चौथे साल में मोदी सरकार ने बैंकों को क्यों दिए 2 लाख करोड़, पढ़िए पीछे की पूरी कहानी
नई दिल्ली। लंबे समय से एनपीए की दिक्कत से जूझ रहे बैंकों को इस समस्या से उबारने के लिए मोदी सरकार ने आखिरकार अपनी सरकार के चौथे वर्ष में बड़ा फैसला लेते हुए उन्हें इस दलदल से उबारने का निर्णय लिया और बैंकों को 2.11 लाख करोड़ रुपए की मदद देने का ऐलान किया। पिछले दो वर्षों में अगर मोदी सरकार की आर्थिक नीति पर नजर डालें तो इसे बेहतर करने के लिए कई प्रयास किए गए जिसमे पिछले वर्ष नोटबंदी का फैसला, इस वर्ष सरकार ने जीएसटी को लागू किया। दोनों ही फैसलों के चलते लोगों को तत्कालीन स्थिति में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा और यह काफी पीड़ादायक भी साबित हुआ, हालांकि इसके दूरगामी परिणाम के लिए अभी भी इंतजार करना होगा। लेकिन इन दो फैसलों को लेकर मोदी सरकार की जमकर आलोचना हुई और विपक्षी दलों ने हमला बोलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। तमाम कोशिशों के बाद आखिरकार मोदी सरकार ने सीधा और आसान तरीका अपनाया जोकि काफी कारगर और बेहतर साबित हो सकता है। सार्वजनिक सेक्टर के बैंकों को मोदी सरकार ने पूंजी देने का ऐलान किया, जिससे कि बैंक एक बार फिर से क्रेडिट के प्रवाह को आगे बढ़ा सके, मौजूदा समय में देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए बैंकों को पूंजी देने का फैसला सरकार के लिए काफी जरूरी था। सरकार के इस फैसले का बाजार ने जोरदार स्वागत किया और शेयर बाजार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। लेकिन बैंकों का फिर से पूंजीकरण करने के सरकार के फैसले को समझने के लिए हमे बैंक की पूंजी के कुछ मूलभूत मापदंड को समझना होगा।
इस क्रम में आपका इन शब्दों से पाला पड़ेगा, जिसे लेख में आगे विस्तार से समझाया गया
1- बैंक कैपिटल
2- इक्विटी
3- बॉड
4- कैपिटल एडीक्वेसी
5- एनपीए
6- स्ट्रेस एडवांसेज

आखिर क्यों मुश्किल में हैं बैंक?
नियमों के अनुसार बैंक कैपिटल के अनुपात में ही संपत्ति धारण कर सकते हैं, कैपिटल जोकि एक इक्विटि होती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इक्विटी क्या होती है, इक्विटी यानि बॉड जिसकी एक निश्चित कीमत होती है, जैसे कि करेंसी, लोन आदि। इसे और सरल भाषा में अगर आपको समझाते हैं, जैसे कि अगर बैंक 10,000 रुपए के नोट जारी करता है तो इस कागज की मुद्रा के समर्थन में बैंक के पास उसी कीमत की पूंजी होती है जोकि सोना, लोन पेपर, उधार देने के पेपर आदि। ऐसे में हर बैंक को एक निश्चित राशि को हमेशा अपने खाते में सुरक्षित रखना होता है, इसे कैपिटल एडीक्वेसी या पूंजी पर्याप्तता कहा जाता है। लिहाजा बैंक के पास जितनी अधिक पूंजी होगी उसपर उतने ही नरम नियम होंगे और उसे उतनी ही अधिक आजादी लोगों को लोन देने के लिए मिलेगी। लेकिन अगर बैंकों के पास पूंजी यानि कैपिटल की कमी होगी उतनी ही बैंक को लोगों को लोन देने में मुश्किल होगी। ऐसे में अगर बैंकों के पास अगर तय न्यूनतम सीमा से कम कैपिटल होगा तो उन्हें लोन देने में मुश्किल होगी, नियामक संस्था की पाबंदी का पालन करना होगा।

क्या है एनपीए और कब बना यह मुसीबत?
लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि आखिर बैंक इस स्थिति में कैसे पहुंच जाते हैं कि उनके कैपिटल में न्यूनतम सीमा से कम पैसा कैसे हो जाता है। दरअसल जब बैंक गलत लोगों को लोन देती है और ये लोग लोन वापस नहीं करते हैं तो यह एनपीए बन जाता है, जिससे निपटने के लिए बैंकों को इस संभावित नुकसान से निपटने के लिए इंतजाम करना पड़ता है, इसी वजह से बैंक की कैपिटल में कमी आती है और वह लोन देने से पीछे हटने लगती है। सार्वजनिक उपक्रम के बैंक इस एनपीए की समस्या से 2012-13 से जूझ रहे हैं।

कैसे साल दर साल बैंकों की हालत खराब हुई?
स्ट्रेस्ड एडवांसेस यानि जो लोन का पैसा काम में नहीं लाया जा सकता है और जो लोन दिया गया है और वह काम में आ रहा है वह 2012-13 में 10 फीसदी तक पहुंच चुका था। लेकिन एनपीए की समस्या से जकड़े बैंकों का 2016-17 में स्ट्रेस्ड एडवांस 15 फीसदी पहुंच गया। इसके चलते सार्वजनिक उपक्रम के बैंकों की पूंजी में लगातार गिरावट आनी शुरू हो गई। बैंकों को कम से कम 10.5 फीसदी कैपिटल को हमेशा बनाए रखना होता है। औसत आंकड़े पर नजर डालें तो सार्वजनिक उपक्रम के 20 बैंकों में से 10 बैंकों के पास न्यूनतम कैपिटल 1 फीसदी तक पहुंच चुका है, या उससे भी कम है। बैंकों के पास लगातार कम हो रहे कैपिटल की वजह से इनपर लगातार कर्ज का बोझ बढ़ता गया, इसी के चलते पिछले तीन वर्षों में विकास दर में कमी दहाई के अंक तक पहुंच गई। 2009-10 और 2014-15 के वार्षिक ऋण बढ़ोत्तरी पर नजर डालें तो यह 15-20 फीसदी थी। इंडिया शाइनिंग के दौर यानि 2004-09 में यह 20 फीसदी तक पहुंच गई थी।

सिर्फ बैंकों पर नहीं फोड़ा जा सकता है ठीकरा
कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऋण की मांग में गिरावट की वजह गलत लोगों को लोन दिया जाना है। उनका कहना है कि उद्योग जगत पर सीमा से अधिक कर्ज है, जिसके चलते वह किस भी तरह के आर्थिक निवेश की स्थिति में नहीं हैं। लेकिन 2015 में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार 4000 कंपनियों का अध्ययन किया गया, जिसमे यह बात निकलकर सामने आई कि 2008-09 में इक्विटी के बदले लोन में गिरावट 0.8 फीसदी रही और यह 2012-13 तक बरकरार रही। इस दौर में निवेश के लिए पैसों की मांग में कमी आई लेकिन कार्यशील पूंजी की मांग लगातार बरकरार रही। जीएसटी के आने के बाद छोटे व्यापार के लिए पैसों की मांग बढ़ी। लोन में कम वृद्धि सार्वजनिक बैंकों तक सीमित रही, जबकि प्राइवेट बैंकों में इस वर्ष 15 फीसदी लोन में बढ़ोत्तरी हुई है।

कैसे हुई मोदी सरकार से भारी चूक
बैंकों की मूलभूत दिक्कत को समझने के बाद आइए समझते हैं कि कैसे मोदी सरकार ने इस मुसीबत से जानबूझकर निपटने में देरी की। मोदी सरकार इस बात को जानती थी कि बैंकों को लोन देने में दिक्कत है, उसे पता था कि बैंकों के पास लोन देने के लिए कैपिटल की कमी है। जब मोदी सरकार ने सत्ता संभाली तो स्ट्रेस्ड एडवांसेस 10 फीसदी था, लिहाजा मोदी सरकार को सत्ता में आते ही बैंकों को इस मुसीबत से निकालने के लिए तेजी से कदम उठाने चाहिए थे। लेकिन बैंकों को इस मुसीबत से बाहर निकालने की बजाए मोदी सरकार ने इस मुसीबत से मुंह फेर लिया। बाजार अनुमान के अनुसार बैंकों को अगले चार सालों में दो लाख करोड़ रुपए की जरूरत थी, वर्ष 2015 में सरकार ने इंद्रधनुष योजना के तहत बैंकों को 70,000 करोड़ रुपए ही देने का फैसला लिया।

आर्थिक सर्वे ने खोली मोदी सरकार की आंखें
दरअसल मोदी सरकार जब सत्ता में आई तो उसे लगता था कि बैंक ही बड़े पैमाने पर गड़बड़ी कर रहे हैं, लिहाजा बैंकों और पैसा देना यानि उसे बर्बाद करना होगा। लिहाजा सरकार यह चाहती थी कि बैंकों को सुदृढ किया जाए, या फिर इसके शेयर को प्राइवेट निवेशकों को बेचा जाए। लेकिन सरकार की यह सोच सही साबित नहीं हुई। गलत लोगों को लोन देना बैंकों की एकमात्र समस्या नहीं थी और यह बात 2016-17 के आर्थिक सर्वे में भी साफ हो गई थी, जिसमें यह साफ तौर पर कहा गया था कि कि बड़ी मात्रा में एनपीए की समस्या के लिए सिर्फ बैंक जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक बैंक प्राइवेट बैंकों, इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थव्यवस्था से जुड़े अन्य क्षेत्रों के लिए भारी मात्रा में कर्ज दे रहे थे।

ये है मुसीबत की जड़
जिस तरह से वर्ष 2007 में वैश्विक मंदी आई, उस दौर में बैंकों ने इससे निपटने में अहम भूमिका निभाई, ऐसे में बैंकों पर एनपीए की समस्या का पूरा ठीकरा फोड़ना कतई जायज नहीं है। इस मंदी के दौर में जिस तरह से बैंकों ने बड़ी भूमिका निभाई उसके बाद बैंकों को तुरंत सशक्त करने के कदम नहीं उठाए जाने से देश की अर्थव्यस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़े। इसकी वजह से कई बड़ी समस्या निकलकर सामने आई जिसमे पहली थी लोन देने से बैंक परहेज करने लगे, दूसरा एनपीए की समस्या का स्थाई समाधान नहीं होने की वजह से कई बड़े प्रोजेक्ट पर ब्रेक लग गया, बैंक इन प्रोजेक्ट्स के लिए और पैसा देने की स्थिति में नहीं थे, जबकि तीसरी असर यह पड़ा कि उद्योगपति कर्ज में डूब गए और नया लोन लेने की स्थिति में नहीं थे।

क्यों निजीकरण नहीं है समस्या का हल?
कई विश्लेषकों का मानना है कि बैंकों की इन तमाम समस्याओं से बाहर निकाला जा सकता है, अगर उनका निजीकरण कर दिया जाए। लेकिन अगर वैश्विक स्तर पर नजर डालें तो बड़ी संख्या में बैंक प्राइवेट सेक्टर के हाथों में हैं, लेकिन बावजूद इसके बैंकों को विफलता का सामना करना पड़ता है। अंतर्रराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 1970 से 2011 तक दुनिया के 115 अर्थव्यवस्थाओं में 140 बैंकिंग संकट की बात को स्वीकार किया है। इन बैंकों को फिर से कैपिटल देने में जीडीपी का 6.8 फीसदी तक खर्ज करना पड़ा है। वहीं अगर भारत के बैंकों पर नजर डालें तो गत 20 वर्ष में बैंकों को फिर से पुंजी देने में जीडीपी का सिर्फ 1 फीसदी या उससे भी कम खर्च करना पड़ा है। ऐसे में इन तमाम मुश्किल चुनौतियों से गुजर रहे बैंकिंग सिस्टम को राहत देने के लिए मोदी सरकार ने हिम्मत दिखाते हुए बैंकों को 2.11 लाख करोड़ रुपए की राहत देने का बड़ा फैसला लिया है। यह फैसला उस सोच के भी खिलाफ है जो हर समस्या का समाधान निजीकरण में ढंढ़ती है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने भी सरकार के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा था कि बैंकों को आर्थिक मंदी से बाहर निकालने का यह फैसला काफी महत्वपूर्ण है।












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