Muzzaffarpur News प्रदेश भर में थी कुढ़नी के बांसुरी की डिमांड, विदेशी भी थे मुरीद, अब गुमनाम हो रही शोहरत
Muzaffarpur Flute: एक वक्त था जब मुजफ़्फ़रपुर जिले की बनी बांसूरी की विदेशों तक में डिमांड थी, लेकिन आज यह शोहरत गुमनाम हो रही है। जिला के मुर्गिया चक के 15 परिवार पीढ़ियों से बांसूरी बनाने का काम करते आ रहे हैं। आज की तारीख़ में इन परिवारों की चौथी पीढ़ी भी बांसुरी बनाने के काम से जुड़ी हुई है। इनकी बांसूरी की पूरे प्रदेश में अच्छी डिमांड थी। अब यह परिवार सरकार से मदद चाहते हैं ताकि वह अपने हुनर को बड़ै पैमाने पर पंख दे सकें।
मुर्गिया चक गांव के रहने वाले नूर मोहम्मद ने बताया कि वह 10 साल की उम्र से ही बांसुरी बनाने का काम करते आ रहे हैं। पहले मेला और त्योहारों पर बांसूरी की खूब बिक्री होती थी, लेकिन अब मोबाइल की वजह से उनके रोज़गार प्रभावित हो रहे हैं। बच्चे बांसूरी नहीं मोबाइल में वक्त बिताते हैं। यही वजह है कि बांसूरी की बिक्री में कमी आई है।

नूरमोहम्मद ने कहा कि पहले जब वह बांसूरी बेचने निकला करते थे, तो बांसूरी की तान सुनकर लोग काफी आकर्षित होते थे। तान सुनकर खुश होकर इनाम भी देते थे, लेकिन अब गांव की गलियों से लेकर शहर की सड़कों तक में बांसूरी के खरीदार नहीं मिलते हैं।
बांसुरी बनाने के लिए नरकट का इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए गांव के लोग नरकट की खेती करते हैं। ज़रूरत पड़ने पर दूसरे जिले से भी नरकट खरीदते हैं। बांसूरी बनाने वाले शबीब ने बताया कि 1 रुपये में एक नरकट खरीदते हैं। 1 बांसूरी बनाने में पांच रुपये तक ख़र्च आता है। दिन भर में 110 के करीब बांसूरी बना लेते हैं। इसी को बेचकर परिवार का गुज़ारा होता है।
बांसुरी बनाने के कारोबार से जुड़े लोगों ने कहा कि हमें अपने हुनर को बचाए रखने लिए सरकार की तरफ़ किसी प्रकार की कोई मदद नहीं मिल रही है। अगर सरकार की तरफ़ से इसे कुटीर उद्योग के तौर पर अनुदान मिले काफी राहत मिल सकती है।












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