बिहार का वो गांव जहां हर घर से निकलता है कई IITians, पटवा टोली यूं ही नहीं बना टॉपर्स की खान
Bihar Engineers Hub Village: जब बात इंजीनियरिंग में सफलता की आती है, तो जेहन में कोटा या देश के बड़े कोचिंग हब आते हैं। लेकिन बिहार के एक छोटे से गांव ने पिछले कुछ वर्षों से देश को यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती।
गया जिले के मानपुर प्रखंड में स्थित पटवा टोली गांव को अब लोग प्यार से 'इंजीनियर्स की फैक्ट्री' कहने लगे हैं। इस साल एक बार फिर गांव ने इतिहास दोहराया है। जेईई मेन्स सेशन-2 (2025) में पटवा टोली के 40 छात्रों ने सफलता प्राप्त की है, जिनमें से 18 छात्र अब जेईई एडवांस्ड में अपनी किस्मत आजमाएंगे।

गया के पटवा टोली गांव ने पिछले 25 सालों में कई आईआईटीयन दिए हैं। ऐसा कहा जाता है कि पटवा टोली में ऐसा कोई घर नहीं है, जिसमें कोई इंजीनियर ना हो। इस छोटे से गांव से हर साल कई छात्र आईआईटी में चयनित होते हैं।
बुनकरों से इंजीनियरों तक: पटवा टोली का प्रेरक सफर
कभी बुनकरों के गांव के नाम से पहचाना जाने वाला पटवा टोली अब एक शिक्षा क्रांति का केंद्र बन चुका है। यहां की गलियों में अब करघों की आवाज से ज्यादा किताबों की सरसराहट और छात्रों की मेहनत की गूंज सुनाई देती है।
इस गांव की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई है कि ना केवल बिहार बल्कि झारखंड, उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों से भी छात्र यहां पढ़ने आते हैं। हर साल 40 से 60 छात्र जेईई मेन्स में सफल होते हैं और IITs, NITs और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिला पाते हैं।
गांव के होनहारों की चमक
इस साल के टॉप परफॉर्मर्स में शरण्या ने 99.64 पर्सेंटाइल, अशोक ने 97.7, यश राज ने 97.38, शुभम कुमार और प्रतीक ने 96.55, केतन ने 96.00, निवास ने 95.7 और सागर कुमार ने 94.8 पर्सेंटाइल स्कोर किया है।
सागर कुमार की कहानी: संघर्ष से सफलता तक
सागर की कहानी उन लाखों युवाओं को प्रेरित करती है जो विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानते। पिता के देहांत के बाद सागर की मां ने सूत कातने का काम शुरू किया ताकि बेटे की पढ़ाई रुके नहीं। आज उसी संघर्ष का नतीजा है कि सागर ने 94.8 पर्सेंटाइल के साथ जेईई मेन्स क्रैक किया। सागर का सपना है वोइंजीनियर बनकर देश की सेवा करें।
न्यूज एजेंसी एएनआई से बात करते हुए एक छात्र सूरज कुमार ने कहा, "पहले इस गांव में पढ़ाई का माहौल नहीं था। बच्चे 10वीं तक तो आसानी से पढ़ लेते थे, लेकिन उसके बाद आगे की पढ़ाई में दिक्कत होती थी। लेकिन 'वृक्ष' संस्था में शिक्षा निशुल्क होने के कारण कई बच्चे शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं और पिछले कई सालों से इस गांव के हर घर से आईआईटीयन और इंजीनियर निकल रहे हैं।
एक अन्य छात्रा नंदिनी कुमारी ने कहा, "मेरे पिता मैकेनिक हैं और मां पावरलूम में काम करती हैं और मैं नीट की तैयारी कर रही हूं। इस गांव में मेडिकल फील्ड के कई बच्चे भी पढ़ते हैं। पहले लड़कियों को गांव से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी, लेकिन अब स्थिति अलग है।"
बता दें कि गांव के आईआईटी ग्रेजुएट्स ने मिलकर 'वृक्ष' नाम से एक संस्था बनाई है। इस संस्था के जरिए बच्चों को जेईई मेन परीक्षा की निशुल्क कोचिंग दी जाती है। वृक्ष संस्था 2013 से यह काम कर रही है। इसे आईआईटी ग्रेजुएट्स फंड करते हैं। यह संस्था बच्चों को इंजीनियरिंग की किताबें उपलब्ध कराती है। देश के नामी शिक्षक बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाते हैं।
आईआईटी की सफलता की शुरुआत 31 साल पहले तब हुई जब पटवा टोली के एक छात्र जितेंद्र पटवा को वर्ष 1991 में आईआईटी में दाखिला मिला। इसके बाद कई लोगों ने अपने बच्चों को आईआईटी में भेजने का सपना पूरा करने की हिम्मत जुटाई। शुरुआत में पटवा गांव के कुछ बच्चे आईआईटी तक पहुंचे। पटवा की एक और पहचान भी है और इसे 'बिहार का मैनचेस्टर' भी कहा जाता है क्योंकि इसकी अधिकांश आबादी पटवा जाति की है और कपड़ा बुनने का काम करती है। गांव में प्रवेश करते ही कपड़ा बुनने की आवाज सुनाई देती है।
'वृक्ष' संस्था की छांव में पले सपने
पटवा टोली में शिक्षा की इस नींव को मजबूत किया है 'वृक्ष' नाम की संस्था ने, जो गांव के बुनकर परिवारों के बच्चों को मुफ्त में पढ़ाती है। इस संस्था की मदद से ही सैकड़ों छात्रों का भविष्य संवरा है। इस साल भी संस्था के मार्गदर्शन में 40 छात्रों की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि अगर सही मार्गदर्शन और जुनून हो, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं है।
न्यूज एजेंसी एएनआई से बात करते हुए वृक्ष वेद चेन के अध्यक्ष दुबेश्वर प्रसाद ने कहा, "पहली बार इस गांव से जीतेंद्र पटवा ने आईआईटी पास किया और बाद में वह नौकरी के लिए विदेश चले गए। बाद में गांव के लोगों ने देखा कि अगर बच्चों को शिक्षित किया जाए तो उनका बच्चा भी काबिल बन सकता है और तब से यह सिलसिला चल रहा है।"
उन्होंने आगे कहा कि, "लेकिन कुछ परिवार ऐसे भी हैं जो अपने बच्चों को गांव से बाहर पढ़ाई के लिए नहीं भेज सकते। वे आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं। इसीलिए हमने वृक्ष वेद चेन की शुरुआत की और एक लाइब्रेरी मॉडल बनाया, जिसमें आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को पढ़ाया जाता है। हमारी लाइब्रेरी में ऑनलाइन क्लास चलती हैं। हमारे सीनियर जो दिल्ली और मुंबई में पढ़ाते हैं, वे हमारे बच्चों (छात्रों) को मुफ्त में पढ़ाते हैं। इस गांव को पहले बुनकरों का शहर कहा जाता था, लेकिन आज हर साल छात्र आईआईटी में पास होते हैं, इसलिए इसे आईआईटीयनों का गांव कहा जाता है।"
पटवा टोली: एक उदाहरण, एक प्रेरणा
पटवा टोली अब सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि एक आंदोलन बन चुका है। यह एक ऐसा उदाहरण है जो बताता है कि संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन सपने और मेहनत की कोई सीमा नहीं होती।
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