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Lalu Yadav पार्टी में परिवार को ही क्यों बनाए रखना चाहते हैं सर्वेसर्वा, पुत्रमोह या विश्वासघात किसका डर?

Lalu Yadav Family Politics: लालू प्रसाद यादव खुद भले ही छात्र राजनीति से आए हैं, लेकिन पार्टी में अहम पद देना हो या सत्ता सौंपना, वह अपने परिवार को ही प्राथमिकता देते हैं। एनसीपी और डीएमके जैसी पार्टियों में परिवारवाद के कुनबे का भी विस्तार नजर आता है। शरद पवार ने अपनी छत्रछाया में बेटी सुप्रिया सुले के साथ भतीजे अजित पवार को भी ट्रेंड किया। दिवंगत मुलायम सिंह यादव ने बेटे अखिलेश यादव के साथ अपनी पार्टी में भाई-भतीजों को भी जगह दी थी।

इस मामले में बड़ी जिम्मेदारियों और पद देने के लिहाज से लालू का परिवारवाद पत्नी और बेटे-बेटियों तक ही सीमित है। वंशवादी राजनीति को बढ़ाने के आरोपों पर वह कभी सफाई नहीं देते हैं और न ही प्रतीकात्मक तौर पर ही कोई बदलाव का आश्वासन देते हैं। सोमवार को पार्टी कार्यालय में उन्होंने आरजेडी अध्यक्ष पद के लिए फिर एक बार पर्चा भरा है।

Lalu Yadav Family Politics

Lalu Yadav का परिवारवाद बाकी पार्टियों से अलग?

परिवारवाद और एक परिवार की पार्टी के आरोपों को नकारने के लिए कांग्रेस ने प्रतीकात्मक तौर पर ही सही, लेकिन गांधी परिवार से बाहर मल्लिकार्जुन खरगे को अध्यक्ष बनाया है। दूसरी ओर लालू यादव स्पष्ट हैं कि वही आरजेडी के मुखिया हैं और उनके बाद पार्टी में नंबर दो की पोजिशन तेजस्वी यादव की है। परिवारवाद के आरोपों को खारिज करने के बजाय आरजेडी सुप्रीमो इसे अपने ढाल के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। समझें इसके पीछे उनकी क्या रणनीति है।

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Lalu Yadav झेल चुके हैं विश्वासघात का आघात

किसी भी पार्टी के गठन के बाद उसमें कुछ नेताओं के आने-जाने का सिलसिला लगा ही रहता है। हालांकि, 90 और 2000 के दशक में भी लालू ने पार्टी को बिखरने की हद तक जाते देखा था। छात्र राजनीति के दौर से उनके भरोसेमंद साथी रहे नेताओं ने एक-एक कर अलग राह पकड़ ली थी। इसमें रामविलास पासवान, नीतीश कुमार, और शरद यादव जैसे नेताओं का नाम है।

1997 में चारा घोटाला के आरोपों के बाद लालू को जब पद छोड़ना पड़ा था, तो उन्होंने किसी और के बजाय मुख्यमंत्री की कुर्सी पर राबड़ी देवी को बिठाया। लालू परिवार का मानना है कि परिवार के सदस्यों को पद दिए जाने पर पार्टी के अंदर गुटबाजी और निजी महत्वाकांक्षाओं के लिए जोड़-तोड़ की तरकीबों को रोका जा सकता है। लालू ने अपने साले साधु यादव और सुभाष यादव को भी बड़े पद दिए, लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा और अनुशासनहीनता की वजह से किनारे भी लगाया। इसी तरह से पप्पू यादव को भी किनारे लगाने में उन्होंने देरी नहीं की।

भावनात्मक और जातीय समीकरण अहम कारण

लालू यादव के "MY समीकरण" (Muslim-Yadav) को टिकाए रखने में भावनात्मक अपील की ज़रूरत है। इस जरूरत को लालू बखूबी समझते हैं। आज भी लालू बिहार में यादवों और मुस्लिम समुदाय के बीच सर्वमान्य नेता हैं। उन्हें जो स्वाभाविक विश्वास और समर्थन है वह किसी दूसरे नेता को कमाने में शायद दशकों लगे। यही वजह है कि वह पार्टी पर नियंत्रण के साथ अपने वोट बैंक को एकजुट रखने के लिए परिवार के बाहर किसी को अपनी राजनीतिक विरासत नहीं सौंप रहे हैं।

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परिवार के प्रमुख सदस्य जो बड़े पदों पर हैं:

तेजस्वी यादव: RJD के कार्यकारी अध्यक्ष, बिहार के उपमुख्यमंत्री रहे अभी नेता विपक्ष।

तेज प्रताप यादव: मंत्री रह चुके हैं, पार्टी और परिवार से 6 साल के लिए बेदखल हैं।

मीसा भारती: लोकसभा सांसद, पहले राज्यसभा सांसद रह चुकी हैं।

राबड़ी देवी: पूर्व मुख्यमंत्री, अब विधान परिषद सदस्य।

रोहिणी आचार्य: सोशल मीडिया पर पार्टी का कामकाज देखती हैं, सारण से टिकट मिला था।

परिवार और पार्टी में रखना चाहते हैं शक्ति संतुलन

लालू यादव की कोशिश है कि दूसरे राजनीतिक परिवारों की तरह उनके परिवार में सत्ता के लिए संघर्ष न हो। परिवार और पार्टी को एकजुट बनाए रखने के लिए लालू ने अपने सक्रिय रहते हुए ही तेजस्वी यादव को अगली पीढ़ी के नेतृत्वकर्ता के तौर पर पेश किया, ताकि बाद में गतिरोध की स्थिति न बने। इसके अलावा, घर के अंदर भी किसी तरह का संघर्ष न हो इसका भी ध्यान रखा है। अनुष्का यादव के साथ तस्वीरें वायरल होने के बाद भले ही बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को पार्टी से निकाला हो, लेकिन उन्हें भी विधायक बनाने से लेकर बिहार में मंत्री पद देकर संतुष्ट किया था।

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इसी तरह से पहले मीसा भारती को राज्यसभा भेजा और दो बार लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी उन्होंने उन्हें तीसरी बार टिकट दिया। रोहिणी आचार्य को भी लालू ने टिकट दिया, लेकिन चुनाव नहीं जीत सकीं। हालांकि, रोहिणी अब सोशल मीडिया सेल संभालती हैं और पार्टी सूत्रों की मानें, तो वह सोशल मीडिया पर पार्टी की छवि बदलने के लिए अपनी कोर टीम के साथ काम कर रही हैं।

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