवैध कब्जे को रोका जा सके

इसके अलावा रेलवे अपनी जमीनों पर बाउंड्री भी तैयार करवाता है जिससे अवैध कब्जे को रोका जा सके। रेलवे ने अपनी खाली पड़ी कई जमीनों पर बाउंड्री तैयार करवाई है लेकिन उसमें से कितनी बाउंड्री अब नहीं है अथवा गायब हो गयी, उसकी फिलहाल कोई सटीक जानकारी रेलवे ने नहीं दी है।

रेलवे का अपना EIR

रेलवे का अपना ही एक Encroachment Inspection Register (EIR) भी होता है। इसमें कब्जाई गयी भूमि की जगह, कब्जाने वाले का नाम, कितनी जगह कब्जाई गयी है, कब्जे का प्रकार यानि - वाणिज्यिक/आवासीय/खेती में से क्या है, कब से कब्जा शुरू हुआ, और कब्जे को हटाने के लिए क्या उपाय किये गए, जैसी जानकारियों को दर्ज किया जाता है।

Grow More Food Scheme लागू

रेलवे ने कब्जे को रोकने के लिए 2010 में Grow More Food Scheme लागू की थी। इसके अंतर्गत रेलवे अपने कर्मचारियों को खाली पड़ी जमीनों पर खेती करने का लाइसेंस देता है। भारतीय रेल ने Rail Land Development Authority (RLDA) का भी गठन किया है। इसका काम है कि जो रेलवे की भूमि खाली पड़ी हुई है और रेलवे को अपने ऑपरेशन में अभी फिलहाल उसकी जरुरत नहीं है, तो यह संस्था उस जमीन का व्यावसायिक डेवलपमेंट कर पैसा कमा सकती है।

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