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Independence Day: 52 क्रांतिकारियों को एक साथ दी गई थी फांसी, एक महीने तक पेड़ से लटकते रहे थे शव

भारत आज एक स्वतंत्र राष्ट्र है, लेकिन सन 1947 से पहले तक यहां अंगेजों की हुकूमत थी। देश को स्वतंत्र कराने में हमारे स्वतंत्रता सेनानियों को करीब 200 साल ब्रिटिश शासकों से दो-दो हाथ करने पड़े थे। इस लंबे संघर्ष के दौरान हमारे देश की मिट्टी ने एक से एक नायकों को पैदा किया। इनमे से कइयों के नाम तो लोग जानते है, लेकिन इसी मिटटी में कई ऐसे वीरों ने भी जन्म लिया जिनकी कहानी से लोग अभी भी अंजान हैं।

52 क्रांतिकारियों को एक साथ फांसी
इनमें एक बड़ा नाम है अमर शहीद ठाकुर जोधा सिंह 'अटैया' और उनके 51 साथियों का, जिन्होंने इस देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। बात 28 अप्रैल 1858 की है, जब कर्नल क्रस्टाइज की घुड़सवार सेना द्वारा जोधा सिंह और उनके 51 क्रांतिकारी साथियों को बंदी बना लिया गया था। उसी दिन इन सभी को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर स्थित खजुहा में एक इमली के पेड़ पर फांसी से लटका दिया गया था।

Independence Day 2023 Thakur Jodha Singh and his 51 comrades were hanged in fatehpur by britishers

एक महीने तक लटकते रहे शव
बताया जाता है कि अंग्रेजों ने लोगों को आतंकित करने के लिए सभी शवों को पेड़ से उतारने से मना कर दिया था। साथ ही, चेतावनी दी थी कि यदि ऐसा करने की कोई हिमाकत करेगा तो उसका भी यही अंजाम होगा। जिसके चलते इन सभी क्रांतिकारियों के शव एक महीने से अधिक वक्त तक पेड़ पर ही लटके रहे। इस दौरान सभी शव कंकाल में तब्दील हो गए थे।

Independence Day 2023 Thakur Jodha Singh and his 51 comrades were hanged in fatehpur by britishers

कंकालों का हुआ अंतिम संस्कार
वहीं, इस पेड़ को अब 'बावनी इमली' के नाम से जाना जाता है। स्थानीय लोगों की मानें तो जब इन सभी को फांसी दी गई थी, उसी वक्त से इस पेड़ का विकास थम गया था। बावनी इमली के पास दर्ज ऐतिहासिक दस्तावेज की मानें तो अमर शहीद जोधा सिंह के साथी ठाकुर महाराज सिंह ने अपने 900 क्रांतिकारियों के साथ 3-4 जून 1858 की रात को इनके कंकाल को पेड़ से उतारकर गंगा नदी किनारे स्थित शिवराजपुर घाट पर अंतिम संस्कार किया था।

Independence Day 2023 Thakur Jodha Singh and his 51 comrades were hanged in fatehpur by britishers

आजादी के दीवाने
ठाकुर जोधा सिंह राजपूत जाति से थे, वे उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के अटैया रसूलपुर गांव के निवासी थे। इस गांव की दूरी कानपुर से करीब 80 किलोमीटर है। बताया जाता है कि जोधा सिंह झांसी की रानी लक्ष्मी बाई से काफी प्रभावित थे। साथ ही, उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ 1857 की क्रांति में बढ़कर हिस्सा भी लिया था। इसमें फिरंगियों को मात देने के लिए उन्होंने गोरिल्ला युद्ध का सहारा लिया था।

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