बिहार SIR: 94 लाख वोटर हो सकते हैं बाहर! मृतकों के भी फॉर्म भरे गए, ADR और RJD ने सुप्रीम कोर्ट में दी चेतावनी
Bihar SIR (Supreme Court): बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एक गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने सुप्रीम कोर्ट में चेतावनी दी है कि राज्य में चल रही बिहार वोटर लिस्ट रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के तहत लाखों वैध वोटर वोटिंग अधिकार से वंचित हो सकते हैं। इस मामले पर 28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है।
ADR के मुताबिक बिहार में मतदाता सूची में वयस्कों की तुलना में वोटरों का अनुपात 2019 के 102% से घटकर 2024 में 97% हो गया है। जुलाई 2025 तक राज्य की वयस्क आबादी 8.18 करोड़ मानी गई है, तो वोटर लिस्ट में कम से कम 7.93 करोड़ नाम होने चाहिए। लेकिन SIR प्रक्रिया के बाद यह आंकड़ा घटकर सिर्फ 7.24 करोड़ रह गया है -यानी करीब 94 लाख लोग वोटिंग अधिकार से वंचित हो सकते हैं।

🔴 ADR और RJD का सुप्रीम कोर्ट में बड़ा आरोप
- सुप्रीम कोर्ट में निर्वाचन आयोग के हलफनामे पर जवाब दाखिल करते हुए ADR और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने गंभीर आरोप लगाए हैं। याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत को बताया कि इस प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां हुई हैं, जिससे मतदाताओं के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।
- याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वोटर लिस्ट रिवीजन प्रक्रिया में भारी अनियमितताएं सामने आई हैं। मृतकों के नाम पर फॉर्म भरे जाने की शिकायतें सामने आई हैं। कई जगह मतदाताओं की जानकारी के बिना ही उनके नाम से ऑनलाइन फॉर्म जमा कर दिए गए।
- मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से कोर्ट को बताया गया कि कुछ स्थानों पर बीएलओ (BLO) ने स्वयं ही गणना प्रपत्रों पर हस्ताक्षर कर दिए, बिना मतदाता से संपर्क किए। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि कई ऐसे नाम, जिनकी मृत्यु हो चुकी है, उनके भी दस्तावेज भरे हुए पाए गए।
- दोनों पक्षों ने तर्क दिया कि इस तरह की प्रक्रियाएं चुनाव की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। साथ ही इससे लाखों वैध मतदाता मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।
RJD सांसद मनोज झा ने भी इस प्रक्रिया को "असंवैधानिक" करार दिया है और कहा कि यह नागरिकों के वोटिंग अधिकारों का हनन है। उनका कहना है कि जिस तरह से यह प्रक्रिया चलाई जा रही है, उससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।
🔴 बिहार वोटर रिवीजन: विवाद का कारण
ADR ने कहा है कि निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी(ERO) को "अनावश्यक और असीमित अधिकार" दिए गए हैं, जिससे वे अपनी मर्जी से किसी भी मतदाता का नाम हटा सकते हैं। इसके अलावा, जिन मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट रोल में हैं, अगर वे दस्तावेज जमा नहीं कर पाए तो उनका नाम अंतिम सूची में नहीं आएगा।
🔴 नागरिकता का प्रमाण मांगा जाना गैरकानूनी!
ADR ने सुप्रीम कोर्ट के 1995 के लाल बाबू हुसैन केस का हवाला देते हुए कहा है कि पहले से वोटर लिस्ट में शामिल व्यक्ति से नागरिकता का नया प्रमाण मांगना गलत है। नागरिकता सत्यापन का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार के पास है, न कि चुनाव आयोग के पास।
🔴 डॉक्यूमेंट्स की बाध्यता से संकट
चुनाव आयोद ने जिन दस्तावेजों को मान्य किया है, उनमें न आधार कार्ड, न राशन कार्ड और न ही EPIC (मतदाता पहचान पत्र) को शामिल किया गया है। भारत जोड़ो अभियान समेत कई जमीनी सर्वेक्षणों के अनुसार, बिहार में 18-40 साल के लोगों में से आधे से भी कम के पास ये निर्धारित दस्तावेज हैं। ऐसे में लाखों युवाओं का नाम मतदाता सूची से गायब रह सकता है।
🔴 ERO पर भारी जिम्मेदारी, लेकिन बिना प्रक्रिया के
ADR ने बताया कि एक ERO को तीन लाख से ज्यादा फॉर्म देखने होंगे, जो "मानवीय रूप से असंभव" है। साथ ही चुनाव आयोग ने दस्तावेजों की जांच और सत्यापन की कोई स्पष्ट प्रक्रिया तय नहीं की है। इससे अपील प्रक्रिया भी प्रभावित होगी और चुनाव से पहले जिनके नाम कटेंगे, उनके पास पुनः नाम जुड़वाने का मौका नहीं बचेगा।
बिहार में मतदाता सूची को लेकर उठे इस बड़े विवाद से राज्य की राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर बड़ा असर पड़ सकता है। अगर SIR की प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी मिल जाती है तो लाखों वैध नागरिक अपने मताधिकार से वंचित रह सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट में यह मामला अब बेहद अहम हो गया है। यह विधानसभा चुनावों के समीकरण को पूरी तरह से बदल सकता है।
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