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छत्तीसगढ़ में स्थित है गंगा मैय्या का भव्य मंदिर, जिसे अंग्रेज भी नहीं हटा पाए, यहां लगती है भक्तों की भीड़

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बालोद, 28 सितम्बर। छत्तीसगढ़ में माता दुर्गा के अनेक रुपों के कई प्राचीन मंदिर स्थित हैं। जो पहाड़ों गुफाओं और मंदिरों में विराजित है। लेकिन पूरे प्रदेश में गंगा मैय्या का एक मात्र मंदिर बालोद जिले में स्थित है। इस मंदिर की ख्याति छत्तीसगढ़ समेत अन्य राज्यों में फैली है। देश भर में जहां माता शक्ति की उपासना के महापर्व नवरात्रि का मनाया जा रहा है। वहीं बालोद में भी गंगा मैय्या के दर्शन करने भीड़ उमड़ रही है। इस मंदिर में स्थापित गंगा मैय्या के उदगम की कहानी बड़ी रोचक है।

हर साल नवरात्रि पर्व पर उमड़ती है भीड़

हर साल नवरात्रि पर्व पर उमड़ती है भीड़

दरअसल गंगा मैय्या मंदिर की ख्याति दूर दूर तक फैली है। इसलिए यहां साल भर भक्त दर्शन करने पहुंचते हैं। इसके अलावा शारदीय नवरात्र के मौके पर देश भर से भक्त यहां पहुंचते हैं। गंगा मैया शक्तिपीठ में इस बार भक्तों द्वारा 900 मनोकामना ज्योति कलश प्रज्ववलित की गई हैं। यहां आने वाले भक्तों की मान्यता है कि मां गंगा के मंदिर में हर मनोकामना पूरी होती है। अपनी मन्नत पूरी करने के लिए व मनोकामना पूरी होने के बाद मां गंगे के मंदिर में ज्योतिकलश की स्थापना कराते हैं। इसके साथ ही गंगा मैया को सिर के बाल दान करते हैं। मंदिर प्रबंधन समिति के मुंडन के लिए विशेष व्यवस्था करता हैं।

नवरात्रि पर मंदिर में होता है खास आयोजन

नवरात्रि पर मंदिर में होता है खास आयोजन

मंदिर के ट्रस्टी पालक सिंह ठाकुर बताते है कि हर साल शारदीय नवरात्र में मंदिर में खास व्यवस्था की जाती है। इन दौरान मंदिर को पूरी तरह सजाया जाता है। मंदिर में भक्तों के लिए सभी सुविधाएं की जाती है। ज्योति कलश स्थापना से लेकर भक्तों की सुरक्षा, भोजन की व्यवस्था तक खास व्यवस्था की जाती है। इसके अलावा मंदिर ट्रस्ट की ओर से समाज के वरिष्टजनों, दान दाताओं का सम्मान किया जाता है, एवं मंदिर परिसर में भजन, जगराता कार्यक्रम के आयोजन किए जाते हैं। शाम होते ही भक्तों की संख्या में काफी इजाफा होता है। नवरात्रि पर हर दिन हजारों भक्तों की भीड़ रहती है।

बालोद के मालगुजार ने करवाया भव्य मंदिर का निर्माण

बालोद के मालगुजार ने करवाया भव्य मंदिर का निर्माण

बालोद में झलमला मंदिर पहले झोपड़ी नुमा था जिसे बालोद के मालगुजार सोहन लाल टावरी ने इसका निर्माण कराया, तब से आज तक यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। यहां पहुंचने के लिए रायपुर य्या दुर्ग से बस और ट्रेन दोनों सुविधा उपलब्ध है। इसके साथ ही सड़क मार्ग से भी आप पहुंच सकते हैं।

पशुओं के व्यापार का प्रमुख केंद्र था झलमला

पशुओं के व्यापार का प्रमुख केंद्र था झलमला

आज से 150 साल पहले जब झलमला में केवल 100 लोगो की आबादी थी तब सोमवार को बड़ा साप्ताहिक बाजार लगता था। बाजार में दूर-दराज से पशुओं के साथ बंजारे आया करते थे। पशुओं की संख्या अधिक होने के कारण पानी की कमी महसूस होने लगी थी। पानी की कमी को दूर करने के लिए बांधा तालाब की खुदाई कराई गई। इसी तालाब से गंगा मैया का उदगम माना जाता है।

मूर्ति के उदगम को लेकर प्रचलित हैं कई किवदंतियां

मूर्ति के उदगम को लेकर प्रचलित हैं कई किवदंतियां

झलमला में नहर किनारे मां गंगा मैया के अवतरण की कहानी लगभग 133 साल पुरानी है। 60 साल तक पहले तक यह मंदिर एक छोटी सी झोपड़ी में था। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंदिर के व्यवस्थापक सोहन लाल टावरी ने बताया कि इस मंदिर का इतिहास 133 साल पुराना है, उन्होंने बताया कि एक दिन ग्राम सिवनी का एक केंवट मछली पकड़ने इस तालाब में गया था। केंवट के द्वारा तालाब में जाल फेंकने पर मछली की जगह गंगा मैय्या की प्रतिमा बार बार जाल में फंस जाती थी। जिसे केंवट हर बार जाल से निकालकर साधारण पत्थर समझ कर फिर से तालाब में फेंक देता था। कई बार यह घटना होने से परेशान होकर केंवट जाल लेकर घर चला गया।

फिर स्वप्न में केंवट को मिला आदेश

फिर स्वप्न में केंवट को मिला आदेश

मंदिर के व्यवस्थापक बताते हैं कि इस घटने के दूसरे दिन सिवनी के गोंड जाति के बैगा को स्वप्न में माता ने दर्शन दिया और प्रतिमा को बाहर निकलकर प्राण प्रतिष्ठा कराने के आदेश दिया। यह बात बैग ने गांव के मुखिया को बताई। स्वप्न की सत्यता को जानने के लिए तत्कालीन मालगुजार छवि प्रसाद तिवारी, बैगा, केंवट और अन्य प्रमुखों को साथ लेकर तालाब पहंचे। केंवट के फिर से जाल फेंकने पर फिर से मूर्ति की आकृति का पत्थर जाल नें फंस गया। जिसके बाद प्रतिमा को बाहर निकाला गया। और फिर विधि विधान से मालगुजार छवि प्रसाद ने प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा करवाई. जल से प्रतिमा निकली होने के कारण गंगा मैय्या के नाम से विख्यात हुई।

एडम स्मिथ समेत कई अंग्रेजों की हो गई थी मौत

एडम स्मिथ समेत कई अंग्रेजों की हो गई थी मौत

लगभग 133 साल पहले जीवन दायिनी तांदुला नदी पर नहर का निर्माण चल रहा था. उस समय झलमला की आबादी मात्र 100 थी। बताया जाता है कि तांदुला नहर निर्माण के दौरान गंगा मैया की प्रतिमा को हटाने का अंग्रेजों ने बहुत प्रयास किया. मगर एडम स्मिथ सहित अन्य अंग्रेजों की मौत हो गई।

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English summary
The grand temple of Ganga Maiyya is located in Chhattisgarh, which even the British could not remove, there is a crowd of devotees here
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