OI Explained: क्या है 12 रिजर्व सीटों का विवाद जिसके लिए में PoK में हो रही हिंसा? क्या है पाक के संविधान में?

OI Explained: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में सरकार और एक जमीनी आंदोलन के बीच टकराव अब इंटरनेशलन लेवल पर चर्चा का विषय बन गया है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि इस मुद्दे पर अब ब्रिटिश संसद में भी चर्चा हो रही है। हालिया हिंसा में कम से कम 7 नागरिकों की मौत हो चुकी है, जबकि बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन जारी हैं। ये हालात हाल के सालों में PoK के सबसे गंभीर राजनीतिक और सामाजिक टकरावों में से एक माना जा रहा है। जिसमें आम जनता और पाकिस्तान की पुलिस (जिसको आर्मी का पूरा सपोर्ट है) आमने-सामने हैं। इस पूरे आंदोलन के केंद्र में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) है, जो शुरुआत में आर्थिक मुद्दों को लेकर बने एक जनआंदोलन के रूप में सामने आई थी, लेकिन समय के साथ इसकी मांगें संवैधानिक सुधारों तक पहुंच गईं।

2023 से शुरू हुई चिंगारी कैसे बनी आग?

JAAC का गठन 2023 में बढ़ती महंगाई, बिजली की ऊंची कीमतों और आटे की लागत को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुआ था। शुरुआत में संगठन का फोकस आर्थिक राहत और बुनियादी सुविधाओं पर था, लेकिन बाद में इसने राजनीतिक और संवैधानिक सुधारों की मांग भी उठानी शुरू कर दी। इसी कारण यह आंदोलन अब केवल महंगाई विरोधी अभियान नहीं रह गया, बल्कि PoK की राजनीतिक व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाने लगा है।

12 रिजर्व सीटों को लेकर बढ़ा विवाद

पिछले कई हफ्तों से तनाव बढ़ रहा था क्योंकि JAAC ने 9 जून को बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया था। यह प्रदर्शन PoK विधानसभा की 12 आरक्षित सीटों के खिलाफ था। ये सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं जो 1947 के विभाजन के बाद भारतीय जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान में जाकर बस गए थे। JAAC नेताओं का आरोप है कि इन सीटों के जरिए पाकिस्तान की बड़ी राजनीतिक पार्टियां मुजफ्फराबाद की राजनीति और सरकार गठन पर जरूरत से ज्यादा प्रभाव डालती हैं। संगठन का कहना है कि इससे स्थानीय लोगों की राजनीतिक ताकत कमजोर होती है।

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PoK विधानसभा में 12 आरक्षित सीटें क्या हैं?

PoK की विधानसभा में कुल 45 सदस्य होते हैं। इनमें से 33 सीटें PoK के भीतर के निर्वाचन क्षेत्रों से चुनी जाती हैं। 12 सीटें उन "जम्मू-कश्मीर शरणार्थियों" के लिए आरक्षित हैं, जो 1947 या बाद के संघर्षों के दौरान भारतीय जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान चले गए और अब पाकिस्तान के अलग-अलग प्रांतों में रहते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन 12 सीटों के मतदाता PoK में नहीं रहते, बल्कि पाकिस्तान के पंजाब, खैबर पख्तूनख्वा और अन्य इलाकों में बसे हुए हैं। इन 12 सीटों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाए गए हैं। मतदान पाकिस्तान के मुख्य भूभाग में रहने वाले कश्मीरी शरणार्थी करते हैं।

पाकिस्तान की राजनीति को करीब से जानने वालों का दावा है कि पाकिस्तान की बड़ी पार्टियां जैसे Pakistan Muslim League (N), Pakistan Tehreek-e-Insaf और Pakistan Peoples Party इन सीटों का इस्तेमाल PoK में राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने के लिए करती हैं। क्योंकि इन सीटों के वोटर पाकिस्तान के अंदर रहते हैं, इसलिए वहां की राष्ट्रीय राजनीति का असर सीधे PoK विधानसभा तक पहुंच जाता है।

ब्रिटिश सांसदों ने जताई चिंता

सोमवार को ब्रिटेन की संसद के 50 से ज्यादा सांसदों ने एक ज्वाइंट लैटर पर साइन किए और PoK के हालात पर चिंता व्यक्त की। सांसदों ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में जनता के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कम्युनिकेसन सर्विस पर रोक, इंटरनेट बंद किए जाने और लोगों की आवाजाही, यहां तक की घूमने पर भी लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर चिंता जताई। ब्रिटिश सांसदों ने विशेष रूप से स्थानीय प्रतिनिधित्व और 45 सदस्यीय विधानसभा में राजनीतिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों का भी जिक्र किया।

JAAC पर लगाया गया प्रतिबंध

5 जून को PoK सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए JAAC को आतंकवाद विरोधी कानून 2014 के तहत प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया। इसके साथ ही संगठन के 31 प्रमुख नेताओं और कोर कमेटी सदस्यों को शेड्यूल-I लिस्ट में शामिल कर दिया गया। यह सूची उन लोगों की होती है जिनका नाम प्रतिबंधित संगठनों से जुड़ा माना जाता है। सरकार का कहना था कि JAAC की गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती हैं।

आखिर क्या हैं JAAC की प्रमुख मांगें?

JAAC की सबसे बड़ी मांग 12 आरक्षित विधानसभा सीटों को खत्म करने की है। संगठन का कहना है कि यह व्यवस्था लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित करती है और स्थानीय लोगों की राजनीतिक आवाज को कमजोर करती है। JAAC चाहता है कि 27 जुलाई को होने वाले चुनावों से पहले इस मुद्दे पर संवैधानिक सुधार किए जाएं। संगठन का दावा है कि बिना इन सुधारों के निष्पक्ष राजनीतिक प्रतिनिधित्व संभव नहीं है।

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प्रदर्शन की आढ़ में मनमानी कर रही सरकार

PoK प्रशासन का कहना है कि खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट में संकेत मिले थे कि प्रस्तावित प्रदर्शन हिंसक हो सकते हैं। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक कुछ कार्यकर्ताओं के पास हथियार होने की सूचना थी। प्रशासन का दावा है कि प्रदर्शनकारी सड़कें जाम करने, आर्थिक गतिविधियों को बाधित करने और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की योजना बना रहे थे। हालांकि JAAC ने इन सभी आरोपों से साफ इनकार करते हुए कहा कि वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। नेताओं का आरोप है कि प्रतिबंध लगाकर लोगों की आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है।

इंटरनेट बंद, पर्यटकों को लौटने की सलाह

स्थिति बिगड़ने के बाद प्रशासन ने पूरे PoK में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं। इसके अलावा टूरिस्टों को सलाह दी गई कि वे अपनी यात्रा स्थगित कर दें या क्षेत्र छोड़ दें। स्थानीय पुलिस की मदद के लिए पाकिस्तान फौज को भी बुलाया गया है। इस कदम के बाद क्षेत्र का संपर्क बाहरी दुनिया से काफी हद तक कट गया।

JAAC नेताओं हत्या और गिरफ्तारियां

वीकेंड के दौरान सुरक्षा बलों ने PoK के कई जिलों में JAAC नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ जानबूझकर कार्यवाही की। इसमें शूट एट साइट के ऑर्डर देकर निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाईं जिसमें संगठन के मुताबिक 100 से ज्यादा लोगों की जान चली गई जबकि सरकार इस आंकड़े को 25-30 बता रही है। कई कस्बों और शहरों से गिरफ्तारियों की भी खबरें सामने आईं। प्रशासन ने संगठन के मुख्यालय को भी सील कर दिया। इन कार्रवाइयों के बाद प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच तनाव और बढ़ गया।

रावलाकोट में भड़की हिंसा

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रविवार को रावलाकोट में स्थिति तब बिगड़ गई जब एक व्यापारी को कथित तौर पर पुलिस ने गोली मार दी। घटना के बाद व्यापारी के समर्थक और परिजन बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए। उन्होंने सरकार से कार्रवाई की मांग की और JAAC पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाने की भी मांग की। व्यापारी का शव रावलाकोट के कंबाइंड मिलिट्री हॉस्पिटल में रखा गया था, जिससे लोगों का गुस्सा और बढ़ गया।

पूरे PoK में फैला विरोध

रावलाकोट में हुई झड़पों की खबर फैलने के बाद पूरे PoK में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। मंगलवार तक कई शहरों में बाजार बंद रहे और व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुईं। रावलाकोट के अलावा ट्रारखल, थोरार और बलोच जैसे इलाकों में भी प्रदर्शन हुए। PoK के एक्टिविस्ट और कवि अहमद फरहाद के मुताबिक लोगों ने बड़े मार्च में शामिल होने की अपील की। बाग, मुजफ्फराबाद, हवेली, हजीरा, जंडाला, मीरपुर और कोटली में भी हड़ताल और प्रदर्शन की खबरें सामने आईं।

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पाकिस्तान के भीतर भी उठे सवाल

पूर्व प्रधानमंत्री Imran Khan के कार्यकाल में जवाबदेही मामलों के सलाहकार रहे Mirza Shahzad Akbar ने सरकार की कार्रवाई की आलोचना की। उन्होंने कहा कि सरकार को लोगों के जीवन, अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी इस मामले पर नजर बनाए रखने की अपील की। इसके साथ ही, पाकिस्तानी पत्रकार Raza Ahmad Rumi ने कहा कि ब्रिटिश सांसदों की चिंता दिखाती है कि यह मुद्दा अब इंटरनेशनल लेवल पर उठने लगा है।

फिलहाल PoK में तनाव बना हुआ है, प्रदर्शन जारी हैं और राजनीतिक टकराव खत्म होता नजर नहीं आ रहा। आने वाले दिनों में यह संकट किस दिशा में जाएगा, इस पर पूरे क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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