Jyotiba Phule: शिक्षा और सामाजिक सुधार हेतु सदा समर्पित रहे ज्योतिबा

19वीं सदी के समाज सुधारक ज्योतिबा फुले, आजीवन वंचितों, शोषितों और महिलाओं के सशक्तिकरण में लगे रहे। डॉ. भीमराव अंबेडकर भी उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते थे।

Jyotiba Phule Jayanti 2023 always dedicated to education and social reform

Jyotiba Phule: समाज सुधारक और लेखक ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के पुणे में एक माली परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम गोविंदराव और माता का नाम चिमणाबाई था। ज्योतिबा फुले का पूरा नाम ज्योतिराव गोविंदराव फुले था। उन्हें महात्मा फुले के नाम से भी संबोधित किया जाता है। जब ज्योतिबा फुले केवल एक वर्ष के थे तभी उनकी माता का निधन हो गया। अतः उनकी परवरिश सगुणाबाई ने की।

ज्योतिबा फुले का प्रारंभिक जीवन

सात साल की उम्र में ज्योतिबा फुले को गांव के एक स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा गया। आर्थिक तंगी के कारण उन्हें कम उम्र में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। इसके बावजूद उनकी पढ़ने की उत्सुकता बनी रही। सगुणाबाई ने ही उन्हें मां का प्यार दिया और घर में ही ज्योतिबा के पढ़ने की व्यवस्था कराई।

ज्योतिबा फुले के पिता ने स्कॉटिश मिशन हाईस्कूल, पुणे में उनका नामांकान कराया, जहां से उन्होंने अंग्रेजी में स्कूली शिक्षा ग्रहण की। जब ज्योतिबा फुले केवल 13 वर्ष के थे, तब साल 1840 में उनका विवाह नौ वर्षीय सावित्रीबाई से हुआ। ज्योतिबा फुले के काम में उनकी पत्नी ने बढ़-चढ़कर साथ दिया। हालांकि, सावित्रीबाई पढ़ी-लिखी नहीं थी और शादी के बाद ज्योतिबा फुले ने ही उनको पढ़ना लिखना-सिखाया।

महिलाओं का सशक्तिकरण

ज्योतिबा फुले थॉमस पेन की पुस्तक 'द राइट्स ऑफ मैन' से काफी प्रभावित थे। साल 1848 में उन्होंने लड़कियों के लिए पुणे में पहला स्कूल खोला और अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को पढ़ा-लिखाकर इस स्कूल का पहला प्रिंसिपल बनाया। इसके बाद, उन्होंने कई अन्य स्कूलों की भी स्थापना की। वह बाल-विवाह के खिलाफ और विधवा-विवाह के समर्थक थे।

साल 1853 में उन्होंने विधवाओं के लिए एक आश्रम खोला, जिसमें सभी जाति की महिलाएं सम्मान के साथ रह सकती थीं। ज्योतिबा ने साल 1855 में प्रौढ़ शिक्षा की शुरुआत की। उन्होंने मजदूरों और गृहणियों के लिए रात्रि पाठशालाएं खोलीं एवं अध्यापन कार्य चलाया।

सत्यशोधक समाज की स्थापना

साल 1873 में दलितों और कमजोर वर्ग को न्याय दिलाने हेतु ज्योतिबा फुले ने 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की। ज्योतिबा इस संस्था के पहले अध्यक्ष बने और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले महिला विभाग की प्रमुख बनीं। यह संस्था बिना पुजारी और दहेज के शादी का आयोजन करती थी।

सत्यशोधक समाज का मुख्य उद्देश्य पिछड़ी जातियों को शोषण से मुक्त कराना था। सत्यशोधक समाज की मान्यताएं यह थीं कि भगवान और भक्त के बीच कोई मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं है। ऐसे मध्यस्थों की तरफ से लादी गई धार्मिक दासता को समाप्त करना और सभी जातियों के स्त्री-पुरुषों को शिक्षा उपलब्ध कराना ही इस संस्था का उद्देश्य था। सत्यशोधक समाज की स्थापना के कुछ समय बाद ही इसकी शाखाएं मुंबई और पुणे के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित होने लगीं। कोल्हापुर के शासक शाहूजी महाराज ने भी इस संस्था को भरपूर नैतिक और वित्तीय सहायता प्रदान की।

वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट का किया विरोध

साल 1878 में वायसराय लॉर्ड लिटन ने वर्नाक्यूलर एक्ट पास किया था। यह एक्ट प्रेस की आजादी पर हमला था। ज्योतिबा फुले का अखबार 'दीनबंधु' भी इस कानून की चपेट में आया। जब लॉर्ड लिटन पुणे आने वाला था, तो उसके स्वागत का भव्य आयोजन किया गया। ज्योतिबा फुले इस आयोजन के खिलाफ खड़े हो गए और कहा कि लिटन जैसे क्रूर व्यक्ति पर जनता का पैसा खर्च करना ठीक नहीं है। ज्योतिबा फुले तब नगरपालिका के सदस्य थे। जब नगरपालिका में इस आयोजन पर होने वाले खर्च के लिए प्रस्ताव रखा गया, तो ज्योतिबा फुले ने इस प्रस्ताव के विरोध में वोट किया।

हंटर कमीशन को दिया सुझाव

साल 1882 में ब्रिटिश सरकार ने हंटर कमीशन का गठन किया। इस कमीशन के अध्यक्ष सर विलियम हंटर थे। इस आयोग का गठन भारत में शिक्षा व्यवस्था की दिशा और दशा की जानकारी प्राप्त करने के लिए किया गया था। ज्योतिबा फुले ने हंटर कमीशन के सामने अपना लिखित बयान दिया। इस बयान में उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण विषयों पर जोर दिया। इनमें ग्रामीण क्षेत्रों के लिए स्वतंत्र शिक्षा व्यवस्था, गणित, इतिहास, भूगोल, व्याकरण का प्रारंभिक ज्ञान, सामान्य ज्ञान, आरोग्य जैसे मुद्दे शामिल थे।

जब महात्मा फुले को मारने आए लोगों का हुआ हृदय परिवर्तन

धनंजय कीर ने अपनी पुस्तक 'महात्मा ज्योतिराव फुले' में एक घटना का जिक्र किया है, जिसके अनुसार एक बार ज्योतिबा फुले को जान से मारने के लिए दो व्यक्ति उनके पास तब आए, जब ज्योतिबा रात को सो रहे थे। जब ज्योतिबा ने उन्हें देखा, तो पूछा कि तुम लोग कौन हो? उन लोगों में से एक ने कहा कि मैं तुम्हे मारने के लिए यहां आया हूं।

यह सुनकर फुले ने उनसे फिर पूछा कि मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है कि तुम लोग मुझे मारने आए हो? उन दोनों ने उत्तर दिया कि तुमने हमारा कुछ नहीं बिगाड़ा है, लेकिन हमें तुम्हें मारने के लिए भेजा गया है। फुले ने उनसे पूछा कि मुझे मारकर तुम लोगों को क्या हासिल होगा? उन्होंने कहा कि अगर हम तुम्हें मार देंगे, तो हमें एक-एक हजार रुपये उपहार स्वरूप मिलेंगे। इस पर फुले ने जवाब दिया कि अगर मेरी मौत से आप लोगों को फायदा होने वाला है, तो बेशक मुझे मार दो। यह मेरा सौभाग्य होगा कि जिन गरीबों की मैं सेवा कर स्वयं को भाग्यशाली मानता हूं, वे ही मुझे जान से मारने के लिए आए हैं।

महात्मा फुले की ये बातें सुनकर उन दोनों ने उनकी हत्या की योजना बदल दी और उनसे माफी मांगते हुए कहा कि अब हम उन लोगों को मार डालेंगे, जिन्होंने आपको मारने के लिए हमें भेजा है। इस पर फुले ने उन्हें समझाते हुए कहा कि बदला लेना ठीक बात नहीं है। इस घटना के बाद दोनों व्यक्ति फुले से प्रेरित होकर उनके सहयोगी बन गए और फुले द्वारा किए जा रहे सामाजिक कार्यों में हाथ बंटाने लगे।

ज्योतिबा फुले की महत्त्वपूर्ण रचनाएं

साल 1873 में ज्योतिबा फुले ने 'गुलामगिरी' की रचना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने 'तृतीय रत्न', 'छत्रपति शिवाजी', 'किसान का कोड़ा' और 'अछूतों की कैफियत' जैसी महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का लेखन किया। ज्योतिबा ने कृष्णराव भालेकर की मदद से किसानों, मजदूरों और अन्य श्रमिक वर्ग की आवाज को उभारने के उद्देश्य से 1877 में एक साप्ताहिक अखबार 'दीनबंधु' का भी प्रकाशन शुरू किया। यह अखबार सत्यशोधक समाज के विचारों और कार्यों का भी प्रचार-प्रसार करता था। साल 1888 में मुंबई की एक जनसभा में ज्योतिबा फुले को 'महात्मा' की उपाधि दी गई। 28 नवंबर 1890 को ज्योतिबा फुले का निधन हो गया।

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