शराब से लेकर अचार तक बनाने में काम आता है यह फल, महुआ के फायदे जानकर रह जाएंगे दंग !
This fruit is useful in making from liquor to pickles, you will be stunned to know the benefits of Mahuaमहुआ , अचार , शराब , भूपेश बघेल , आदिवासी , जंगल , महुआ फल , आयुर्वेदिक , स्वास्थ्य ,छत्तीसगढ़ , संस्कृति
रायपुर, 28 मार्च। आदिवासी संस्कृति में महुआ बेहद महत्त्व रखता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों में महुआ पेड़, उसका फल सभी किसी ना किसी तौर पर इस्तेमाल किये जाते हैं। आमतौर पर यह धारणा है कि महुआ का उपयोग केवल शराब बनाने के काम ही आता है, लेकिन ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ में महुआ अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और आयुर्वेदिक महत्त्व के लिए जाना जाता है।

आदिवासी जीवन का हिस्सा है महुआ
छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के जीवन में महुआ अलग ही महत्व रखता है। महुआ पेड़ हो, उसका फल, फूल या फिर उसका बीज, ये सभी आदिवासियों के जीवन का हिस्सा हैं। बस्तर, सरगुजा समेत राज्य के सभी आदिवासी इलाकों में ग्रामीण जंगलों से महुआ बीनकर उन्हें सुखाते हैं और बेच देते हैं। आदिवासी परिवारों की आर्थिक स्थिति महुआ पर ही निर्भर है। पुराने तरीकों से महुआ का व्यापार उतना लाभप्रद नहीं था, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार ने महुआ और उससे बने उत्पादों का वैल्यू एडिशन करके उसे अंतराष्ट्रीय बाजार में उतार दिया है। छत्तीसगढ़ सरकार का वन विभाग आम लोगों को भी अब महुआ का अचार, जूस, तेल इत्यादि बाजार में उपलब्ध करा रहा है।

अंतराष्ट्रीय बाजार में मिल रही है अच्छी कीमत
जिस महुआ का उपयोग आम तौर पर आदिवासी क्षेत्रों में शराब बनाने के लिए होता है, वह अब अंतराष्ट्रीय बाजार में अच्छी कीमत पर बिक रहा है। हाल ही में यूके की एक प्राइवेट कंपनी ने छत्तीसगढ़ के वन विभाग से बड़ी तादाद में महुआ खरीदा था। वह महुआ से विभिन्न उत्पाद तैयार करेगी। छत्तीसगढ़ सरकार के मुताबिक राज्य में हर साल लगभग 170 करोड़ रूपए मूल्य के 05 लाख क्विंटल महुआ फूल का संग्रहण किया जाता है। छत्तीसगढ़ का महुआ बेहद ही शानदार गुणवत्ता का माना जाता है, इस वजह से प्रदेश के महुआ की महक अब देश ही नहीं, बल्कि विदेश तक होने लगी है।

महुआ के बिना पूरा नहीं होता कोई उत्सव
महुआ छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों में सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन का आधार है। आदिवासी परिवारों में इसका उपयोग भोजन और पेय के तौर पर किया जाता है। ग्रामीण पारम्परिक बाजारों में इसे बेचकर अपने जीवन की आर्थिक जरूरतें पूरी करते हैं। आदिवासी परिवारों में घर की कोठी में रखा हुआ महुआ संपत्ति की तरह होता है।
आदिवासियों के जीवन में महुआ उनकी आस्थाओं से भी जुड़ा हुआ है। ग्रामीण मानते हैं कि जो फल उनके जीवन को एक आधार देता है, वह उनके देवी-देवताओं को भी प्रिय होता है। बस्तर में आदिवासी देवी देवताओं को महुआ के फूल और पेय अर्पित किये जाते हैं। इतना ही नहीं घर में जन्म, विवाह और मृत्यु से जुड़े संस्कारों में महुआ से बनी शराब और अन्य उत्पाद अनिवार्य तौर पर इस्तेमाल किये जाते हैं। महुआ हर साल फरवरी से जून के बीच झड़ता है, आदिवासी इन फूलों को सुखाकर उनसे जो पेय तैयार करते हैं उसे सबसे पहले घर के देवी-दवताओं को अर्पित करते हैं। शादी के मंडप में भी डाल को गड़ाना एक अनिवार्य रिवाज है, इसके बिना शादी अधूरी मानी जाती है।

महुआ का है आयुर्वेदिक महत्त्व
महुआ आदिवासी जीवन में इतना महत्त्व रखता है, लेकिन एक रोचक तथ्य यह है कि बस्तर में इसके पौधे अपने आप अंकुरित होते हैं, आदिवासी उन्हें रोपते नहीं हैं, बल्कि उन्हें अपने आप उगने देते हैं, जहां महुआ का पौधा निकल आता है, उसे वहीं रहने दिया जाता है। पक्षी महुआ बीज को इधर से उधर ले जाते हैं और जहां छोड़ देते हैं, वहां पेड़ स्थापित हो जाता है। बस्तर की आदिवासी संस्कृति में माना जाता है कि जिसके पास दस महुआ पेड़ होते हैं, वह गांव का संपन्न और प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाता है। महुआ पेड़ की छाल का इस्तेमाल पेट की बीमारियों को दूर करने के लिए होता है, वहीं इसके फल की सब्जी बनाई जाती है। महुआ के फल को टोरा कहा जाता है, इसके बीज को सुखाकर उसका तेल निकाला जाता है। इसका उपयोग खाने के अलावा त्वचा से जुड़े रोगों के उपचार के लिए किया जाता है।












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