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नहाने को 'पब्लिक एक्ट' कहना हास्यास्पद, दिल्ली HC ने शख्स को ताक-झांक का दोषी ठहराया

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि नहाना एक प्राइवेट एक्ट है। अगर कोई महिला अस्थाई बाथरूम में भी नहाती तो भी उसमें ताकने-झांकना अपराध है। उसे पब्लिक एक्ट नहीं माना जा सकता।

Bathing is a private act, it cannot be considered a public act, Delhi High Court upheld the conviction of the person

दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को एक आदमी को एक नहाती हुई महिला के वॉशरूम में ताक-झांक का दोषी ठहराया है। अदालत ने कहा है कि नहाना निश्चित तौर पर 'प्राइवेट एक्ट' है और इसे 'पब्लिक एक्ट' बताना बेतुका है। अदालत ने अभियुक्त की एक साल की सजा भी बरकरार रखी है, सिर्फ POCSO कानून के आरोपों से राहत दे दी है। मामला 2014 का है। इस मामले में शख्स की ओर से जो दलीलें दी गईं, वह हैरान करने वाली हैं।

ताक-झांक करने पर धारा 354सी के तहत मिली सजा
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि जब महिला स्नान करती थी, तब यौन मंशा से उसके बाथरूम में ताक-झांक करना और उसके खिलाफ अभद्र टिप्पणी या हाव-भाव अभद्र बर्ताव नहीं है, बल्कि यह महिला के निजता का हनन है। भारतीय दंड संहिता की धारा 354सी (ताक-झांक) के तहत यह अपराध बनेगा।

हाई कोर्ट ने एक साल की सजा बरकरार रखा
दिल्ली हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने ताक-झांक के अपराध में उस व्यक्ति की एक साल की सजा बरकरार रखा है, लेकिन POCSO कानून के आरोपों से मुक्त कर दिया है। क्योंकि जब 2014 में यह घटना हुई थी, तब पीड़ित महिला नाबालिग नहीं थी। अदालत ने कहा कि 'इसे (ताक-झांक) को अपराध में शामिल करने का मकसद ही महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध रोकना और उसकी निजता और यौन पवित्रता की रक्षा करना था।'

'ऐसे मामलों से सख्ती से निपटना जाना चाहिए'
जस्टिस शर्मा ने कहा कि 'सभी व्यक्तियों की यौन पवितत्रा का सम्मान करना चाहिए और इसका किसी भी तरह से उल्लंघन होने पर उससे सख्ती से निपटना जाना चाहिए।' कोर्ट के मुताबिक यह इसलिए आवश्यक है कि सभी नागरिक शांतिपूर्ण जीवन का आनंद ले सकें और उन्हें इस बात का मानसिक भरोसा रहे कि उनकी निजता का सम्मान होगा और इस तरह की हरकत अपराध माना जाएगा।

अदालत ने इस आधार पर खारिज की अपील
हाई कोर्ट ने कहा कि शख्स के वकील की ये दलील कि संबंधित मामले में पीड़िता का नहाना 'प्राइवेट एक्ट' के बदले 'पब्लिक एक्ट' हो जाता है, 'टोटली मेरिटलेस' है। अदालत ने कहा कि 'सिर्फ इसलिए कि महिला जिस स्ट्रक्चर को बाथरूम की तरह इस्तेमाल करती थी, उसमें दरवाजा नहीं था, सिर्फ परदे और अस्थाई दीवारें थीं और वह उसके घर के बाहर था, वह पब्लिक प्लेस नहीं हो जाता; और इस वजह से पीड़िता का नहाना 'प्राइवेट एक्ट' की जगह 'पब्लिक एक्ट' हो जाता है, इस दलील को सिरे से खारिज किया जाता है। '

क्या है मामला?
दरअसल, पीड़िता ने शख्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई थी कि जब भी वह नहाती है, वह यौन इरादे से उसे देखता है और घर के बाहर बाथरूम होने की वजह से वह उसमें झांकता है। इसपर उसे दोषी पाया गया और निचली अदालत से सजा मिली, जिसके खिलाफ उसने अपील दर्ज की थी।

दोषी के वकील की अजीब दलील
शख्स के वकील ने दलील दी थी कि पीड़ित जो बाथरूम इस्तेमाल करती थी, वह सार्वजनिक स्थान पर था, इसलिए उसे 'प्राइवेट एरिया' नहीं कहा जा सकता। इसलिए सार्वजनिक स्थल पर नहाना 'प्राइवेट एक्ट' नहीं कहला सकता।

अदालत ने खारिज की सारी दलील
उसने यह भी दलील पेश की कि अगर अदालत ने इसे इस नजरिए से देखा तो वॉटर पार्क, स्वीमिंग पूल, झील, तालाब या नदियों में धार्मिक स्नान के समय मौजूद होने की वजह से हजारों लोगों पर मुकदमा चलाया जा सकता है। लेकिन, अदालत ने ऐसी दलीलों को भी तर्कों के साथ खारिज कर दिया। पहले कि धार्मिक स्नान के दौरान लोग नहाते नहीं हैं, बल्कि पवित्र डुबकी लगाते हैं।

सार्वजनिक स्नान में भी इस स्थिति में लागू होगा निजता का हनन
यही नहीं, जब पीड़िता परदे और दीवारों के बीच नहाती थी तो उसकी यही मंशा थी कि उसे कोई नहीं देखे। अदालत ने यह भी कहा कि अगर महिलाएं सार्वजनिक स्थलों पर भी नहाती हैं तो यही उम्मीद रहेगी कि ऐसी महिलाओं की तस्वीरें और वीडियो नहीं लिए जाएंगे।

कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति मे भी किसी भी व्यक्ति को अधिकार नहीं कि वह उसकी तस्वीरें या वीडियो ले और ऐसा करना भी उसकी निजता का हनन होगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतें सामाजिक वास्तविकताओं को भी नजरअंदाज नहीं कर सकतीं कि गरीबी के कारण पीड़िता के पास अपने घर के अंदर आलीशान बाथरूम नहीं था, बल्कि उसे मजबूरी में अपने घर के बाहर बने अस्थाई बाथरूम में नहाना पड़ता था। (इनपुट- पीटीआई)

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