Defence Deals: तोप, हेलिकॉप्टर से लेकर लड़ाकू विमान… हर बार विवादों में फंसे विदेशी रक्षा सौदे
Defence Deals: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले हफ्ते अमेरिका में थे। इस दौरान अमेरिका से 31 प्रिडेटर ड्रोन खरीदने की डील फाइनल करने की खबर आई। कांग्रेस ने अब इस डील को राफेल से भी बड़ा घोटाला बताते हुए इस पर सवाल उठाये हैं। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि हम 31 प्रिडेटर ड्रोन (15 एमक्यू9बी सी गार्डियन और 16 स्काई गार्डियन ड्रोन) $3 बिलियन में खरीद रहे हैं। जबकि अमेरिकी वायु सेना ने एमक्यू-9 ड्रोन (बेहतर गुणवत्ता वाला संस्करण) $56.5 मिलियन प्रति ड्रोन के हिसाब से खरीदा है।
साल 2016 में ब्रिटेन ने एमक्यू-9बी ड्रोन $12.5 मिलियन में खरीदा था। जबकि ऑस्ट्रेलिया सरकार को इस एक ड्रोन की $137.58 मिलियन पेशकश की गयी थी। हालांकि, उन्होंने ज्यादा कीमत की वजह से डील कैंसिल कर दी थी। स्पेन ने भी प्रति ड्रोन $46.75 मिलियन का भुगतान किया था। ताइवान ने प्रति ड्रोन के लिए $54.40 मिलियन का भुगतान किया। इटली और नीदरलैंड, दोनों देशों ने इसे $82.50 मिलियन प्रति ड्रोन के हिसाब से खरीदा था। जबकि भारत सरकार प्रति ड्रोन $110 मिलियन का भुगतान कर रही है।

मंत्रालय ने रक्षा सौदे पर दी थी सफाई
इस पर विवाद को लेकर 25 जून 2023 को रक्षा मंत्रालय ने एक प्रेस रिलीज जारी करते हुए कहा था कि 'एक्सेपटेंस ऑफ नेसेसिटी' (AoN) में 3 हजार 72 मिलियन डॉलर की कीमत का अनुमान है। अमेरिकी सरकार से पॉलिसी अप्रूवल मिलने के बाद कीमत पर मोलभाव किया जाना है। रक्षा मंत्रालय, खरीद की लागत की तुलना उन कीमतों से करेगा, जिसपर जनरल एटॉमिक्स ने दूसरे देशों को ड्रोन बेचे हैं।
इसके बाद भारत की तरफ से अमेरिकी सरकार को एक लेटर ऑफ रिक्वेस्ट (LOR) भेजा जाएगा। इसमें ड्रोन, बाकी जरूरी उपकरण और सौदे की शर्तें शामिल होंगी। इसी लेटर ऑफ रिक्वेस्ट के आधार पर अमेरिकी सरकार और भारत का रक्षा मंत्रालय लेटर ऑफ ऑफर एंड एक्सेप्टेंस (LoA) तय करेंगे। इस LoA में सौदे की कीमत और बाकी शर्तों पर मोलभाव शामिल होगा। कुल मिलाकर कीमत और सौदे की बाचतीत चल रही है, कीमत अभी तय नहीं हुई है।
अब यहां सवाल ये है कि आखिर हर रक्षा सौदे से पहले क्यों घोटाले का ढिंढोरा पीटा जाने लगता है। वैसे यह पहली बार नहीं है जब कोई रक्षा सौदा विवादित हुआ हो। दरअसल बीते कुछ दशकों में लगभग हर बड़े रक्षा सौदे पर सवाल खड़े किये गए थे। आइये जानते हैं ऐसे ही कुछ बड़े रक्षा सौदों और उनसे जुड़े विवादों को।
बोफोर्स तोपें
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने थे। तब साल 1985-86 के समय भारत सरकार ने सेना के लिए 155 एमएम फील्ड होवित्जर खरीदने के लिए टेंडर निकाला। होवित्जर का मतलब छोटी तोप या बंदूक होता है। तीन देशों फ्रांस, ऑस्ट्रिया और स्वीडन ने इस सौदे में दिलचस्पी दिखाई। तब स्वीडन और ऑस्ट्रिया ने आपस में डील कर ली, जिसके अनुसार तोप स्वीडन देगा और गोला-बारूद ऑस्ट्रिया का होगा।
करीब ₹1500 करोड़ के इस सौदे में स्वीडन की कंपनी बोफोर्स एबी ने भारत को 410 होवित्जर तोपें बेची। मई 1986 में स्वीडन के एक रेडियो ने खुलासा किया कि बोफोर्स सौदे को हासिल करने के लिए करीब ₹64 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई है। इस कथित रिश्वत का आरोप राजीव गांधी पर भी लगा। वहीं इस पूरे डील में इटली के बिजनसमैन और सोनिया गांधी के करीबी ओतावियो क्वात्रोकी पर इस डील में दलाली लेने का आरोप लगा।
बोफोर्स मामले की सीबीआई जांच शुरू हुई। 1991 में राजीव की हत्या हो गई लेकिन जांच जारी रही। 31 मई 2005 को दिल्ली हाइकोर्ट ने राजीव गांधी की मृत्यु हो जाने के कारण उनके खिलाफ लगे सारे आरोपों को हटा दिया। उधर क्वात्रोकी गिरफ्तारी के डर से भारत छोड़कर भाग गया और उसे कभी भारत नहीं लाया जा सका और 12 जुलाई 2013 को उसकी भी मौत हो गई।
बराक मिसाइल
23 अक्टूबर 2000 को भारत सरकार ने इजराइल से $199.50 मिलियन की कुल लागत पर सात बराक सिस्टम और $69.13 मिलियन की लागत पर 200 मिसाइलों की खरीद के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर किये गये थे। इसके बाद साल 2001 में तहलका पत्रिका ने 'ऑपरेशन वेस्ट एंड' नाम से एक स्टिंग किया। इसमें आरोप लगाया गया कि भारत सरकार के 15 रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार हुआ है। इसमें इजराइल से खरीदे जाने वाली बराक मिसाइल भी शामिल है।
भारत सरकार की ओर से जो टीम इस मिसाइल के परीक्षण के लिए गयी थी, उस पर सवाल उठने लगे। तहलका के इस स्टिंग में एनडीए सरकार की सहयोगी समता पार्टी के नेता आर.के. जैन ने कबूल किया कि इस सौदे को करवाने के लिए उन्हें पूर्व नौसेना प्रमुख एस.एम. नंदा के बेटे सुनील नंदा से ₹10 मिलियन की रिश्वत मिली थी। साथ ही आरोप लगे कि रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीस और उनकी करीबी जया जेटली को भी तीन प्रतिशत कमीशन दिया गया था। इस घोटाले की सीबीआई जांच हुई और आर.के. जैन और सुनील नंदा को गिरफ्तार किया गया। सालों चले केस की जांच के बाद 24 दिसंबर 2013 को सीबीआई ने यह केस सबूतों की कमी के कारण बंद कर दिया। साथ ही कोर्ट में एक रिपोर्ट दायर किया कि उसे आरोपों पर कोई सबूत नहीं मिला।
ऑगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान VVIPs के लिए भारतीय वायुसेना के MI-8 हेलिकॉप्टर्स का इस्तेमाल होता था। इन हेलिकॉप्टर्स की तकनीक पुरानी हो चुकी थीं, इसलिए वायुसेना ने MI-8 चॉपर बदलने का सुझाव दिया। मार्च, 2002 नये हेलिकॉप्टर खरीदने के लिए दुनियाभर की कंपनियों को बोली लगाने के लिए आमंत्रित किया गया। तब सुरक्षा की दृष्टि से तय किया गया कि ये ऐसे हेलिकॉप्टर हों जो 6 हजार मीटर की ऊंचाई तक उड़ सकें। उस समय 4 वेंडर्स ने इस टेंडर में रुचि दिखाई पर डील नहीं हो सकी।
इसके बाद यूपीए की सरकार के दौरान सितंबर 2006 में नये टेंडर निकाले गये। जिसके लिए तीन कंपनियों- AW-101 (ब्रिटेन), S-92 (अमेरिका) और Mi-172 (रूस) ने आवेदन किया। तब केंद्र सरकार ने एयरफोर्स की सिफारिश पर ऑगस्ता वेस्टलैंड के मॉडल एडब्ल्यू 101 को चुना। 12 हेलिकॉप्टरों की कीमत 556 मिलियन यूरो यानि उस वक्त के ₹3,546 करोड़ में तय हुआ।
ऑगस्ता वेस्टलैंड का हेडक्वॉर्टर ब्रिटेन में है, जबकि इसकी पैरंट कंपनी फिनमैकेनिका का हेडक्वॉर्टर इटली में है। वहीं फरवरी 2012 को इटली की जांच एजेंसियों ने इस डील में दलाली की बात कही। आरोप के तहत भारत के कुछ नेताओं और वायुसेना के कुछ अधिकारियों को ₹360 करोड़ की रिश्वत दी गयी। इस आरोप के खुलासे तक भारत को 3 AW-101 मिल चुके थे।
यह आरोप पूर्व एयर चीफ मार्शल एस.पी. त्यागी पर लगा। कहा गया कि उन्होंने डील के नियम बदले और ऊंचाई की सीमा को घटाकर 6000 मीटर से 4500 मीटर कर दिया। इससे ऑगस्ता वेस्टलैंड को ये सौदा मिल गया। इटली की एजेंसियों ने इस डील में तीन दलालों- क्रिश्चियन मिशेल, गुइदो हाश्के और कार्लो गेरोसा के शामिल होने की बात कही थी। इन दलालों को कंपनी ने कथित तौर पर ₹225 करोड़ दिये थे। इस मामले के सामने आते ही सरकार ने यह सौदा रद्द कर दिया। फिलहाल एस.पी. त्यागी और मिशेल दोनों सीबीआई की गिरफ्त में है और जांच चल रही है।
राफेल जेट खरीद
यूपीए सरकार के दौरान भारत ने 2012 में फ्रांस की दसॉल्ट कंपनी को 126 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के लिए चुना था। इस प्रोजेक्ट के तहत 18 विमान सीधे फ्रांस से खरीदे जाने थे और बाकी 108 भारत में ही सरकारी कंपनी एचएएल के सहयोग से बनाये जाने थे। तब इस करार को एमएमआरसीए यानि मीडियम मल्टी रोल कॉम्बेट एयरक्राफ्ट डील का नाम दिया गया था। लेकिन यह डील नहीं हो पाई थी क्योंकि साल 2007 में जब इस डील की शुरूआत हुई थी तो इसकी कीमत करीब 40 हजार करोड़ थी, जबकि 2014 तक इसका सौदा करीब 80 हजार करोड़ तक पहुंच गया था। कुल मिलाकर कीमत के चलते डील नहीं हो पाई। हालांकि कांग्रेस पार्टी दावा करती है कि उसने 526.1 करोड़ रुपये प्रति राफेल विमान की दर से डील की थी।
साल 2014 में केंद्र में एनडीए की सरकार बनी। प्रधानमंत्री मोदी ने अप्रैल 2015 में फ्रांस यात्रा के दौरान फ्रांस सरकार से इंटर गर्वमेंटल एग्रीमेंट कर सीधे (सिर्फ) 36 राफेल फाइटर जेट खरीदने का ऐलान किया। बाद में दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों ने सितबंर 2016 में इंटर-गर्वेमेंटल एग्रीमेंट के तहत इस सौदे पर करार किया। वैसे आज तक मोदी सरकार ने इन 36 विमानों की डील की पूरी कीमत आधिकारिक तौर से कभी नहीं बताई है लेकिन कांग्रेस और कुछ रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि सौदा करीब ₹59 हजार करोड़ (यानि 7.9 बिलियन यूरो) का है। इस हिसाब से एक जेट की कीमत करीब ₹1500 करोड़ पड़ रही है।
हालांकि, इस मामले पर फ्रांस की एक वेबसाइट द्वारा जुलाई 2021 में भ्रष्टाचार से जुड़े कुछ खुलासे किये थे। जिसमें दावा किया गया था कि राफेल विमान बनाने वाली कंपनी ने यूपीए सरकार के दौरान एक भारतीय बिचौलिये को इस डील को कराने के लिए 1 मिलियन यूरो दिये थे। हालांकि, दसॉल्ट एविएशन ने इस आरोप को खारिज कर दिया और कहा कि अनुबंध को तय करने में कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।
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