Court on Media: कलकत्ता हाई कोर्ट ने फिर उठाया मीडिया की आचार संहिता का मुद्दा
Court on Media: कलकत्ता हाई कोर्ट ने मीडिया पर बड़ी जिम्मेदारी डालते हुए कहा है कि आम आदमी से ज्यादा सटीकता का मानदंड मीडिया को स्थापित करना चाहिए। यानी सही जानकारी और सही परिप्रेक्ष्य ही रिपोर्टिंग का मुख्य आधार होना चाहिए। कलकत्ता हाई कोर्ट की अवधारणा उन मुकदमों पर आए फैसलों पर सही बैठती है, जिनमें मीडिया रिपोर्ट के आधार पर आरोप लगाए गए या मीडिया में गलत तथ्य आने के कारण मुकदमे कमजोर पड़ गए।
कोर्ट के इस फैसले से इस बात पर बहस हो सकती है कि मीडिया के लिए कोर्ट या क्राइम रिपोर्ट के लिए कोई गाइड लाइन जारी की जा सकती है क्या ? हालांकि सुप्रीम कोर्ट तक ने कोर्ट की कार्रवाई के मामले में मीडिया पर किसी प्रकार का अंकुश लगाने से इंकार किया है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने भी मीडिया रिपोर्टिंग पर किसी प्रकार की रोक लगाने की मांग पर ध्यान नहीं दिया।

17 अक्टूबर को बंगाल में बहाली घोटाले के मामले में मीडिया की भूमिका की सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट की एकल बेंच के जज न्यायाधीश जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को भी सेलेक्टेड इनफोर्मेशन देने और मीडिया को तोड़ मरोड़ कर तथ्य लीक करने से बाज आने को कहा।
न्यायाधीश ने कहा समाचार को बस समाचार के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए जो पूरी तरह वस्तुनिष्ठ हो, उसमें मनमाने ढंग से किए गए कटाक्षों से बचना चाहिए। जिम्मेदार पत्रकारिता की पहली जरुरत सूचनाओं की सटीकता है। यानी इसे पूरी तरह से सत्य होना चाहिए और ठोस सामग्रियों और उसके स्रोतों द्वारा पुष्ट भी होना चाहिए। कोर्ट ने जो एक बड़ी बात बोली वह यह कि मीडिया को कोई अतिरिक्त आजादी हासिल नहीं है, बल्कि मीडिया को एक कदम आगे बढ़कर अतिरिक्त और उच्च मानदंड स्थापित करना चाहिए, क्योंकि मीडिया का बड़े पैमाने और व्यापक प्रभाव पर समाज पर पड़ता है।
कोर्ट ने जांच एजेंसियों विशेष कर ईडी को यह निर्देश दिया कि वह कोर्ट में दस्तावेज दाखिल करने से पहले किसी संदिग्ध आरोपी या गवाह के विवरण का खुलासा मीडिया में करने से बचें। टीएमसी सांसद और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी भर्ती घोटाले के आरोपी हैं और उनकी पत्नी रुजीरा बनर्जी ने कोलकोता हाई कोर्ट में याचिका लगाकर मीडिया के हस्तक्षेप को रोकने की की मांग की थी।
याचिकाकर्ता ने अपने पति के मुकदमे की मीडिया कवरेज को पूर्वाग्रह पैदा करने और बिना परिणाम के दोषी मानने को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था। पिछले साल इसी मामले में ईडी ने तृणमूल कांग्रेस महासचिव अभिषेक बनर्जी की कंपनी लीप्स एंड बाउंड्स प्राइवेट लिमिटेड के कार्यालय पर छापेमारी की थी। जांच एजेंसी के अनुसार लीप्स एंड बाउंड्स कंपनी और एक अन्य निजी कंपनी एसडी कंसल्टेंस के अन्य आरोपी सुजय कृष्ण भद्र के बीच 95 लाख रुपये के तीन संदिग्ध वित्तीय लेनदेन किए गए थे।
मीडिया के लिए आचार संहिता बनाने के संबंध में किसी उच्च न्यायालय की यह पहली टिप्पणी नहीं है। इसके पहले 2022 के अप्रैल में केरल हाई कोर्ट ने भी कुछ ऐसी ही टिप्पणी की थी। 19 अप्रैल 22 को टी.एन. सूरज बनाम केरल राज्य के मामले में कोर्ट ने कहा था कि मीडिया को चल रही जांच, अदालती कार्यवाही या आपराधिक परीक्षणों के परिणामों पर अटकलें लगाने का अधिकार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि मीडिया ट्रायल के परिणामस्वरूप न्याय देने की प्रक्रिया की बदनामी होती है।
न्यायमूर्ति मोहम्मद नियास सी.पी. ने कहा "आधा सच और गलत सूचना, प्रकाशन या प्रसारण का आधार नहीं हो सकती। मीडिया को चल रही जांच या अदालती कार्यवाही या आपराधिक मुकदमों के नतीजे पर अटकलें लगाने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। इस मामले में मलयालम अभिनेता दिलीप के बहनोई सूरज ने एक याचिका दायर की थी। उन्होंने अदालत से यह गुहार की थी कि एक हत्या की साजिश और यौन उत्पीड़न के मामले की रिपोर्टिंग करते समय मीडिया चैनल उन पर मीडिया ट्रायल कर रहे हैं।
दरअसल कोई भी न्यायालय लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर कोई क़ानूनी अंकुश नहीं लगाना चाहता। मीडिया के प्रति सभी टिप्पणियों या सलाह के पीछे यह भावना है कि मीडिया जवाबदेह बने। क्योंकि पॉलिटिकली और सोशयली सेंसिटिव मुद्दे पर अनर्गल टिप्पणी केवल नकारात्मक माहौल पैदा करती है, इसलिए न्यायालय से जुड़ी किसी तरह की कार्रवाई या न्यायालय द्वारा की गई टिपण्णी को बिना परिप्रेक्ष्य समझे मिर्च मसाले के साथ प्रस्तुत करने से बचना चाहिए। न्यायालय द्वारा सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी कई बार पक्षों से जवाब लेने के संदर्भ में होती है जिसका अंतिम फैसले में जिक्र तक नहीं होता है।
न्यायालय की निष्पक्ष क्षवि को किसी भी तरह के निहित स्वार्थ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाए, अदालतों के ये निर्देश उसी दिशा में हैं। जब भी कोई एक पक्ष न्यायपालिका की टिप्पणी को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करता है और उसकी टिप्पणी को अपने फायदे का दिखाता है तो दूसरे पक्ष की तरफ से न्यायपालिका को पक्षधर दिखाने का प्रयास होता है। ये बातें न्यायपालिका के लिए हानिकारक हैं और उसकी छवि को धूमिल करती हैं। आम जनमानस के लिए न्यायपालिका ही उनके अधिकारों की रक्षा का अंतिम स्तंभ है।
दूसरी तरफ बेलगाम मीडिया कवरेज से न सिर्फ संस्थान का बल्कि मुकदमे के अभियुक्त, सस्पेक्ट एवं गवाहों के मौलिक एवं संवैधानिक अधिकारों का भी हनन होता है। इसका निष्पक्ष सुनवाई पर भी असर होता है। असत्यापित जानकारी के आधार पर मुकदमे खासकर अभियुक्त को लेकर एक अलग अवधारणा समाज बना लेता है, जिसका सत्य से कोई सरोकार नहीं होता। ऐसे में मीडिया को अपनी रिपोर्टिंग और उस से जुड़े हुए तथ्य को लेकर सजग और सावधान रहना ही चाहिए।
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