Chandrababu Naidu: चंद्रबाबू नायडू का सियासी सफर, उठता-गिरता करियर

राजनीतिक विचारक निकोलो मैक्यावली ने कहा था कि आमतौर पर जब समुद्र शांत हो तो लोग तूफान की कल्पना नहीं करते। भारतीय राजनीति में आंध्र प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्री एनटी रामाराव और उनके दामाद एन. चंद्रबाबू नायडू दोनों का राजनीतिक जीवन इसकी जीती जागती मिसाल है। इन दोनों में से भी चंद्रबाबू नायडू के राजनीतिक जीवन का उतार-चढ़ाव काफी दिलचस्प है।

आंध्र प्रदेश के नंदयाल जिले के दौरे के दौरान शनिवार (9 सितंबर) को पूर्व मुख्यमंत्री और तेलुगू देशम पार्टी के अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू को स्किल डेवलपमेंट स्कैम से जुड़े केस में गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 465 (जालसाजी), 120-बी (आपराधिक साजिश रचने) और पीएमएलए के तहत आरोप में आपराधिक मामले दर्ज हैं। कुछ गैरजमानती अपराधों के आरोपों के साथ दक्षिण भारत के दिग्गज राजनेता रहे चंद्रबाबू नायडू सुर्खियों में शामिल हो गए हैं।

Chandrababu Naidu

हालिया उतार साथ लेकर आया सियासी सफर के चढ़ाव का जिक्र

"मैंने उनसे पूछा कि आप मुझे क्यों गिरफ़्तार कर रहे हैं, मेरे खिलाफ सबूत कहां हैं? लेकिन उन्होंने कुछ नहीं बताया...ये बहुत दुखद है। आज आंध्र प्रदेश पुलिस ने दिनदहाड़े लोकतंत्र की हत्या की है। मैंने उनसे पूछा कि मेरी गलती क्या है, लेकिन वो कहते रहे कि हम ये नहीं बतायेंगे। दुनिया की कोई ताकत मुझे तेलुगु लोगों, मेरे आंध्र प्रदेश और मेरी मातृभूमि की सेवा करने से नहीं रोक सकती है। सत्य, धर्म और न्याय की जीत होगी। वो कुछ भी करें, मैं जनता के लिए आगे बढ़ता रहूंगा।" हालिया नोंकझोक और नाटकीयता से भरी गिरफ्तारी के बाद चंद्रबाबू नायडू की जुबानी प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया पोस्ट का यह हिस्सा फिलहाल उनके सियासी सफर में उतार की तरह दर्ज किया जा रहा है, लेकिन उनके राजनीतिक चढ़ाव की चर्चा करने का मौका भी साथ लेकर आया है।

नंदयाल से विजयवाड़ा ले जाए जाने के दौरान चंद्रबाबू ने पुलिस सुरक्षा पर भरोसा नहीं होने और अपने काफिले के साथ एनएसजी की निगरानी में रहने की बात मनवाकर यह साबित भी कर दिया। वहीं, आंध्र प्रदेश के तमाम विपक्षी दलों की ओर से उनकी गिरफ्तारी के विरोध ने भी उनको एक बार फिर आंध्र का 'सेंटर ऑफ अट्रैक्शन' और 'टॉक ऑफ द टाउन' बना दिया है।

नायडू ने किन हालातों में हासिल किया सियासत में सबसे बड़ा चढ़ाव

'एनटीआर ए पोलिटिकल बॉयोग्राफ्री' के लेखक रामचंद्र मूर्ति कोंडूभाटला ने उस घटना के बारे में बहुत स्पष्टता से लिखा है कि चंद्रबाबू नायडू ने कैसे एनटीआर की दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती की आड़ में निशाना साधते हुए अपना राजनीतिक मकसद पूरा किया। उन्होंने लिखा, "दरअसल, जिस तरह से चंद्रबाबू नायडू ने एनटीआर के विरोध में माहौल बनाया वह उनकी रणनीतिक चतुराई का नमूना था। चंद्रबाबू नायडू को अच्छी तरह मालूम था कि उन्हें किसे, किसके खिलाफ और कब इस्तेमाल करना है।

चंद्रबाबू नायडू ने अपने साले डॉक्टर दग्गूबती वैंकटेश्वर राव को आंध्र प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री पद का लालच देकर अपने खेमे में शामिल कर लिया। हालांकि, उनको अच्छे से मालूम था कि इस वादे को पूरा नहीं कर पाएंगे।" लेखक ने बताया है कि कैसे नायडू ने तेलगुदेशम पार्टी (टीडीपी) के 171 विधायकों को अपनी ओर किया। अविश्वास प्रस्ताव के बाद एनटीआर के इस्तीफे को देखकर नायडू के पक्ष में 183 विधायक आ गए।

1 सितंबर, 1995 को पहली बार मुख्यमंत्री पद के शपथ ग्रहण के तुरंत बाद चंद्रबाबू नायडू अपनी पत्नी भुवनेश्वरी और बेटे लोकेश के साथ एनटीआर से मिलने गए तो उन तीनों के विजिटर्स हॉल में घंटे भर इंतजार करने के बावजूद भेंट नहीं हुई। आखिरकार चंद्रबाबू नायडू और उनके परिवार को एनटीआर के सचिव भुजंग राव को ही गुलदस्ता सौंपकर लौटना पड़ा था। यह नायडू का सबसे बड़ा राजनीतिक चढ़ाव था। साथ ही साथ व्यक्तिगत और पारिवारिक लिहाज से यह उनका उतार भी था।

28 साल की उम्र से सियासत में चढ़ाव, आंध्र प्रदेश से दिल्ली तक बढ़ा भाव

अपनी किताब 'एनटीआर अ बायोग्राफ़ी' में के. चंद्राहास और के. लक्ष्मीनारायणा लिखते हैं कि कैसे आंध्र प्रदेश के सबसे बड़े नेताओं में एक एनटी रामाराव की दूसरी शादी के सार्वजनिक होने के मौके पर पहली पंक्ति में बैठे चंद्रबाबू नायडू ने बिजली कटवाकर मामला संदिग्ध बना दिया था। तब इसे चंद्रबाबू नायडू की सियासत की समझ और आगे की सोच बताया गया था। भले एनटीआर हमेशा के लिए नाराज हो गए थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जन्म का साल साझा करने वाले चंद्रबाबू नायडू की शुरुआती पढ़ाई और संघर्ष भी मिलता जुलता है। आंध्र प्रदेश में महज 28 साल की उम्र में सबसे कम उम्र के विधायक और मंत्री बने चंद्रबाबू नायडू के सियासी सफर में साल 1999 सबसे शानदार रहा। क्योंकि विधानसभा चुनाव में कुल 294 में से 185 सीटें, लोकसभा चुनाव 1999 में आंध्र प्रदेश की 42 में से 29 सीटें जीतकर बैक टू बैक शानदार बढ़त हासिल की। नायडू दोबारा मुख्यमंत्री तो बने ही उनकी तेलगुदेशम पार्टी तत्कालीन केंद्र सरकार चलाने वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में भारतीय जनता पार्टी के बाद दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी बन गई। आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद के पास सिकंदराबाद में सिलिकॉन वैली की तरह साइबर सिटी के विकास से वह देश भर में पहचाने जाने लगे।

जानलेवा हमला, सियासी हादसा और पार्टी की चुनावी हार, फिर वापसी

2004 के चुनाव से पहले 2003 में एक लैंड-माइन ब्लास्ट के दौरान आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्राबाबू नायडू की हत्या की कोशिश करने का बड़ा मामला सामने आया। हालांकि, कॉलरबोन और हेयरलाइन फ्रैक्चर के साथ नायडू मौत के मुंह से बचकर वापस आ गए। हां, यह हादसा सियासत में उनके लिए अपशकुन था। 2004 के चुनाव में वह तो कुप्पम से चुनाव सीट से जीते पर उनकी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। इसके बाद वह आंध्र में सबसे लंबे समय तक विपक्ष के नेता के रूप में सक्रिय रहे।

दस साल बाद आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बंटने के बाद नवगठित आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू ने सत्ता में फिर वापसी की और 8 जून 2014 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। तिरुपति के पास चंद्रगिरी से कांग्रेस से राजनीति की शुरुआत कर फिर टीडीपी के रास्ते सत्ता हासिल करने वाले चंद्रबाबू नायडू दस्तावेजों में भी अरबपति राजनेता के रूप में दर्ज हैं। साल 2018 में आंध्र प्रदेश के विकास के मसले पर संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाकर चंद्रबाबू नायडू की तेलुगुदेशम पार्टी ने नरेंद्र मोदी सरकार और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दोनों से रिश्ते तोड़ लिए। इसके साथ ही कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का दामन थाम लिया। फिलहाल विपक्षी दलों की इस साझा मंच का हालिया नाम आईएनडीआईए हो गया है।

लेकिन चंद्रबाबू ने अभी तक इंडी एलायंस से नाता नहीं जोड़ा है। मौजूदा समय में उनकी पार्टी का तेलंगाना विधानसभा में 119 सदस्यों में से एक और आंध्र प्रदेश विधानसभा में 175 में से 23 सदस्य हैं। लोकसभा में 545 सीटों में टीडीपी के तीन और राज्यसभा में दो सांसद हैं। साल 2019 में राज्यसभा में उनके 6 में चार सदस्यों ने बीजेपी का दामन थाम लिया था।

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