6 महीने की नौकरी में सर्वोच्च बलिदान! साथी को बचाते हुए कैसे शहीद हुए 23 साल के लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी?

Lieutenant Shashank Tiwari: राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक सम्मान समारोह के दौरान ऐसा भावुक दृश्य देखने को मिला जिसने पूरे देश को भावुक कर दिया। एक मां अपने शहीद बेटे की याद में आंसू रोक नहीं सकी और सम्मान ग्रहण करने के लिए मंच पर पहुंचते ही फूट-फूटकर रो पड़ी। बेटे के बलिदान का दर्द उनकी आंखों में साफ दिखाई दे रहा था। यह दृश्य देखकर राष्ट्रपति भी भावुक हो गईं और उन्होंने तय प्रोटोकॉल से हटकर खुद आगे बढ़कर शहीद के माता-पिता को सम्मान प्रदान किया।

यह सिर्फ एक पुरस्कार समारोह नहीं था, बल्कि एक मां के दर्द, एक सैनिक के सर्वोच्च बलिदान और देश की कृतज्ञता का ऐसा पल था जिसने वहां मौजूद हर व्यक्ति को भावुक कर दिया। जिस वीर बेटे के लिए पूरा देश गर्व महसूस कर रहा था, वह था भारतीय सेना के युवा अधिकारी लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी, जिन्होंने अपने साथी सैनिक की जान बचाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं की और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

Lieutenant Shashank Tiwari

कैसे शहीद हुए शशांक? छह महीने पहले ही बने थे सेना अधिकारी

लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी भारतीय सेना की सिक्किम स्काउट्स यूनिट में तैनात थे। उनका सैन्य सफर अभी शुरू ही हुआ था। उन्हें 14 दिसंबर 2024 को भारतीय सेना में कमीशन मिला था। सेना में शामिल होने के बाद उन्हें नॉर्थ सिक्किम जैसे कठिन और संवेदनशील इलाके में तैनाती मिली, जहां मौसम और भौगोलिक परिस्थितियां अक्सर चुनौतीपूर्ण रहती हैं।

कम समय में ही उन्होंने अपने नेतृत्व, जिम्मेदारी और कर्तव्यनिष्ठा से वरिष्ठ अधिकारियों और साथियों के बीच खास पहचान बना ली थी। किसी ने भी नहीं सोचा था कि सेना में शामिल होने के महज छह महीने बाद ही यह युवा अधिकारी वीरता की ऐसी मिसाल बन जाएगा, जिसे पूरा देश सलाम करेगा।

ऑपरेशनल मिशन पर निकली थी टीम

22 मई 2025 को लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी एक महत्वपूर्ण सैन्य अभियान का नेतृत्व कर रहे थे। उनकी टीम रूट ओपनिंग पेट्रोल के तहत एक टेक्टिकल ऑपरेटिंग बेस (TOB) की ओर बढ़ रही थी। यह बेस भविष्य में सैन्य तैनाती और ऑपरेशनल गतिविधियों के लिए तैयार किया जा रहा था, इसलिए मिशन को काफी अहम माना जा रहा था।

पहाड़ी इलाकों में ऐसे मिशन अक्सर जोखिम भरे होते हैं। रास्ते कठिन होते हैं और प्राकृतिक परिस्थितियां कभी भी चुनौती बन सकती हैं। इसी मिशन के दौरान एक ऐसी घटना हुई जिसने सब कुछ बदल दिया।

लकड़ी के पुल पर हुआ हादसा

सुबह करीब 11 बजे गश्ती दल एक लकड़ी के पुल को पार कर रहा था। इसी दौरान अग्निवीर स्टीफन सुब्बा का संतुलन अचानक बिगड़ गया। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, वह नीचे बह रही तेज धार वाली पहाड़ी धारा में गिर गए। पानी का बहाव बेहद तेज था और स्थिति बेहद गंभीर हो गई। पहाड़ी नदियों में कुछ ही सेकंड में व्यक्ति काफी दूर तक बह सकता है। टीम के सामने अपने साथी की जान बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई।

शशांक ने बिना सोचे-समझे लगा दी जान की बाजी

अपने साथी को संकट में देखकर लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी ने एक पल की भी देरी नहीं की। उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना तुरंत नदी में छलांग लगा दी। उनके पीछे नायक पुकार कटेल भी बचाव कार्य में शामिल हो गए। दोनों जवानों ने कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए अग्निवीर स्टीफन सुब्बा तक पहुंचने में सफलता हासिल की। काफी प्रयास के बाद वे उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने में कामयाब रहे। मिशन का सबसे अहम लक्ष्य पूरा हो चुका था, लेकिन इसी दौरान एक दुखद घटना हो गई।

साथी बच गया, लेकिन शशांक बह गए

अग्निवीर को बचाने के दौरान लेफ्टिनेंट शशांक खुद तेज बहाव की चपेट में आ गए। पानी का प्रवाह इतना तेज था कि वह खुद को संभाल नहीं सके और धारा में बह गए। उनकी टीम ने तुरंत खोज और बचाव अभियान शुरू किया। आसपास के इलाके में लगातार तलाश की गई। काफी प्रयासों के बाद सुबह करीब 11:30 बजे उनका पार्थिव शरीर घटनास्थल से लगभग 800 मीटर दूर मिला। यह खबर मिलते ही पूरी यूनिट में शोक की लहर दौड़ गई।

देश ने बहादुरी को किया सलाम

लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी के इस साहसिक कदम ने पूरे देश को गर्व महसूस कराया। उन्होंने अपने जीवन से यह साबित कर दिया कि भारतीय सेना का एक अधिकारी अपने साथियों की सुरक्षा और अपने कर्तव्य को सबसे ऊपर रखता है। उनकी बहादुरी, नेतृत्व क्षमता और सर्वोच्च बलिदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित करने का फैसला किया। कीर्ति चक्र देश का दूसरा सबसे बड़ा शांतिकालीन वीरता पुरस्कार माना जाता है।

राष्ट्रपति भवन में भावुक कर देने वाला पल

राष्ट्रपति भवन में आयोजित सम्मान समारोह के दौरान लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी के माता-पिता को कीर्ति चक्र प्रदान किया गया। जैसे ही उनकी मां नीता तिवारी मंच पर पहुंचीं, बेटे की याद में उनकी भावनाएं उमड़ पड़ीं। वह राष्ट्रपति के सामने खुद को संभाल नहीं सकीं और फूट-फूटकर रोने लगीं। बेटे की शहादत का दर्द देखकर वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। कुछ क्षणों के लिए पूरा सभागार शांत हो गया।

राष्ट्रपति ने तोड़ा प्रोटोकॉल

मां का दर्द देखकर राष्ट्रपति भी भावुक हो गईं। उन्होंने औपचारिक प्रक्रिया से अलग हटकर खुद आगे बढ़कर शहीद के माता-पिता के पास जाकर उन्हें कीर्ति चक्र सौंपा। राष्ट्रपति का यह कदम वहां मौजूद लोगों के लिए बेहद भावुक करने वाला था। यह दृश्य कैमरों में कैद हुआ और देखते ही देखते पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया।

पीछे छोड़ गए पूरा परिवार

शहीद लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी का जन्म और पालन-पोषण उत्तर प्रदेश के अयोध्या (पहले फैजाबाद ज़िला) में हुआ था। वे खास तौर पर ज़िले के गादोपुर मजहवा गाँव के रहने वाले थे।लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी अपने माता-पिता और एक बहन को पीछे छोड़ गए हैं। परिवार ने एक बेटा खोया है, लेकिन देश ने एक ऐसा वीर सपूत पाया है जिसकी कहानी आने वाले वर्षों तक सुनाई जाती रहेगी।

महज 23 साल की उम्र में उन्होंने जो साहस दिखाया, वह भारतीय सेना की उस भावना का प्रतीक है जिसमें साथियों की जान बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगाने से भी पीछे नहीं हटते। उनका नाम अब उन वीर सैनिकों की सूची में दर्ज हो चुका है जिन्होंने कर्तव्य निभाते हुए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया।

ये भी पढ़ें: कौन थे IAF के इकलौते परमवीर चक्र विजेता शहीद Nirmal Jit Singh Sekhon? आसमान में अकेले चटाई PAK को धूल

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+