Mahavir Swami Jayanti: महावीर स्वामी के उपदेश, जिनका इंसान को अपने जीवन में पालन करना चाहिये

जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का जन्म लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को हुआ था। इनके पिता राजा सिद्धार्थ वैशाली जनपद के कुण्डग्राम में इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय राजा थे।

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महावीर स्वामी को वर्धमान, वीर, अतिवीर, महावीर और सन्मति जैसे नामों से भी पहचाना जाता हैं। उनका विवाह यशोदा से हुआ और उनके दो पुत्री - प्रियदर्शना और अणोज्जा थी। उनकी बचपन से ही गृहस्थ जीवन में रूचि नहीं थी। इसलिये माता-पिता की मृत्यु के बाद 30 वर्ष की आयु में अपने बड़े भाई नन्दीवर्धन से आज्ञा लेकर उन्होंने गृहस्थ जीवन त्याग दिया और सन्यासी जीवन धारण किया।

लगभग 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद 42 वर्ष की उम्र में जृम्भिकग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के किनारे 'साल' के वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। जिसके उपरांत वह जैन धर्म के 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर बनें। उन्होंने पावापुरी में 'जैन संघ' की भी स्थापना की।

भगवान महावीर स्वामी ने दुनिया को जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए - अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अस्तेय (चोरी न करना) और ब्रह्मचर्य। भगवान स्वामी ने अपना प्रथम उपदेश (जिसे 'बिरशासन उदया' कहा गया) महाराजा बिम्बिसार को राजगृह के समीप विपुलांचल पहाङी पर वाराकर नदी के किनारे दिया, जो मागधी या अर्द्ध-मागधी भाषा में था। आइये जानते है महावीर स्वामी के उन प्रमुख उपदेशों के बारे में जिनका हर इंसान को अपने जीवन में पालन करना चाहिए।

अहिंसा के पालन से जीवन सुखमय बनता है
महावीर स्वामी जी ने अहिंसा ही परम धर्म है' का उपदेश दिया। उन्होंने कहा अपने मन, वचन तथा कर्म से हिंसा नहीं करनी चाहिए। अहिंसा ही परम ब्रह्म है, अहिंसा ही सुख-शांति देने वाली है। यह मनुष्य का सच्चा कर्म है। इसके पालन से मानव जीवन सरल हो जाता है। महावीर स्वामी का सबसे बड़ा उपदेश/सिद्धांत अहिंसा ही था।

सत्य से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है
महावीर स्वामी ने बताया कि मनुष्य को हमेशा सत्य वचन बोलने चाहिए। उन्होंने कहा कि मानव जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य 'मोक्ष' सत्य द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। अतः हमें हमेशा सत्य वचन बोलने चाहिए।

चोरी करना एक पाप व अपराध
स्वामी जी ने अस्तेय के मार्ग पर चलने पर बल दिया यानि व्यक्ति को कभी भी चोरी नहीं करनी चाहिए। चोरी करना एक पाप तथा अपराध है, जिससे करने पर व्यक्ति हमेशा परेशानियों का सामना करता रहता है और व्यक्ति पापी तथा अपराधी बनकर मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर सकता है।

लालच से व्यक्ति को कभी मुक्ति नहीं मिलती
महावीर स्वामी ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति मोक्ष की प्राप्ति चाहता है, तो माया के पीछे नहीं भागना चाहिए यानि धन का संचय नहीं करना चाहिए। क्योंकि धन के कारण ही व्यक्ति लालची व अभिमानी हो जाता है तथा अपनी इच्छाओं को नहीं छोड़ पाता। जिसके चलते उसकी मुक्ति नहीं मिलती है।

इन्द्रियों को नियंत्रण में रखना है तो करें ब्रह्मचर्य का पालन
महावीर स्वामी ने अपने उपदेश में बताया कि जैन भिक्षुओं सहित अगर व्यक्ति ब्रह्मचर्य का पालन करे तो वह अपनी इन्द्रियों को वश में कर सकता है। जिससे व्यक्ति इस संसारिक मोह माया से विचलित नहीं होता और परमानन्द को प्राप्त कर सकता है।

स्वयं से लड़ो, दुश्मन से नहीं
भगवान महावीर स्वामी जी कहा कि आपका दुश्मन आपके अंदर ही (दोष) है। जिनसे हमें स्वयं ही लड़ना है। अगर हम अपने दोषों पर विजय अर्थात दोषों का दूर कर दे तो हमें आनन्द (मोक्ष) की प्राप्ति संभव है। बाहरी दुश्मन से लड़कर हम अपने दोषों को और बढ़ाते है, इसलिए बाहरी दुश्मन को छोड़कर अपने अंदर के दुश्मन - लालच, द्वेष, क्रोध, घमंड और घृणा आदि से लड़ना चाहिए। खुद पर विजय प्राप्त करना लाखों शत्रुओं पर विजय पाने से बेहतर है।

गलतियों पर नियंत्रण करें
व्यक्ति अधिकतर अपनी गलतियों से ही दुख पाता है। अगर वह अपनी गलतियों पर नियंत्रण पा ले तो उसे सच्चे सुख की प्राप्ति हो सकती है। अगर अनचाने में गलती होती है तो उसको दूरस्थ करना चाहिए और जीवन में ध्यान रखना चाहिए की वैसी गलती फिर दोबारा न हो, तभी व्यक्ति परम आनन्द प्राप्त कर सकता है।

घृणा से होता है विनाश
स्वामी जी ने अपने उपदेश में कहा है कि व्यक्ति को हर जीवित प्राणी के प्रति दयाभाव रखने चाहिए, घृणा नहीं। घृणा से हम केवल अपना विनाश करते हैं, इसलिए घृणा का त्याग करें।

क्रोध से होता है स्वयं का विनाश
क्रोध हमेशा अधिक क्रोध को जन्म देता है और स्वयं के विनाश का कारण भी बनता है। जबकि क्षमा व प्रेम द्वारा व्यक्ति को सम्मान प्राप्त होता है। इसलिए हमेशा क्षमा व प्रेम का विचारों को ही अपनाना चाहिए। इससे जीवन को सरल किया जा सकता है।

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