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Bihar Politics: 7 दिन के ‘CM’ से Nitish कैसे बने बिहार की सियासत के ‘King’, अटल और आडवाणी से हुई थी बड़ी भूल!

Nitish Kumar Journey Of CM To King Of Bihar Politics: बिहार में चुनाव के मद्देनज़र सियासी बाज़ार सज चुका है, वहीं राजनीतिक समीकरणों पर भी चर्चा तेज़ है। इसी क्रम में सीएम नीतीश कुमार की पलटी भी चर्चा का विषय बनी रहती है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि कैसे 7 दिन के सीएम से नीतीश कुमार बिहार की सियासत के किंग बन गए।

सियासी गलियारों में लोग इसे अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी की बड़ी भूल भी कहते हैं। उनका मानना है कि अगर उस वक्त भाजपा ने नीतीश कुमार को सीएम नहीं बनाया होता तो आज बिहार में भाजपा जदयू की जगह सियासत का रुख मोड़ने की हैसियत रखती। बहरहाल आइए जानते हैं नीतीश कुमार कैसे इस मुकाम तक पहुंचे।

Nitish Kumar

प्रमुख नेता के रूप में उभरे नीतीश: पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने एनडीए के भीतर नीतीश कुमार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके फैसलों ने बिहार के राजनीतिक परिदृश्य को काफी प्रभावित किया, जिससे नीतीश एक प्रमुख नेता के रूप में उभरे।

2000 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान चारा घोटाले के कारण लालू यादव ने सीएम पद छोड़ दिया था और राबड़ी देवी ने पदभार संभाला था। उस समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार थी। बिहार में सुशील कुमार मोदी बीजेपी का मुख्य चेहरा थे। बिहार और झारखंड का बंटवारा नहीं हुआ था, राज्य में 324 विधानसभा सीटें थीं।

नीतीश कुमार का राजनीतिक उत्थान: नीतीश कुमार समता पार्टी का हिस्सा थे और बिहार के सीएम उम्मीदवार के रूप में पेश किए जाने की ख्वाहिश रखते थे। हालांकि, जनता दल और लोक शक्ति के रामविलास पासवान भी इस पद के लिए इच्छुक थे। 1999 के लोकसभा चुनावों के दौरान इन पार्टियों ने भाजपा के साथ गठबंधन किया और साथ मिलकर महत्वपूर्ण जीत हासिल की।

2000 के विधानसभा चुनाव के नतीजे उम्मीदों से परे रहे। सीट बंटवारे के विवाद में नीतीश की समता पार्टी ने अपने सहयोगियों को छोड़ दिया और स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा। आरजेडी ने 124 सीटें जीतीं, जबकि बीजेपी ने 67 और समता पार्टी ने 34 सीटें जीतीं। कांग्रेस ने 23 सीटें, जनता दल ने 21 और जेएमएम ने 12 सीटें हासिल कीं।

अटल-आडवाणी का रणनीतिक निर्णय: चुनाव के बाद किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, एनडीए के पास 151 विधायक थे जबकि लालू यादव के पास 159 विधायक थे। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने नीतीश कुमार को सीएम बनाने का फैसला किया, जबकि बीजेपी के पास ज़्यादा सीटें थीं। नीतीश ने बहुमत साबित किए बिना सात दिन बाद इस्तीफ़ा दे दिया।

यह फैसला नीतीश कुमार के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। सीएम के तौर पर उनके संक्षिप्त कार्यकाल ने उनकी राजनीतिक हैसियत को काफी हद तक बढ़ा दिया। 2005 के चुनावों तक बिहार दो राज्यों में बंट चुका था, जिससे विधानसभा की सीटें घटकर 243 रह गईं। नीतीश कुमार के नाम के साथ पूर्व सीएम की उपाधि जुड़ी।

बिहार की राजनीति में बदलाव: 2005 में समता पार्टी का जेडीयू में विलय हो गया और वह बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। जेडीयू ने 139 सीटों पर चुनाव लड़ा और 88 पर जीत हासिल की, जबकि बीजेपी ने 102 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन सिर्फ़ 55 पर जीत हासिल की। इस दौर में बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का दबदबा बढ़ता गया।

2010 के चुनावों में राजनीतिक गतिशीलता और भी बदल गई जब जेडीयू ने 141 सीटों में से 120 सीटें जीत लीं, जबकि बीजेपी सिर्फ़ 50 सीटों पर सिमट गई। इससे बिहार में बीजेपी के सहयोगी के तौर पर नीतीश कुमार का नेतृत्व और मजबूत हुआ।

नरेन्द्र मोदी के प्रवेश का प्रभाव: 2014 में नरेंद्र मोदी के केंद्रीय राजनीति में प्रवेश ने बिहार के राजनीतिक परिदृश्य को फिर से बदल दिया। हालांकि यह कहानी किसी और समय के लिए है, लेकिन यह स्पष्ट है कि अटल-आडवाणी ने अपनी पार्टी की कीमत पर नीतीश कुमार के करियर को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

फिलहाल बीजेपी बिहार में नीतीश कुमार पर निर्भर रहने के बजाय खुद का नेतृत्व चाहती है। राज्य में वह जेडीयू से ज्यादा प्रभावी हो गई है। 2025 के चुनाव नतीजों के बाद बीजेपी क्या रणनीति अपनाएगी, यह देखना बाकी है।

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