China: सीमा पर हमारी तैयारियों को चुनावी चश्मे से देख रहा है चीन
China: भारत और चीन के बीच सीमा विवाद वर्षों से चल रहा है। चीन के किसी भी नापाक इरादे को विफल करने के लिए भारत लगातार अपनी तैयारियों को तेज कर रहा है।
बीजिंग की तमाम आपत्तियों को नजरअंदाज कर मोदी सरकार ना सिर्फ सीमाई क्षेत्रों में लगातार बुनियादी ढांचे को मजबूत कर रही है, बल्कि उनका माकूल जवाब भी दे रही है। इससे तिलमिलाए चीन ने अब यह बयान दिया है कि एनडीए सरकार चुनावी माहौल को उन्मादी बनाने के लिए सीमा पर तनाव बढ़ा रही है।

विदेश मंत्री एस जयशंकर के इस बयान पर कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है और रहेगा, पर प्रतिक्रिया देते हुए चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने 20 मार्च को लिखा कि भारत ने एक बार फिर खतरनाक और खुद को धोखा देने वाला बयान दिया है।
चीन और राष्ट्रवादी भावनाएं
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है - "आगामी चुनावों में "चीन से खतरे का सिद्धांत" मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी के लिए वोट हासिल करने का सबसे बढ़िया जरिया बनने वाला है, क्योंकि राष्ट्रवादी भावनाओं को भड़काने का यह एक आसान उपकरण बन गया है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनेताओं ने घरेलू राजनीतिक लामबंदी के लिए बार-बार चीन-भारत सीमा मुद्दे का राजनीतिकरण किया है, जिसका उद्देश्य चुनाव अभियानों के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों पर खुद के लिए एक सख्त छवि प्रस्तुत करना है।"
उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 मार्च को अरुणाचल प्रदेश का दौरा किया था। अपनी इस यात्रा के दौरान मोदी ने सेला सुरंग और अन्य परियोजनाओं के उद्घाटन समारोह में भाग लिया था। लेकिन चीन ने बिना किसी अधिकार के पीएम मोदी की इस यात्रा पर विरोध वाले बयान जारी किए थे।
भारत का माकूल जवाब
चीन के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता झांग ने अपने बयान में कहा कि भारत से सीमा मुद्दे को जटिल बनाने वाले किसी भी कदम को उठाने से रोकने और सीमावर्ती क्षेत्रों में ईमानदारी से शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए कहा था। लेकिन सेला सुरंग का उद्घाटन सीमा पर स्थिति को सामान्य बनाने के लिए दोनों पक्षों द्वारा किए गए प्रयासों के विपरीत है।
चीनी रक्षा मंत्रालय के इस बेतुके बयान पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने तुरंत पलटवार किया और यह फिर दोहराया कि अरुणाचल प्रदेश सिर्फ भारत का हिस्सा है। प्रवक्ता ने कहा कि इस संबंध में आधारहीन तर्क दोहराने से ऐसे दावों को कोई वैधता नहीं मिलती है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने यह भी स्पष्ट किया हमारे विकास कार्यक्रमों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर काम लगातार जारी रहेगा और यहाँ के लोगों को इसका लाभ मिलता रहेगा।
चीन की धमकी
दोनों परमाणु-सशस्त्र देश लगभग 3,000 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं, लेकिन अधिकांश सीमांकन ठीक से नहीं किया गया है। इस कारण विवाद लगातार बना हुआ है। चीन को इस खबर से भी मिर्च लगी है कि भारत सरकार ने अपनी सीमा को मजबूत करने के लिए 10,000 सैनिकों की एक और टुकड़ी को तैनात करने का निर्णय लिया है।
चीन यह भी आरोप लगा रहा है कि कमांडर स्तर की बैठक के 21वें दौर के लगभग एक महीने बाद ही भारत अपनी प्रतिबद्धताओं से तुरंत मुकर गया और बयानों के विपरीत कार्य किया। सिंघुआ विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय रणनीति संस्थान में अनुसंधान विभाग के निदेशक कियान फेंग के हवाले से ग्लोबल टाइम्स ने कहा है कि भारत की ताजा कार्रवाइयों ने कड़ी मेहनत से हासिल की गई शांति प्रयास को कमजोर कर दिया है। सीमावर्ती क्षेत्रों में ऐसी स्थिति दोनों देशों के बीच टकराव को तेज कर सकती है।
चीन द्वारा उकसावे वाली कार्रवाइयों पर पर्दा डालते हुए ग्लोबल टाइम्स ने सिचुआन इंटरनेशनल स्टडीज यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफेसर लॉन्ग ज़िंगचुन को उद्धृत करते हुए लिखा है कि दरअसल भारत चीन जैसे देश को बाहरी प्रतिद्वंद्वी बनाकर घरेलू एकजुटता को बढ़ावा देना चाहता है। विभिन्न जातियों, भाषाओं और धर्मों वाले देश के रूप में, कई भारतीयों में राष्ट्रीय पहचान की भावना अपेक्षाकृत कमज़ोर है, इसलिए, राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने और एक राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए, भारत बाहरी खतरों, विशेष रूप से पाकिस्तान और चीन को आगे रखकर प्रचार करता है।
ग्लोबल टाइम्स ने आगे लिखा है कि भारत ने इस समय का चयन जानबूझकर किया है। भारत शायद ताइवान जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर में उठे तनाव का फायदा उठाना चाहता है, जबकि दक्षिण चीन सागर या ताइवान जलडमरूमध्य में कोई वास्तविक संघर्ष नहीं हुआ है।
ग्लोबल टाइम्स के जरिए चीन द्वारा यह धमकी भी दी गई है कि अगर भारत सीमा मुद्दे पर जरूरत से ज्यादा उकसाना जारी रखेगा तो यह उसके हितों के लिए नुकसानदेह होगा। चीन को उम्मीद है कि सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए वह भारत के साथ सीमा मुद्दों को बातचीत के जरिए शांतिपूर्वक हल कर लेगा। उसे किसी भी ताकत से डराया या मजबूर नहीं किया जा सकता। चुनाव के मौसम में चीन विरोधी भावना भड़काने के लिए सीमा मुद्दे का कार्ड खेलना एक अवसरवादी मानसिकता है, जिसके कारण भारत अपने राष्ट्रीय हितों को खतरे में डाल सकता है।
अमेरिकी चुनाव प्रभावित कर चुका है चीन
इसमें कोई संदेह नहीं है कि चीन भारत के उत्थान और सामने आने वाली चुनौतियों का आकलन कर रहा है। वह भारत को अपने प्राथमिक खतरे के रूप में भी देख रहा है। खास कर मोदी सरकार के कुछ निर्णयों से बीजिंग काफी असहज भी है। वह अपने सामने भारत को एक बड़े और शक्तिशाली पड़ोसी के रूप में देखना भी नहीं चाहता है।
इसलिए नई दिल्ली हर ताजा हलचल पर नजर रख रही है। चीनियों के मंसूबे को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। भारत में होने वाले इस चुनाव पर भी चीन की नजर है। जिस तरह से भारत मोदी के नेतृत्व में एक ग्लोबल पावर बन रहा है, चीन नहीं चाहेगा कि भारत की यह मजबूती आगे भी बनी रहे। अमेरिका का चुनाव चीन द्वारा प्रभावित करने की खबर पहले आ चुकी है, भारत में भी चीन कुछ ऐसा ही करने का प्रयास कर सकता है।












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