छत्तीसगढ़ में निभाई जाती है अनोखी आदिवासी परम्परा ,परिजन की मौत के बाद पहाड़ी कोरवा करते हैं यह काम !
सरगुजा, 29 मार्च। आदिवासी बाहुल्य राज्य छत्तीसगढ़ में जनजाति समाज में कई अनोखी परम्पराएं आज भी जीवित हैं। ऐसी ही परंपरा सरगुजा समेत राज्य के अन्य हिस्सों में पाई जानी वाली पहाड़ी कोरवा जनजाति परिवारों में देखने को मिलती है। जब भी इन आदिवासियों के परिवार में किसी की मृत्यु हो जाती है, तो वह उसका अंतिम संस्कार करने के बाद अपने उस घर को छोड़ देते हैं, जिसमें उनके परिजन की मृत्यु हुई थी ।
छत्तीसगढ़ के सरगुजा समेत कई अन्य स्थानों पर पाई जाने वाली पहाड़ी कोरवा जनजाति अपनी अनोखी परम्परा और सादगीपूर्ण जीवन को लेकर शोध का विषय रही है। आइये आदिवासियों की इस जनजाति के सम्बन्ध में कुछ रोचक तथ्य जानने का प्रयास करते हैं।

परिजन की मौत के बाद अपना घर बदल देते हैं पहाड़ी कोरवा
मिली जानकारी के मुताबिक इस अनोखी परम्परा के बारे में पहाड़ी कोरवा जनजाति पर किये गए एक शोध के दौरान पता चला है कि यदि किसी पहाड़ी कोरवा जनजाति के व्यक्ति के घर में किसी की मौत हो जाती है, तो वह परिवार उस घर को छोड़कर नए घर में रहने चला जाता है। जहां आज के समय में कोई अपने जीवनकाल में केवल एक ही घर बना पाता है, वहीं पहाड़ी कोरवा जनजाति अपने जीवनकाल में ना जाने कितने बार अपने घर बदलती है।

जंगलों पर आश्रित होता है जीवन
पहाड़ी कोरवा खुद ही लकड़ी, मिट्टी और पत्थर की मदद से अपना घर तैयार कर लेते हैं। इस जनजाति का खानपान, रहन सहन दुरी जनजातियों से अलग होता है। यह जंगलों से मिलने वाले कंदमूल, फल और अन्य वनस्पतियों को खाकर अपना जीवन बिताते हैं। इन्हे भोजन पकाना या खाना होता है, तो वह खुद के बनाये मिट्टी के बर्तन का ही उपयोग करते हैं।पहाड़ी कोरवा जनजाति का पूरा जीवन प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं पर आश्रित होता है। उन्हें अपने जल,जंगल और जमीन से लगाव होता है। उनकी संस्कृति ,तीज ,त्योहारों में ही कुदरत के रंग छुपे होते हैं।

बाहरी लोगों से मेलजोल नहीं करते पसंद
इस जनजाति के लोग बेहद ही सादगी से जीना पसंद करते हैं। आज भी आधुनिक दौर का असर उनपर नहीं पड़ा है, वह प्रकृति से मिले सीमित संसाधनों में ही अपना जीवन व्यतीत करने पर यकीन करते हैं। देखा जाता है कि पहाड़ी कोरवा जनजाति समय के साथ आधुनिक होती जा रही अन्य जातियों के लोगों से दूरी बनाकर रहना पसंद करते हैं। वह अपनी बस्तियों में बाहरी लोगों के आवागमन को पसंद नहीं करते। सरकार ने इस जनजाति के विकास और उत्थान के लिए कई योजनाएं चला रखी हैं, लेकिन यह आदिवासी अपने परम्परागत जीवन से अलग नहीं होना चाहते।

माने जाते हैं राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र
आदिवासियों की इस जनजाति को राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र के तौर पर मान्यता मिली हुई है। यह छत्तीसगढ़ के सरगुजा, मैनपाट, बलरामपुर, उदयपुर, सीतापुर, लखनपुर और कवर्धा में पाए जाते हैं। पहाड़ी कोरवा जनजाति के मानुस अपने मनोरंजन के लिए और तीज त्यौहारों में पारम्परिक कर्मा नृत्य करते हैं। इस नृत्य को सोदे कर्मा नृत्य कहा जाता है, जिसमें एक डंडे को जमीन में गाड़कर उसमें झाड़ू लगाई जाती है, फिर धनुष और बाण टांगकर आदिवासी नृत्य करते हैं।
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